अप्प दीपो भव : सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो

नहीं आप अस्तित्व को शून्यता नहीं कह सकते निर्विकार भी नहीं कह सकते ऐसा कहना स्वयं को और संसार को धोखा देना है.

सत्यम शिवम सुन्दरम कहना सार्थक होगा ना कि निर्विकार आप केवल ध्यान को आधार मत बनाईये.

वासना को प्रेम से मुक्त करके स्वयं को धोखा दे रहे हैं आप उम्र की भाषा बोल रहे है. आपकी भाषा में चुनाव है आप वासना को अलग नहीं कर सकते क्योंकि आपकी य़ात्रा मे वासना ही वासना है.

आप प्रेम को चरित्र देकर कटघरे में खड़ा नहीं कर सकते आपने जीवन जीया वासना का और प्रेम को उससे अलग कर रहे हैं यह धोखा स्वयं के साथ… आप श्रेष्ठता की भाषा बोल रहे हैं ना कि ईमान्दार साधक की तरह आप ऐसा नहीं कर सकते ….नो नो it’s not the way…
– Shailandra Singh

प्रिय शैलेन्द्र सिंह जी
प्रेम प्रणाम
हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गायेगा
दीवाना सैकड़ों में पहचाना जायेगा

यह अस्तित्व है ही शून्यता का अंतहीन विस्तार. शून्यता कोई सिद्धांत नहीं है जिसका खंडन किसी विचार या धारणा द्वारा किया जा सकता हो.

यही अस्तित्व का होना है यह अस्तित्व का स्वभाव है. हमारे बाहर सभी दिशाओं में तो शून्यता व्याप्त है ही हमारे भीतर भी शून्यता विराजमान है.

जब तक व्यक्ति को स्वयं ही इसकी अनुभूति नहीं होती तब तक उसे किसी तर्क से बुद्धि से नहीं समझाया जा सकता है.

जब रात को हम गहरी नींद में होते हैं सुषुप्त अवस्था में होते हैं, तब हम कहाँ होते हैं. वहाँ तो स्वप्न तक नहीं होते हमें तो यह भी पता नहीं होता कि हम स्त्री हैं या पुरुष हैं या कि इस समय घर में अपने बिस्तर में सोये हैं.

लेकिन हमारा शरीर तब भी साँस ले रहा होता है लेकिन हमें जरा सा भी होश नहीं होता. तब हम शून्यता से एक हो गये होते हैं. छोटे बच्चों को तो इस सुषुप्त अवस्था में आप उठाकर कहीं से कहीं भी ले जाकर सुला देते हैं, वे बिलकुल नहीं जगते उनकी नींद जरा भी नहीं टूटती है,

यही शून्य होना जब हम ध्यान में गहरे उतरते हैं तो घटता है उस समय शरीर तो करीब करीब मृतवत ही रहता है पर हमें अपने न होने का या शरीर से पृथक होने का बोध रहता है.

और बिना ध्यान के इसकी अनुभूति नहीं हो सकती. हाँ कभी कभी प्रेम में इसकी क्षणिक झलक मिल सकती है लेकिन वैसे प्रेम की तो हमारे समाज ने जड़ें ही काट दी है.

हमारे समाज में शादी विवाह महत्वपूर्ण है और विवाह भी धन दौलत, यश, पद, प्रतिष्ठा को देख कर जात पाँत ऊँच नीच के आधार पर तय किया जाता है. उसमें जन्मकुंडली मिलाई जाती है अगर कुंडली नहीं मिले तो पंडित पुरोहित को रिश्वत देकर उसका कोई उपाय या तोड़ खोज लिया जाता है.

और परिवार निश्चिंत हो जाता है कि देखो कमाल के पंडित जी हैं. आखिर जोड़ तोड़ कर के बात बना ही दी. शादी विवाह की तिथि तय होते ही इसमें दो अजनबी स्त्री पुरुष जो काम ऊर्जा का बीस बरस से दमन करते आये हैं उनके मन में विवाह का मतलब केवल शारिरिक सुख ही होता है.

कैसे जल्दी से सुहागरात आये दिन रात उनके मन में यही फ़िल्म चलती रहती है. सुबह शाम रात दिन ऐसे ही विचार उन दोनों के मन को घेरे रहते हैं. इसमें प्रेम के लिए कोई जगह है ही नहीं.

इससे पहले वे एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. उनके मन के जगत में उनके हृदय में एक दूसरे के प्रति कभी कोई हलचल कोई रोमांच हुआ ही नहीं. शायद सगाई की रस्म में एक दूसरे को एक नज़र देखा हो बस इतना सा परिचय इसी को हम सामाजिक कर्तव्य समझ कर जीवन भर साथ रहने का फैसला कर लेते हैं.

