ओशो नव सन्यास संस्मरण

हमारे विचार कर्म और भावनाओं का ताना बाना कुछ ऐसा है कि हम खुद ही उस जाल को बुनते हैं.

और जब हमें इसका एहसास होने लगता है कि मैं अपनी ही कामनाओं वासनाओं के जाल में फँस कर दुखी हो रहा हूँ तो फिर हमारा मन उस जाल को तोड़कर मुक्त होना चाहता है.

और उसी कोशिश में वही मन नया जाल निर्मित करने की सोचता है! बस एक विचार मात्र से ही नये जाल की प्रक्रिया शुरू हो जाती है!

कई महीनों के बाद मुझे रात की नींद का खूब मज़ा आ रहा था. इसके लिए मैंने जयंतिभाई का तहेदिल से शुक्रिया अदा किया अगर उन्होंने मा योग लक्ष्मी से शिकायत नहीं की होती तो मेरी मुश्किलें कैसे आसान होती पता नहीं?

लेकिन उनको मा लक्ष्मी के ऑफिस में देखकर मुझे उन पर भी बहुत ग़ुस्सा आया था वे सज्जन और नैतिक व्यक्ति हैं उनके हिसाब से और समाज की सामान्य धारणा की दृष्टि से उन्होंने बिलकुल ठीक ही किया था.

जीवन कुछ ऐसी ही बेबूझ रहस्यमयी पगडंडियों से एक एक पल, क़दम क़दम आगे बढ़ रहा था. अब मुझ पर समय की कोई पाबंदी नहीं थी.

जब नींद आये सो जाना, भूख लगे तो मन पसंद भोजन बना लेना, दिन में दो चार बार चाय पानी और सबसे महत्वपूर्ण यह कि एक बहुत ख़ूबसूरत जीवन साथी का प्यार उसका संग साथ पा कर मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं वाक़ई में स्वर्ग में हूँ.

सारी चिंता सारा तनाव ग़ायब हो गया था. आँख खुलते ही गुड मोर्निंग और एक प्यार भरी मुस्कराहट के साथ एक दूसरे को बाँहों में भर कर चूमना.

गुड इवनिंग और गुडनाइट के बीच समय की रफ़्तार बहुत तेज़ होने लगी दिन और महीने कैसे बीत गये पता ही नहीं चला.

चौबीस घंटे हम साथ साथ ही रहते एक दिन सवेरे करीब ग्यारह बजे हम दोनों आश्रम से निकले. हीरा साइकिल चला रही थी और मैं पीछे बैठा था यानी डबल सवारी. हीरा अचानक बोली भगवान भगवान और उसने साइकिल रोक ली मैं समझा नहीं मैंने देखा सामने से मा योग लक्ष्मी अपनी एमपाला कार में आ रही है और भगवान भी लक्ष्मी के पीछे बैठे हैं और मुस्कराते हुए हमें देखते हुए कार जल्दी से गुजर गई.

मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि इस तरह सड़क पर भगवान श्री अचानक दिखाई देंगे. उस दिन मैं दिन में बार बार यही सोचता रहा ओशो ने मुझे ये कैसी बचकानी हरकत करते देख लिया है वे क्या सोचते होंगे?

और मैंने उन्हें नमस्कार तक नहीं किया इस बात का भी मुझे बहुत अफ़सोस हो रहा था. मैं दोपहर के बाद में मा लक्ष्मी से मिलने गया तो मा योग लक्ष्मी ने बताया कि वे कोरेगाँव पार्क के कुछ बड़े बंगले आश्रम के पीछे वाली गलियों में भगवान को दिखाने ले गई थी.

मैं शर्मिन्दगी महसूस कर रहा था हीरा भी मेरे साथ थी मुझे गुमसुम देख कर मा लक्ष्मी ने कहा तुम्हें साइकिल पे डबल सवारी में देखकर पूछ रहे थे कि आजकल वेदान्त क्या कर रहा है?

मैंने कहा आपने देख तो लिया है और मैं क्या कहती? हीरा ने मा लक्ष्मी से शाम के दर्शन का अपाइंटमेंट ले लिया और बोली नाऊ वी गो एंड सी भगवान. मैं चुप ही रहा और शाम को हम दोनों भगवान से मिलने च्वाँग्तजू ओडिटोरियम में गये.

