वामपंथ : सुनने में बहुत गूढ़, समझो तो कोरा प्रलाप

मेरे वार्ड में एक मरीज़ है… डिमेन्शिया है उसे. डिमेन्शिया सिर्फ भूलने की बीमारी नहीं है. इसमें सोचने समझने की शक्ति, मामूली से मामूली काम करने की क्षमता, सब कुछ खत्म हो जा सकता है.

उस बेचारी महिला का डिमेन्शिया बहुत ही बुरा है. उसे सुबह शाम कुछ नहीं समझ आता. कहाँ है… नहीं जानती, किसी को नहीं पहचानती. यूँ ही एक किनारे से दूसरे तक भटकती है.

उसकी किसी बात का कोई मतलब नहीं होता. पर कुछ वाक्य वह इतनी स्टाइल से बोलती है कि समझ में नहीं आता कि बिना कुछ सोचे समझे बोल रही है.

वह आपके पास आकर बहुत ही खास अंदाज़ से बोलेगी – ओके, कम ऑन नाउ… सो व्हेयर आर वी गोइंग?… डोंट बी सिली… सो, हाऊ आर वी? लेट्स गो… कम ऑन…

पहली बार तो आप ध्यान से सुनते हैं कि वह कुछ कहने की कोशिश कर रही है… कुछ बार सुन कर समझ में आ जाता है कि यह प्रलाप है… पर एक बहुत ही वेल ट्रेंड प्रलाप है… एक बार तो किसी बहुत ही गूढ़ बात का भ्रम देती है…

एक दिन मैंने कहा – इस महिला को सुनो… इसके दिमाग का एक भी न्यूरॉन काम नहीं करता. पर यह एक बड़ी सामाजिक उपलब्धि है कि यह बिना कुछ सोचे समझे भी बोलती है तो भी एक विशेष तरह की संभ्रांतता का भ्रम देती है. यह समाज की बड़ी उपलब्धि है कि हर किसी को एक तरह से बात करने के लिए प्रशिक्षित कर दिया गया है…

एक बन्दे ने कहा – हाँ, यह एक भयावह अवस्था है… हर किसी को एक जैसा बोलने के लिए प्रशिक्षित कर दिया गया है… एक जैसा सोचने के लिए भी… मैं नोम चॉम्स्की की एक किताब पढ़ रहा था… उसमें उसने भी इसी बात का ज़िक्र किया है…

नोम चॉम्स्की को मैं हल्का फुल्का ही जानता हूँ. हार्वर्ड और एमआईटी का कोई वामपंथी है. वामपंथी सोच की दुनिया में बड़ा नाम है. मुझे आश्चर्य हुआ, मेरी सोच चॉम्सकी से कैसे मेल खा रही है?

चॉम्सकी का सिर्फ नाम ही सुना है, उसका अपना लिखा-कहा कुछ सुना-पढ़ा नहीं है. तो आज उसकी एक स्पीच चुना सुनने के लिए.

विषय था – मुसलमान अमेरिका से क्यों घृणा करते हैं?

बहुत कुछ उसने कहा अमेरिकी इतिहास के बारे में, वैश्विक राजनीति के बारे में, जो काफी विद्वतापूर्ण और जानकारी देने वाला लगा. फिर जैसे जैसे उसकी स्पीच आगे बढ़ती गई, मैंने उसकी स्पीच के निष्कर्षों का सारांश निकालना शुरू किया.

विद्वता के मकड़जाल से निकलकर जो सामने आया, वह कुछ यह था – अमेरिका एक दुष्ट और क्रूर देश है… कुछ मुसलमानों को छोड़ दें (यानि उनकी बात ना करें) तो ज्यादातर मुसलमान बिल्कुल बुरे नहीं हैं…

वे सिर्फ अमेरिका से प्रताड़ित हैं. अमेरिका दुनिया में सभी भ्रष्ट और दुष्ट शक्तियों को प्रश्रय देता है. मुसलमान प्रगति और लोकतंत्र चाहते हैं, और अमेरिका इसमें बाधक है… इसीलिए वे अमेरिका से घृणा करते हैं…

9/11 की घटना कोई अकेली घटना नहीं थी… दुनिया में इससे बड़ी बड़ी घटनाएँ हुई हैं, लड़ाइयाँ हुई हैं, लोग मारे गए हैं… अगर अमेरिका में मारे गए तो इतनी कौन सी बड़ी बात हो गई जिसका बदला लेने के लिए अमेरिका किसी पर हमला करे?

यूरोपियनों ने दुनिया में बहुत खून बहाया है. अंग्रेजों ने भारत में बहुत खून बहाया है… भारत काश्मीर में बहुत खून बहा रहा है…

आतंकवाद क्या है? एक राजनीतिक या आइडियोलॉजिकल उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शक्ति का प्रयोग आतंकवाद है. अमेरिका अपने राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मध्य-पूर्व में और अफगानिस्तान में शक्ति का प्रयोग कर रहा है… यह आतंकवाद है…

आतंक के विरुद्ध युद्ध, या आतंकियों को मारना अनैतिक है… आतंकियों को पकड़ कर उन्हें न्याय का मौका दिया जाना चाहिए… उनपर निष्पक्ष अदालतों में मुकदमा चलाया जाना चाहिए… जॉर्ज बुश और टोनी ब्लेयर पर भी मुकदमा चलाना चाहिए…

यहूदियों ने बहुत अत्याचार झेलें हैं… उनसे बहुत भेदभाव किया जाता था… आज इस भेदभाव का स्वरूप बदल कर अरबों के विरुद्ध भेदभाव किया जाने लगा है…

यानि हर बात एक तर्कसंगत सुनाई देने वाले वाक्य से शुरू होती है और पलटी मारकर अगली साँस में आतंकियों के समर्थन या बचाव में खड़ी हो जाती है.

ये मानवता के रक्षक और समानता और स्वतंत्रता के पुजारी हैं… पलक झपकते ही आतंकवादियों के समर्थक, संरक्षक, प्रवक्ता बन जाते हैं… इनके उठाये संदर्भ और प्रसंग बिल्कुल सही होते हैं, निष्कर्षों तक पहुँचते पहुँचते विकृत हो जाते हैं.

मुझे डिमेन्शिया की वह मरीज़ याद आ गयी, जिसके संदर्भ में नोम चॉम्सकी की चर्चा शुरू हुई थी… लगता है कुछ कहना चाहती है… पूरी बात सुनने पर समझ में आता है कि बात का कुछ भी अर्थ नहीं है…

कुछ ऐसी ही है वामपंथ की बातें … सुनने में बहुत गूढ़ मालूम होती हैं… पूरी बात सुनो तो समझ में आता है कि कोरा प्रलाप है…

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