हिंदू मुस्लिम सिख इसाई : सस्ती तुकबंदी, विचारशून्यता और राष्ट्रीय एकता के नाम पर देश को तोड़ने की साज़िश

भारत की आत्मा पिछली दो सदियों से सस्ती तुकबंदियों और विचारहीन नारेबाज़ी में बसती है. इस नारे या मुहावरे से बेहतर इस बात का प्रमाण मिलना कठिन है.

यह सिर्फ एक फूहड़ और भद्दा नारा ही नहीं है, भारत वर्ष और उसकी सनातन संस्कृति को क्षत विक्षत करने के लम्बे औपनिवेशिक षड्यंत्र और मूर्खतावश इस षड्यंत्र में आम जन की भागेदारी की कहानी है.

आपने यह नारा लगाने के पहले कभी सोचा इस नारे की उत्पत्ति कहाँ से हुई और उसके सतही और दूरगामी निहितार्थ क्या हैं?

मुझे मालूम है आप कहेंगे – इसमें इतना सोचने विचारने की बात क्या है? सुंदर सा नारा है, सभी धर्मों को जोड़ने से, राष्ट्रीय एकता की मुहिम से जुड़ा है.

चलिए, यह बताइए कि हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई क्यों, हिन्दू मुस्लिम पारसी (या यहूदी) इसाई क्यों नहीं? यह कोई कुतर्क नहीं है, बहुत गम्भीर प्रश्न है.

इसका कारण तो यही है न कि हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई में एक टेक है जो हिन्दू मुस्लिम पारसी इसाई में नहीं है.

तो टेक के कारण न सिर्फ विचारहीन बल्कि उससे भी अधिक ख़तरनाक देशतोड़क मुहावरे का जन्म हुआ जिसे कुछ ताकतों ने षड्यंत्र के तहत, और बाक़ी ने वैचारिक आलस्य के कारण हाथोंहाथ लपक लिया और अब यह मुहावरा हमारी राष्ट्रीय स्मृति में धँस गया.

वैसे ही जैसे राष्ट्रपिता, मिलीजुली संस्कृति, idea of India जैसी औपनिवेशिक अवधारणाएँ हमारे मानस में अब मज़बूती से बस गई हैं और हम बिना सोचे समझे इन्हें तोतों की तरह दुहरा कर गौरवान्वित होते रहते हैं.

दुहराव की ताक़त यह है कि न सिर्फ़ हमने इस देशतोड़क नारे की हक़ीक़त नहीं पहचानी, बल्कि हमने इसे आत्मसात कर लिया और इसे राष्ट्रीय एकता के जयघोष के तौर पर प्रयोग करने लगे.

पर कभी एक मिनट रुक कर इस मुहावरे के बारे में सोचिए. तुकबंदी अच्छी है, पर उसके पार क्या है?

सतही तौर पर इतना मासूम, बल्कि सुंदर सा लगने वाला यह मुहावरा “हिन्दू” और सिख” को अलग अलग कर देखता है और सिख पंथ को ग़ैर भारतीय मज़हबों के बराबर ला खड़ा करता है.

ऐन वैसे ही जैसे आज़ादी के पूर्व की जनगणना में सवर्णों को हिन्दू की संज्ञा दी गई थी और जिन्हें हम आज दलित कहते हैं उन्हें मुसलमानों और इसाइयों की तरह ‘हिन्दुओं’ से अलग गिना गया था.

ऐसा निर्दोष कारणों से अनायास हुआ था – यह मानने के लिए जितनी नादानी, जितने भोलेपन की दरकार है – मुझमें नहीं है.

यह बताने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए कि अधिक से अधिक सौ वर्ष पहले तक ‘हिन्दू’ और ‘सिख’ में कोई भेद नहीं था.

एक ही परिवार में केशधारी और ग़ैर केशधारी रहा करते थे, उनमें आपसी विवाह (arranged, not love) आम थे और उन्हें कोई अजूबा नहीं समझता था.

सारे पंजाबियों की भाषा पंजाबी और लिपि गुरुमुखी थी. पंजाबी परिवारों में धार्मिक आयोजनों में गुरुवाणी का पाठ होता था. जिन्हें हम आज हिन्दू कहते हैं वे भी रामायण का नहीं, गुरुग्रंथ साहब का पाठ करते थे.

गुरुद्वारों और मंदिरों में कोई भेद न था. विश्वास न हो तो कृष्णा सोबती की किताब “ज़िन्दगीनामा“ पढ़िए.