यह धोखा शादी ब्याह के नाम पर सदियों से चला आया है इसलिए हमें इस पर कभी संदेह भी नहीं होता है. ऐसा सम्बन्ध ही कामवासना का सम्बन्ध होता है क्योंकि यह शरीर के तल से शुरू होता है.

यहाँ हृदय, मन और भाव जगत की कल्पनाएँ न के बराबर होती है इसीलिए ऐसे विवाह जीवन भर चल सकते हैं. शरीर बहुत धीरे धीरे बदलता है हमें साथ साथ रहते हुए उसका पता भी नहीं चलता और हम एक दूसरे के आदी हो जाते हैं.

इससे प्रेम की भ्राँति होती है और हम एक दूसरे पर निर्भर हो जाते हैं. दरअसल इसे नक़ली प्रेम कहना चाहिए. शरीर के तल पर एक तरह का समझौता है यह इसलिए इसमें बहुत अड़चनें नहीं आती मन के तल से भाव तल से जो प्रेम हममें किसी के प्रति जगता है वह स्थायी नहीं हो सकता.

यही तो ख़तरा है क्योंकि मन तो मौसम सा चंचल है सब का होकर भी न किसी का. जिस समाज में बचपन से ही स्त्री पुरुष को साथ साथ खेलने कूदने और स्कूल में पढ़ने का घूमने फिरने का अवसर मिलता है, वहाँ के लोग जब तक एक दूसरे से अच्छी तरह परिचित नहीं हो जाते या जिनमें एक दूसरे के प्रति आकर्षण नहीं होता एक दूसरे से मिलने के लिए तड़प बेताबी और हृदय में हलचल नही होती, कोई रोमांस ने उन्हें नहीं घेरा होता, तब तक वे मित्र की तरह मिलते जुलते हैं.

कई बरस लग जाते हैं तब जाकर वे तय करते हैं कि हमें साथ साथ रहना चाहिए इसलिए शादी विवाह एक सामाजिक औपचारिकता को निभाने के लिए कर लेते हैं. इसे भी अनेक लोग जरूरी नहीं समझते.

ऐसे प्रेम विवाह टूटते भी अधिक हैं, जब उन्हें लगता है कि अब हमारे भीतर एक दूसरे के प्रति कोई खिंचाव ही नहीं, कोई आकर्षण नहीं है और अब अकेले रहने को जी चाहता है. या फिर हम इस तरह जीवन भर साथ नहीं रह सकेंगे, तो वे अलग हो जाते हैं.

या उनके मन में किसी और स्त्री पुरुष के प्रति आकर्षण होने लगता है तो वे तलाक़ कर लेते हैं. जब तक स्त्रियाँ शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं होती तब तक यह शादी विवाह की परम्परा चलती रहेगी लेकिन भविष्य में यही सारी दुनिया में होने को है.

काम ऊर्जा नैसर्गिक है लेकिन एक उम्र तक उसे दबाये रखने से वही नैसर्गिक ऊर्जा मानसिक रोग बन जाती है और उसे ही कामवासना कहना चाहिए, जिसकी तृप्ति के लिए हम दूसरे का साधन की तरह उपयोग करते हैं.

और इस्लाम के रिति रिवाजों के अनुसार इसी सौदेबाज़ी को धर्म के नाम से या सामाजिक नियमों की आड़ में करीब करीब सभी स्त्रियों के साथ बलात्कार किया जाता है और स्त्रियों को इसका विरोध करने पर मौत की सज़ा भी दी जाती है.

या उनके चेहरे पर तेज़ाब छिड़क कर उन्हें जीवन भर के लिए कुरूप कर दिया जाता है. यह एसिड की तेज़ाब से स्त्रियों के चेहरे को बिगाड़ने वाली घटनाएँ पाकिस्तान जैसे कई इस्लामिक देशों में बहुत घटती रहती हैं.

अगर आपका जी भर गया है या अब इस स्त्री के साथ नहीं रहना चाहते हैं तो छोड़ दें ऐसी भयानक हिंसा तो मत करें अपनी बीबी के साथ? कभी आप यूट्यूब पर देखियेगा. जरा जरा सी बात पर स्त्रियों का सौन्दर्य जीवनभर के लिए समाप्त कर के उन्हें ऐसा कुरूप कर दिया जाता है कि वे फिर कभी बुरक़े के बाहर नहीं झाँकती है.

