नीलकंठ महादेव मन्दिर, कालिंजर

वामन पुराण में कालिंजर को नीलकण्ठ का निवास स्थल माना गया है:
“कालन्जरे नीलकण्ठं सरश्वामनुत्तम॥
हंसयुक्तं महाकोश्यां सर्वपाप प्रणाशनम॥ ”
— वामन पुराण, ९०,२७

वायु पुराण के अनुसार विषपान पश्चात भगवान शिव का कण्ठ नीला पड़ गया और काल को भस्म करने के कारण यहाँ का नाम कालिंजर पड़ गया.

“तत्र कालं जरिष्यामि तथा गिरिवरोत्तमे॥
तेन कालंजरो नाम भविष्यति स पर्वतः॥ ”
—वायु पुराण, अ-२३, १०४

कालिंजर किले के पश्चिमी भाग में कालिंजर के अधिष्ठाता देवता नीलकंठ महादेव का एक प्राचीन मंदिर भी स्थापित है. इस मंदिर को जाने के लिए दो द्वारों से होकर जाते हैं.

रास्ते में अनेक गुफ़ाएँ तथा चट्टानों को काट कर बनाई शिल्पाकृतियाँ बनायी गई हैं.

वास्तुशिल्प की दृष्टि से यह मंडप चंदेल शासकों की अनोखी कृति है. मंदिर के प्रवेशद्वार पर परिमाद्र देव नामक चंदेल शासक रचित शिवस्तुति है व अंदर एक स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है.

मन्दिर के ऊपर ही जल का एक प्राकृतिक स्रोत है, जो कभी सूखता नहीं है. इस स्रोत से शिवलिंग का अभिषेक निरंतर प्राकृतिक तरीके से होता रहता है.

बुन्देलखण्ड का यह क्षेत्र अपने सूखे के कारण भी जाना जाता है, किन्तु कितना भी सूखा पड़े, यह स्रोत कभी नहीं सूखता है.

चन्देल शासकों के समय से ही यहाँ की पूजा अर्चना में लीन चन्देल राजपूत जो यहाँ पण्डित का कार्य भी करते हैं, वे बताते हैं कि शिवलिंग पर उकेरे गये भगवान शिव की मूर्ति के कंठ का क्षेत्र स्पर्श करने पर सदा ही मुलायम प्रतीत होता है.

यह भागवत पुराण के सागर मंथन के फलस्वरूप निकले हलाहल विष को पीकर, अपने कंठ में रोके रखने वाली कथा के समर्थन में साक्ष्य ही है.

मान्यता है कि यहाँ शिवलिंग से पसीना भी निकलता रहता है.

ऊपरी भाग स्थित जलस्रोत हेतु चट्टानों को काटकर दो कुञ्ड बनाए गए हैं जिन्हें स्वर्गारोहण कुञ्ड कहा जाता है. इसी के नीचे के भाग में चट्टानों को तराशकर बनायी गई काल-भैरव की एक प्रतिमा भी है.

इनके अलावा परिसर में सैकड़ों मूर्तियाँ चट्टानों पर उत्कीर्ण की गई हैं.शिवलिंग के समीप ही भगवती पार्वती एवं भैरव की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं.

प्रवेशद्वार के दोनों ही ओर ढेरों देवी-देवताओं की मूर्तियां दीवारों पर तराशी गयी हैं. कई टूटे स्तंभों के परस्पर आयताकार स्थित स्तंभों के अवशेष भी यहाँ देखने को मिलते हैं.

इतिहासकारों के अनुसार कि इन पर छः मंजिला मन्दिर का निर्माण किया गया था. इसके अलावा भी यहाँ ढेरों पाषाण शिल्प के नमूने हैं, जो कालक्षय के कारण जीर्णावस्था में हैं.

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