भेद हाल में प्रारम्भ हुआ. कुछ तो जहालत के कारण और कुछ राजनैतिक षड्यंत्र के कारण. ऐसे नारे जहालत की श्रेणी में आते हैं जिन्हें लोग बिना सोचे समझे इस्तेमाल करते हैं और इस नए बनाए गए भेद को घनीभूत करते हैं.

और इसीलिए जब मैं यह मुहावरा सुनता हूँ, तिलमिला उठता हूँ. यह भाई भाई में भेद करने वाला नारा है.

घटिया राजनीति के फुसलावे में आकर ग़ैर केशधारियों ने जनगणना में पंजाबी की जगह हिन्दी को अपनी मातृभाषा दर्ज करवाया और उसकी प्रतिक्रिया केशधारियों में हुई.

फिर ग़ैर केशधारियों ने गुरुग्रंथ साहब के पाठ की जगह अखंड रामायण का पाठ करना प्रारम्भ किया. इन बातों का धर्म या संस्कृति से कुछ भी लेना देना नहीं था, यह सब पूर्णत: तंगनजर राजनीतिक स्वार्थों के कारण किया गया.

और आप जानते हैं कि एक बार स्वस्थ शरीर में भी घाव हो जाय तो उस पर बैक्टीरिया हमले करते हैं और जो कभी मामूली घाव था, वक़्त के साथ जानलेवा नासूर बन जाता है.

यही बैक्टीरिया थे भिंडरावाले और इंदिरा गांधी जैसे लोग. इनकी आँख सिर्फ अपनी ताक़त बढ़ाने पर लगी थी. इन्हें किसी समाज, धर्म, संस्कृति से कुछ भी लेना देना नहीं था. ये वे बैक्टीरिया थे जिन्होंने एक मामूली घाव को नासूर बनाया.

पर आपने कभी गम्भीरता से सोचा कि भिंडरावाले, खालिस्तानी आतंकवाद, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद के कांग्रेस द्वारा प्रायोजित नरसंहार के बाद आज क्या स्थिति है.

इतनी बड़ी घटनाओं और तोड़ने की इतनी कोशिशों के बावजूद सिख समुदाय की आज भारत में क़रीब क़रीब वही स्थिति है जो पहले थी.

सिख समुदाय सारे देश में फैला है और जहाँ भी सिख हैं, अपनी विभिन्नता रखते हुए भी स्थानीय समुदाय में वैसे ही घुले हैं जैसे पानी में शक्कर.

मैं तमाम उदाहरण गिना सकता हूँ जहाँ जनसंख्या का एक प्रतिशत होने के बावजूद सिख भाई भारी बहुमत से चुनाव जीतते हैं और बहुत लोकप्रिय हैं, झारखंड जैसे राज्य में विधानसभा के अध्यक्ष हो सकते हैं, मुख्यमंत्री पद के गम्भीर दावेदार हो सकते हैं.

ऐसा क्यों हुआ? किसी सस्ते चालू नारे के कारण? नहीं, इसलिए कि जो भेद बनाया गया था वह सतही था, और जो जोड़ता था उसकी बुनियाद बहुत पुख्ता, बहुत organic सांस्कृतिक और जातीय रागात्मक एकता पर बनी थी.

पंजाब के बगल में ही कश्मीर है – ज़रा तुलना कर लीजिए.

मेरी माई स्वर्णमंदिर में माथा टेकने उसी श्रद्धा से गई थी जैसे बनारसी सिख संकटमोचन मंदिर में हनुमान जी की आरती करते हैं. मेरी माई के गुरुजी सिख थे.

तो मेरी नज़र में हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई जैसे मुहावरे सिर्फ चालू और सस्ती तुकबंदियां नहीं हैं, वे हमारे मुल्क की बर्बादी के दास्तान के पड़ाव हैं.

हम यदि बचना चाहते हैं तो हम चालू मुहावरों की विचारपूर्वक जाँच करें, हम भाषा को नारेबाज़ी का नहीं विचार का माध्यम समझें.

आपने ग़ौर किया होगा अब ऐसे ही नारे लगा कर जैनों, बौद्धों को, बल्कि दलितों और पिछड़ी जातियों को अलग करने की मुहिम चल रही है.

हम यदि शब्द का नाश करेंगे, शब्द हमारा नाश कर देगा. हम सभी सिख हैं. वैसे ही जैसे हम सभी हिन्दू हैं.

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