मैं व्यक्तिगत रूप से किसी के भी विरोध में नहीं हूँ कुछ व्यक्ति सदा ही अपवाद हो सकते हैं लेकिन मैं सभी तरह के पाखंड के विरोध में सीधी साफ़ बातें जो मुझे ठीक लगती है मैं जरूर कहूँगा क्योंकि मैं उस सिस्टम के ख़िलाफ़ हूँ जिससे ये पाखंड पैदा होते हैं.

साथ ही मैं मनुष्यों की स्वतंत्रता के पक्ष में हूँ लेकिन जरूरी नहीं है कि आप या कोई और मेरी बातों से सहमत हों…. नहीं इतनी अपेक्षा में नहीं रखता कि सभी लोग मुझसे सहमत हों. आप अपनी बात अपने ढंग से पेश करें मुझे कोई एतराज़ नहीं. आप प्रश्न पूछने के लिए स्वतंत्र हैं मुझे उचित लगेगा तो मैं जवाब दूँगा.

यह प्लेटफार्म हम सभी मित्रों को इसका अवसर दे रहा है इससे हम सभी एक दूसरे के विचार से नज़रिये से परिचित होते हैं इससे चिंतन में सुविधा होती है. हजारों मील दूर होते हुए भी हम मन के भावनाओं के जगत में बिना रोक टोक के मिलते रहते हैं. यह हमारा बड़ा सौभाग्य है इसका भरपूर लाभ हम सभी को लेना चाहिये.

शैलेन्द्र जी जब भी अस्तित्व के लिए शब्दों में कुछ कहा जायेगा सब झूठ ही कहा जायेगा ! शब्द में सत्य कहा ही नहीं जा सकता शब्दों से केवल इशारे हो सकते हैं? आग शब्द में कितनी अग्नि होती है या पानी शब्द सुनकर पढ़ कर आप उसमें से कितना पानी निकाल पायेंगे?

शब्दों की भाषा की ईजाद ही व्यवहारिक आदान प्रदान के लिए सामाजिक व्यवस्था में सुविधाओं को बनाये रखने के लिए हुई है. शून्यता ही सत्य है क्योंकि शून्यता ही अनंत है असीम है अपरिवर्तनशील है.

शून्यता बस है उसमें कुछ घटता है, न बढ़ता है वह निर्गुण है निराकार है उसे दूषित नहीं किया जा सकता. वह अज्ञेय है. उसे जाना भी नहीं जा सकता पर उसमें लीन हुआ जा सकता है. जब तक हमारा तादात्मय शरीर से है उसकी सनसनाहट को महसूस किया जा सकता है पर उसे स्पर्श नहीं किया जा सकता.

हवा हमें दिखाई नहीं देती लेकिन उसका स्पर्श तो हमें महसूस होता है सर्दी गरमी में आँधी तूफ़ान में हवा से हम सुखी दुखी भी होते हैं. एक विशेष मात्रा में यही हवा बड़ी सुखदायी लगती है और अति हो जाये तो इसी से पीड़ा भी होती है.

संसार द्वैत है और सत्य अद्वैत और जब तक व्यक्ति में मैं भाव सघन है उसे अद्वैत की अनुभूति होना संभव नहीं है. ध्यान में तो सभी को रुचि नहीं होती लेकिन प्रेम की प्यास तो प्रत्येक व्यक्ति में ही नहीं सभी प्राणियों में सदा रहती है. और यह प्यार या मोहब्बत या प्रेम बड़ा जादुई शब्द है प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर से इसके अर्थ निकालता है.

बुद्ध पुरुष जिस प्रेम की बात करते हैं वह सभी के पल्ले पड़ने वाला अर्थ नहीं है. इस प्रेम के कई रंग है रूप हैं. कामवासना में भी किसी न किसी तरह से थोड़ी बहुत प्रेम की ग़लतफ़हमी होती ही होगी. नहीं तो काम में इतना आकर्षण नहीं होता.

किसी को संगीत से प्रेम होता है, किसी को काव्य से, तो किसी को चित्रकला से, किसी को अपनी मोटर साइकिल से, तो किसी को अपने कुत्तों से, किसी को फूलें से किसी को नृत्य से, हजार ढंग से हम इस प्रेम, प्यार शब्द का उपयोग करते हैं फिर भी यह सदा ही रहस्यमयी ही बना रहता है इसलिए मशहूर शायर गुलज़ार साहब कहते हैं

सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो
हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुशबू
हाथ से छूके उसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो !

ओशो नव सन्यास संस्मरण

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