Video : ईरान को गेहूं लदा जहाज़ भारत की शतरंजी चाल, 2020 में दिखेंगे परिणाम

अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में 2003 में भारत और ईरान के बीच उसके चाबहार पोर्ट को व्यापारिक हितों के लिये विकसित करने के लिये समझौता हुआ था.

इस समझौते के तहत भारत की रेल व सड़क के माध्यम से सीधी पहुंच अफगानिस्तान, सेंट्रल एशिया और रूस तक होनी थी.

यह भारत के लिये व्यापारिक व सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था.

उसके बाद 2004 में सोनिया मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार आ गयी और इस महत्वपूर्ण परियोजना पर उन्होंने कोई ध्यान नही दिया.

इसी बीच 2013 में चीन-पाकिस्तान के बीच चाबहार से 100 किमी दूरी पर बलूचिस्तान स्थित ग्वादर पोर्ट को व्यावसायिक दृष्टि से विकसित करने की महत्वाकांक्षी परियोजना (सीपीईसी) के लिए समझौता हो गया.

इस सीपीईसी समझौते से भारत की सुरक्षा और व्यापारिक हितों पर प्रश्नचिह्न लग गया था.

इसी खतरे को भांपते हुये आज से दो वर्ष पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी ईरान यात्रा के दौरान चाबहार की बंद पड़ी परियोजना को फिर प्राथमिकता के आधार पर शुरू करने का समझौता किया.

महज़ डेढ़ वर्ष में चाबहार के पोर्ट को इस काबिल बना दिया है कि भारत आज पानी के जहाज के माध्यम से, पाकिस्तान को दरकिनार कर, अफगानिस्तान को गेंहू की आपूर्ति सीधे करने जा रहा है.

यह गेंहू, चाबहार पोर्ट से सड़क के माध्यम से, जो भारत ने ही बनाई है, काबुल अफगानिस्तान पहुंचेगा.

आज चाबहार के पोर्ट का रिकॉर्ड समय में शुरू होना एक महत्वपूर्ण कदम है जो 2018 में पूरी तरह से शुरू हो जाने पर, जहां व्यापार, तेल और खनिज के लिये भारत की पहुंच सीधे सेंट्रल एशिया और रूस तक होगी, वहीं सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होगी.

यहां यह महत्वपूर्ण है कि कांडला (गुजरात) से चाबहार रास्ते व्यापार को बढ़ावा देने के लिये भारत सब्सिडी दे रहा है.

भारत इस सब्सिडी को दे कर जहां व्यापारिक दृष्टि से जो आज घाटा उठा रहा है, वह दरअसल सामरिक दृष्टि से दीर्घकालीन लाभ के लिये किया गया निवेश है, जिसके परिणाम अगले 2 वर्षो में अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, सीपीईसी और खुद पाकिस्तान से आने लगेंगे.

वैसे यह ईरान में भारत के साथ चाबहार और पाकिस्तान में चीन के साथ ग्वादर पोर्ट के विकास की परियोजना देखने में व्यावसायिक परियोजना लगती है लेकिन इसके मूल में क्षेत्र के सामरिक शक्ति सन्तुलन को बदलने वाले समीकरण निहित है, जिसका सीधा प्रभाव पाकिस्तान और बलूचिस्तान के अस्तित्व पर पड़ने वाला है.

यह भारत की, भले ही देर से, खेली गई शतरंजी चाल है जिसका परिणाम 2020 के दशक में देखने को मिलेगा.

इस पूरी बात को समझना है तो पाकिस्तान टीवी पर डॉन टीवी के ‘ज़रा हट के’ प्रोग्राम पर इन तीन संजीदा पत्रकारों, वसुल्लाह खान, मुबाशिर ज़ैदी और ज़र्रार खुहरो के वार्तालाप को ध्यान से सुनें तो काफी ज्ञान वर्धन होगा.

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