वामपंथी जिससे बहस में हार रहे हों, वह है फ़ासिस्ट

पिछले दिनों नोम चॉम्सकी से किसी बात पर मत मिलने की दुर्घटना से दुखी ही था कि एक और दुर्घटना हो गई.

बेटे ने बताया, पॉलिटिकल कम्पास टाइप का कोई कॉन्सेप्ट है. यानी मैथेमैटिकली कैलकुलेट किया जा सकता है कि आपका राजनीतिक चरित्र क्या है.

एक ग्राफ में एक्स एक्सिस पर आपकी इकोनॉमिक पसंद को लेफ्ट बनाम राइट में दिखाया जाता है, तो वाई एक्सिस पर आपकी सोशल नीतियों पर ऑथोरिटोरियन बनाम लिबर्टोरियन में आपको जाँचा जाता है. (चित्र देखें).

[वामपंथ : सुनने में बहुत गूढ़, समझो तो कोरा प्रलाप]

विभिन्न विषयों पर कई प्रश्न पूछे जाते हैं आपके ओपिनियन जानने के लिए और उस आधार पर आपको दक्षिणपंथी बनाम वामपंथी और स्वतंत्रतावादी बनाम अधिनायकवादी माना जाता है.

अब मुझे इसमें तो कोई शक नहीं है कि मैं वामपंथी नहीं हूँ. और इस बात पर भी अक्सर लिखता रहता हूँ कि शासक को निर्द्वन्द्व होकर सख्ती से शासन करना चाहिए.

तो मैं आश्वस्त था कि मैं कहाँ आऊँगा. पर इंटरनेट के परिणामों ने मुझे झकझोर दिया. इस फॉर्मूले के आधार पर मैं ठीकठाक लेफ्टिस्ट, और बहुत थोड़ा सा शासनवादी (या अधिनायकवादी) था.

यानी मुझे लगा था मैं फर्स्ट क्वाडरेन्ट में ऊपर कहीं होऊंगा, पर मैं सेकंड क्वाडरेन्ट में नीचे था.

तो मैं आज भी वामपंथी हूँ? कुछ तो गड़बड़ है… पश्चिम में वामपंथ की परिभाषा हमारे देश से बिल्कुल अलग है. पर यह परिभाषा का विषय नहीं है, इन शब्दों के प्रयोग का विषय है.

तभी आनंद राजाध्यक्ष जी ने एक पुस्तक का ज़िक्र किया – लिबरल फासिज्म. जोनाह गोल्डबर्ग की अत्यंत चर्चित पुस्तक है, पर मेरे लिए नई थी. तो इसपर आगे छानबीन की.

गोल्डबर्ग लिखते हैं, फासिज्म और नाज़िस्म में और वामपंथ में ज्यादा अंतर नहीं है. ये दोनों सोशलिस्ट ही थे. नाज़ी तो नेशनल सोशलिस्ट ही कहलाते थे. उनकी आर्थिक नीतियाँ तो हूबहू वामपंथी ही हैं.

फिर उन्हें वामपंथ का विरोधी ध्रुव क्यों कहा जाता है? कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि अपने अतिवादी रूप में ये दोनों घड़ी के जैसे एक दूसरे के पास ही आ जाते हैं. एक क्लॉक-वाइज और दूसरा एन्टी क्लॉक-वाइज.

पर गोल्डबर्ग ने इस घड़ी वाली थ्योरी को खारिज किया है. कहते हैं, यह भ्रम एक झूठ का परिणाम भर है. और यह झूठ वामी लिबरलों ने फैलाया है. बल्कि मुसोलिनी अपनी पीढ़ी का सबसे प्रबुद्ध और प्रख्यात सोशलिस्ट विचारक हुआ है और सोवियत कैम्प में उसका बहुत ही गहरा प्रभाव था.

फासिज्म और कम्युनिज्म के बीच की यह लड़ाई विरोध नहीं, प्रतिद्वंदिता है. जैसे पेप्सी और कोक के बीच का कोला-वॉर. दोनों चरित्र से एक जैसे थे. दोनों एक ही वर्ग में समर्थन के लिए प्रतियोगी थे. इसलिए एक दूसरे को सबसे ज्यादा गालियाँ दी हैं.

और कम्युनिस्ट शासन के शक्ति केंद्र स्टालिन ने घोषित कर दिया कि जिस किसी भी सोशलिस्ट ग्रुप की निष्ठा मॉस्को को प्रति नहीं है, उन्हें सोशलिस्ट नहीं फ़ासिस्ट बुलाया जाये और शत्रु प्रचारित किया जाए.

साथ ही वामपंथियों ने अपनी जो परिभाषा लिख छोड़ी है. उसके हिसाब से हर राजनीतिक सद्गुण पर उनका एकाधिकार है. स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्य, अभिव्यक्ति का अधिकार, स्त्रियों के अधिकार, समानता, न्याय… हर शब्द के ऊपर कुंडली मारकर बैठ गए हैं और उनकी मनमानी व्याख्या सुविधानुसार कर रखी है.

तो आपके पास कोई चारा नहीं है… आपको लेफ्टिस्ट ही होना हुआ… क्योंकि राइटिस्ट तो लालची, क्रूर, स्वार्थी घृणित लोग हैं… यह सिर्फ शब्दों के एकाधिकार का खेल है.

गोल्डबर्ग ने फ़ासिस्ट की बहुत सरल परिभाषा सुझाई है… वामपंथी लिबरल जब भी कोई तर्क हारने लगते हैं तो सामने वाले व्यक्ति को फ़ासिस्ट घोषित कर देते हैं. इस आधार पर एक फ़ासिस्ट वह है, जिससे वामपंथी एक बहस में हार रहे हों.

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