हीरा तो बहुत खुश थी मगर में कुछ असहज सा महसूस कर रहा था. पता नहीं मैं कैसे सामना करूँगा. भगवान ने कुछ पूछा तो मैं क्या कहूँगा इस तरह के बहुत से विचार मेरी खोपड़ी में मँडरा रहे थे.

होश, ध्यान, सजगता मैं प्रयास करने पर भी मौन नहीं साध पाया. भगवान आये और मुस्कराते हुए सब को नमस्कार करते हुए अपनी कुर्सी पर बैठे. हमारे पहले पाँच सात लोगों ने सन्यास लिया और फिर मा योग लक्ष्मी ने हीरा, कृष्ण वेदान्त हम दोनों को बुलाया.

मैंने भगवान की आँखों में देखा और झुककर प्रणाम किया. भगवान ने हीरा से कुछ बातें कही तो हीरा बोली हम दोनों लंडन जा रहे हैं. भगवान ने मुस्कराते हुए कहा व्हेरी गुड यू ओपन ए मेडिटेशन सेंटर इन लंडन टेक हीम विथ यू.

और भगवान ने उसी समय काग़ज़ पर ” क्राईस्ट रजनीश मेडिटेशन सेंटर ” लिखकर अपने हस्ताक्षर किये और कुछ बातें बताई कि इसाईयत ने मनुष्यों को बहुत गंभीरता और भय से भरा हुआ रुगण धरम दिया है. इसे धरम कहना भी उचित नहीं है क्योंकि उसमें उत्सव की ध्यान की कोई सुगंध नहीं है.

लोगों को पापी और भिखमंगों की तरह चर्चों में भयभीत होकर गिड़गिड़ाने के सिवाय कुछ नहीं आता. और जैसे ही भगवान मेरी तरफ़ देखकर कुछ बोले मेरे भीतर तो जैसे एकदम सन्नाटा ही छा गया और मेरी आँखें बंद हो गई सन सनाहट की गूँज कुछ ऐसी थी कि जैसे शब्दों से विचारों से मैं बिलकुल ख़ाली हूँ.

मेरे दोनों हाथ मेरे कान पर पहुँच गये सोचने वाला बोलने वाला वहाँ कोई था ही नहीं. मैं तो विचारों को अपने भीतर समग्रता से देखने लगा वहाँ सनसनाहट की गूँज थी और घना अंधकार था. दो तीन मिनट मैं ऐसे ही दोनों हाथों से कान बंद किए बैठा रहा.

मुझे कुछ पता ही नहीं रहा कि मैं भगवान के सामने बैठा हूँ. मैं कुछ भी नहीं कह पाया और ओशो के चरणों में फिर से झुक गया. जब वापिस उठा तो भगवान ने मुझ से कहा गो एंड हेल्प माय पीपुलस देयर. मेरे सर पर हाथ रखा आशीष दिये.

यह सब कैसे हुआ क्यों हुआ मुझे कुछ पता नहीं. घर आने के बाद मैंने स्वयं को टटोला तो साफ़ साफ़ मुझे ज्ञात हुआ कि मैं मा योग लक्ष्मी से जब मिलने गया था तो बहुत गिल्टी महसूस कर रहा था. क्योंकि साइकिल पर डबल सवारी में पीछे बैठे भगवान ने मुझे देख लिया था.

लेकिन भगवान की करुणा यह सब कहाँ देखती है. मैं व्यर्थ ही अपनी ही नज़रों में गिरकर स्वयं को बुरा समझ कर कोस रहा था. और भगवान ने तो मुझे और हीरा को मेडिटेशन सेंटर खोलने की ज़िम्मेदारी सौंप दी है.

अपने सन्यासियों पर ओशो की श्रद्धा अनंत है उनकी नज़र कीचड़ में छिपे हुए कमल को देखती है और कीचड़ की निंदा बिलकुल नहीं करती. हम बेहोश हैं और किसी दिन होश में आ सकते हैं इसके लिए वे हर पल नये ढंग से हमें जगाने का चेताने का प्रयास करते रहे हैं.

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