भारत इंडिया जो बन रहा है! इंतज़ार तो उस दिन का, जब पीने लायक न बचे घर के कुएं का पानी

ज्यादा दिन नहीं यही वर्ष 2000 में मेरे घर में टीवी ख़रीदा गया. पूरे गाँव वाले, सब मिल के देखते थे टीवी.

भगवान वाले सीरियल ज़्यादा आते थे उस वक़्त… और शाम को चार बजे वाले शो!… तो परिवार समेत गाँव वाले भी देखते थे.

वैसे बात ये नहीं है… बात कुछ और है… बात ये है कि जब प्रचार आता था न, तो उसपर बहुत कम ही कोई ध्यान देता था… लेकिन कोई-कोई ध्यान देते थे जब कोई इंटरेस्टिंग चीज़ हो तो…

तो एक ऐसे ही एड (प्रचार) में आता था ‘बिसलेरी’ पानी बोतल का एड!.. तो ऊ एड जब आया न तो हमरी मैया एकदम से ध्यान देती हुई बोली “ई का चीज है रे??”

मेरा बड़का भइवा बोला “पानी है मैया!”

“पानी???”

“हां पानी!”

“पानी के परचार टीभी में??” (बहुत आश्चर्यचकित होती हुई सी)

“हां गे टीभी में… ई मिनरल वाटर है.. शुद्ध पानी!”

“ई कौन ची मिनिरल फिनिरल भाटर गे मइया!… आर हमनी की खराब पानी पियो हिये?!”

“अगे तोहनी नाय बुझबी ई सब के मरम!”

“ईटा कौन मरम गे माय!… आर ई पनिया केय टके (रुपये) बिकाय है रे बेटा?”

“10 टके बोतल!”

“हाय गे मइया!!… दस टके बोतल पानी! ई कौन देशे पानी नाय मिलो है, जे पानी बोतले भोर के बेचो हथीन गे माय, ऊ भी दस-दस टके बोतल!”

“अगे आपने देशे बिकाय है गे… जादा दूर काहे, तोरा बोकारो में ही बोतले पानी मिल जितव!!”

“ई कौन जमाना गे माय… अब पानियो बिकाय लागल है!!”

मेरी माँ के आज से मात्र 18-20 साल पहले के बोल हैं ये… पानी का एड देखते ही चौंक पड़ी थी… कि ये कैसा जमाना आ रहा है जहाँ पानी बेच के पिलाया जा रहा है…

जहाँ पीने का पानी नहीं, वहाँ और क्या कुछ मिलना भला! जब भी कोई पानी खरीदने की कहानी सुनाता तो गाँव के लोग बड़े चाव से सुनते और ठहाके लगा कर उपहास भी उड़ाते.

हमारे बाप-दादाओं से लेकर हम तक गाँव के चुँआ, दोहा और कुँआ का ही पानी पिया है और अब भी पी ही रहे हैं… लेकिन मजाल कि कोई पानी से संबंधित बीमारी हुई हो या कोई मिनरल की कमी हुई हो…

कुँआ का शीतल कनकन पानी… बाल्टी से खींच के निकालो और सीधा पी लो… न कभी फिल्टरेशन की जरूरत पड़ी, और न कुछ और की ही.

बारह महीना लबालब पानी… शादी ब्याह से ले कर बड़का-बड़का फंक्शन में कोई समस्या नहीं.

लेकिन मात्र इन 18-20 सालों में भारत ने बहुत तेज गति से तरक्की की राह पकड़ी… लोग नौकरियों के पीछे भागने लगे और पैसे की बारिश होने लगी…

शहर दिनों-दिन सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता ही गया और गाँव संकुचित हो शहर से कदम ताल मिलाते गया…

बोली-भाषा से ले कर रहन सहन में परिवर्तन आया… स्टैंडर्ड और स्टेटस की कम्पीटिशन होने लगी. देश विकास की राह चल पड़ा..

ऊँची-ऊँची बिल्डिंगें बनने लगी तो बड़ी बजबजाती नालियों की भी सौगात देते गई… प्रदूषण और कचरा दे गई…

पानी के स्रोतों से निकलने वाले पानी में अब मिनरल्स कम पाए जाने लगे… बल्कि पता नहीं कितने तरह के मिनरल्स घुल गए.. डाइरेक्ट पीने लायक तो बिल्कुल भी नहीं.

कुंए से बाहर निकालो तो गंदी गंध और रंग पता नहीं कैसा-कैसा? मुँह तक में छींटा नहीं मार सकते… दामोदर नदी में कल-कल करके बहता छन-छन आर-पार दिखाई देता पानी कब सीमेंट जैसी दिखाई देने लगी पता भी न चला…

बिना फिल्टरेशन के पानी पीना दुश्वार सा हो गया… पता नहीं ऐसा कौन सा शहर है जहाँ घर में कुंआ या चापानल (हैंडपंप) हो जिससे कि डाइरेक्ट पानी निकाल के पीया जाता हो!

म्युनिसिपैलिटी का फिल्टर पानी सप्लाई होने पर भी घर में केंट से ले कर तमाम तरह के RO वाटर फिल्टर लगे होते हैं. यह एक स्टेटस का पैमाना भी बनता जा रहा है.

शहर की ज्यादा बीमारियां इन्हीं पीने के पानी के कारण ही होती हैं. पता नहीं किस तरह का विकास हो रहा है.

मैया आज भी जिंदा है और अभी और भी जियेगी… टीवी में दिखाई देने वाली पानी की बोतल अब मेरे अँगने में भी इधर-उधर लुढ़कती नजर आ जाती हैं लेकिन ज्यादातर बोतल मेरे ट्रेन सफर के दौरान ली गई बोतलें ही है…

मैया आज भी बड़े आश्चर्य से पूछती है “के टका लो हो रे ई पनिया के?”

लेकिन अपने कुँए का जब पानी पीता हूँ तो तमाम बोतल बंद और म्युनिसिपैलिटी का फिल्टर पानी एकदम से फ़ेल, बिल्कुल ही बकवास.

लेकिन जिस तेज गति से हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं, हमें अनुमान या डर था कि एक न दिन जिस पानी को हम सहज भाव से ही खर्च करते थे/ हैं, कोई लोभ-लालच नहीं, शादी-ब्याह से लेकर तमाम तरह के दैनिक और कृषि कार्य के लिए, वो कहीं व्यासयायिक रूप न ले ले?

और देखिये कि ये समय, मात्र 18 साल भी न लगे कि अमल में आना शुरू हो गया.

कल नावाडीह वासी एक फेसबुक मित्र के वाल पर ये पोस्टर अपलोड देखा जहाँ वो मिनरल वाटर बेचते हुए नजर आये… शादी-ब्याह और पार्टी में ऑर्डर लेते नजर आए.

मैंने देखते ही कमेन्ट किया.. “अरे वाह अब नावाडीह में भी पानी बिक्री शुरू..! मने अब नावाडीह भी तरक्की की राह में अग्रसर? वेरी गुड!”

मुझे इंतजार तो उस दिन का भी है जब मैं अपने कुंए से पानी निकालूँ और वो पीने लायक न हो और वो पानी फिल्टरेशन के दौर से गुजरे फिर मेरे घर की टंकी में आये!! और मैं उसका पैसा भरूँ!!..

और ये दिन भी जल्द ही आयेगा… क्योंकि भारत इंडिया जो बन रहा है!! विकास जो हो रहा है.

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