कोई चमत्कार ही उबार सकता है डूबती कांग्रेस को, राहुल के तो बस की बात नहीं

पिछले दिनों धर्मपत्नी उत्तराखंड में तुंगनाथ के ऊपर पहाड़ों में ट्रेकिंग कर रही थीं. रास्ते में एक चाय की दुकान पर विश्राम करते और चाय पीते गुजरात से आये ट्रेकर्स का एक दल मिल गया.

हैल्लो हाय हुई, तो बातचीत का सिलसिला चल पड़ा. अब गुजरातियों से आज के ज़माने में आप मोदी जी के अलावा क्या बात कर सकते हैं…

सो धर्मपत्नी जी ने चुटकी ली… अब तो आप लोग कांग्रेस को वापस ला रहे हैं गुजरात में…

अजी नही… गुजरात मे सिर्फ मोदी जी ही रहेंगे…

पर पटेलों पाटीदारों ने तो हार्दिक को अपना नेता चुन लिया बताते हैं…

अजी छोड़िये… हम लोग खुद पटेल ही हैं… और हमारे नेता सिर्फ मोदी जी ही हैं… गुजराती लाख नाराज़ हो जाये, रोये गाये, शिकायत करे… पर वोट मोदी जी को ही देगा.

पर मोदी अब कहाँ? वो तो दिल्ली चले गए… अब तो रुपाणी साहब बैठे हैं…

गद्दी पर चाहे जो बैठे, इस से फर्क नही पड़ता… हमने मोदी जी को वोट दिया है… आगे भी देंगे… गुजरात का वोट सिर्फ मोदी को…

सीटें कितनी आएंगी?

150…

इतनी सीटें??? इतनी तो आज तक कभी नहीं आईं…

तभी एक महिला बोल पड़ी… जीतेगी भाजपा ही… सीटें कम ज़्यादा हो सकती हैं… 100 हो जाएं, 110 हो या 120… जीतेगी भाजपा ही…

यक्ष प्रश्न ये है कि गुजरात में भाजपा कितनी सीट ले के आएगी.

पिछले 3 सालों के विधानसभा चुनाव उठा के देखिये… भाजपा ने तकरीबन हर राज्य में अपनी सीट संख्या में सुधार किया है. न सिर्फ संख्या में सुधार किया बल्कि वोट प्रतिशत भी सुधारा.

2012 में मोदी जी ने गुजरात में मुख्यमंत्री बनने के लिए वोट मांगा था. तब उनके प्रधानमंत्री बनने की चर्चा नहीं थी.

2014 में उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के लिए वोट मांगा था और गुजरात ने 60% वोट दे के उनकी झोली भर दी.

कौन थे वो 60% लोग?

इस से पहले भाजपा को अधिकतम 48% के आसपास वोट मिलता आया है. तो आखिर वो 12% लोग कौन थे जिन्होंने पहली बार भाजपा को वोट दिया???

क्यों दिया?

सिर्फ इसलिए दिया कि एक गुज्जु भाई… अपने मोदी जी, देश के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं.

गुजरात के लिए ये बड़े गौरव की बात है. गुजराती इस गौरव को न भूले हैं, न भूलेंगे.

भाजपा चूंकि हर राज्य में एक नई ऊंचाई छू रही है, सो गुजरात मे भी छुएगी.

कांग्रेस हर जगह एक नई गहराई में गिर रही है, सो गुजरात मे भी नया गहराई हासिल करेगी.

अगर कांग्रेस 25 सीट या उससे भी कम पर सिमट जाए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा.

अब तक का जो चुनाव अभियान है उससे ये समझ आया है कि कांग्रेस और इनके युवराज के पास न कोई मुद्दा है, न रणनीति.

अपनी पहली ही रैली में जिस तरह से अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मवानी और हार्दिक पटेल का नाम लिया और इन तीनों को प्रमोट किया उस से सिद्ध हो गया कि कांग्रेस के पास न मुद्दे हैं और न चेहरे.

सबसे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि गुजरात के तमाम स्थानीय नेता नेपथ्य में चले गए हैं. उनमें से किसी को भी कोई नही पूछ रहा. शक्ति सिंह गोहिल, अर्जुन मोढवाडिया, या भरत सिंह सोलंकी परिदृश्य से गायब हैं और सारी स्पेस राहुल जी के ये तीन बंदर लूट रहे हैं.

दूसरी बात ये कि गुजरात भाजपा विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़ रही है… उसके आइकॉन विकास पुरुष मोदी हैं. और कांग्रेस… वो आज भी 60 और 70 के दशक के घिसे पिटे हथकंडे – जातिवाद और आरक्षण पर चुनाव लड़ रही है.

वो अपने तमाम पुराने नेताओं को दरकिनार कर पटेल आरक्षण के चेहरे हार्दिक पटेल और ओबीसी अल्पेश ठाकोर और दलित नेता जिग्नेश मवानी की जातीय पहचान को उछाल कर चुनाव लड़ रही है.

मुद्दे के नाम पर इनके पास क्या है? पटेल आरक्षण? नोटबन्दी और GST जैसे ऐतिहासिक दुस्साहसिक Path Breaking Economic Reforms की आलोचना कर लोगों की भावना और गुस्सा भड़का के चुनाव लड़ना चाहती है.

कांग्रेस एक ऐसे दलदल में फंस चुकी है और इंच दर इंच डूबती जा रही है कि इसे अब कोई चमत्कार या चमत्कारी नेता ही उबार सकता है. राहुल गांधी के नेतृत्व में ये चमत्कार हो पायेगा, ऐसा लगता तो नही है.

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