भानुमति – 7

किसी समय के दरिद्र और आज कुरुसत्ता के एक मजबूत स्तम्भ, श्रेष्ठ गुरु और कुरुओं के महान सैनिक नेता आचार्य द्रोण युद्धशाला में अपने नित्य के आसन पर बैठे थे.

युवराज दुर्योधन, महावीर कर्ण और भयंकर दिखने वाले अश्वत्थामा सम्मुख खड़े अपने पुष्कर विजय का समाचार देने आये थे परंतु गुरु से डाँट खा रहे थे.

“मैंने तुम लोगों से चेकितान का हृदय जीतने को कहा था, तुम लोगों ने उसका राज्य छीन लिया?”

दुर्योधन प्रशंसा सुनने आया था, फटकार सुन स्तम्भित रह गया. उदण्ड स्वर में बोला, “गुरुदेव, वह बड़ा दुराग्रही था. वह सदैव हमारा मित्र नहीं बना रहता”.

“क्या ये बच्चों की मित्रता है जो अटूट रहेगी? राजनीति में कोई स्थायी शत्रु या मित्र नहीं होता दुर्योधन. चेकितान हमारा मित्र भले ना बनता, पर तुम उसे शत्रु बना आये.

चेकितान यादव है जिसे द्वारका के राजा उग्रसेन ने पुष्कर का कार्यभार सौंपा है. तुमने चेकितान को नहीं, अपितु कृष्ण एवं बलराम को अपना शत्रु बनाया है.”

कर्ण विनीत स्वर में बोला, “परन्तु गुरुदेव, कौरव भी इतने सामर्थ्यहीन नहीं हैं. युवराज ने तो यह सोचकर पुष्कर पर विजय प्राप्त की कि इससे हम द्वारका, विराट और शाल्व पर दृष्टि रख सकें.”

“अच्छा, और इतने बड़े राजमार्ग की रक्षा कौन करेगा? जिसके सिरे पर यादव हों, पूरे रास्ते यादव बस्तियां हों, जिसके एक तरफ द्रुपद और दूसरी तरफ विराट व शाल्व हों, ऐसे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए तुम लोगों को अनुमान भी है कि कितना धन और मानव संसाधन व्यर्थ व्यय होगा. जाओ, तुम सब यहां से जाओ. विश्राम करो, और मुझे सोचने दो कि इस कठिनाई से कैसे निकला जाए. मैं इस विषय पर महामहिम भीष्म से परामर्श करूँगा. मेरा आशीर्वाद लो और जाओ.”

उन सभी के जाने के पश्चात द्रोण विचार करने लगे. चेकितान वीर है और यादव है. यादवों का नेता कृष्ण आजकल आर्यावर्त को अपने जैत्र रथ से नाप रहा है. अभी द्रुपद का अतिथि है और कदाचित उनका जमाता बनने वाला है. कृष्ण का मित्र विराट है और शाल्व भी उसका साथ देगा. अगर ये सब मिल जाएं तो हस्तिनापुर पर भारी पड़ेंगे. वैसे भी पांडवों के ना होने से कुरुओं की सामरिक शक्ति कमजोर हुई है, और उनके निर्वासन व स्वर्गवास से कई कुरुसरदार असंतुष्ट बैठे हैं.

“हाँ शंख, कुछ कहना चाहते हो”, गुरु ने सम्मुख खड़े अपने अधेड़ उम्र के शिष्य से पूछा. शंख युद्धशाला में छात्र चयन समिति का प्रमुख था. शंख ने कहा, “गुरुदेव तीन अभ्यर्थी गुरुकुल में प्रवेश के अभिलाषी हैं. परंतु तीसरा लड़के से अधिक लड़की है.”

“उसे जाने के लिए कह दो. मैं कोई ऐसा शिष्य नहीं चाहता जो लड़के से अधिक लड़की हो.”

“वह नहीं जाएगा गुरुदेव. कल प्रातः से ही उसने आपसे मिले बिना भोजन ग्रहण करने से मना कर दिया है.”

“ठीक है, तीनों को बुलाओ.”

शंख तीनों को ले आता है. गुरु पहले लड़के से पूछते हैं, “अपना परिचय दो बालक”.

“मैं भद्र, आपकी सेना में कार्यरत एक सारथी का 10 वर्षीय पुत्र हूँ गुरुदेव.”

“हूँ, तो तुम सारथी बनने का प्रशिक्षण चाहते हो?”

“ये भी गुरुदेव, पर मैं मुख्यतः शस्त्र विद्या का अभिलाषी हूँ.”

गुरुदेव दूसरे बालक से भी यही प्रश्न पूछते हैं, जो किसी कुरु ग्राम के व्यापारी का पुत्र था एवं शस्त्रविद्या का अभिलाषी था. द्रोण कठोरता से उन दोनों से प्रश्न पूछते हैं और सन्तुष्ट होने पर पितृवत स्नेह से कहते हैं, “पुत्रों, यदि तुम परिश्रम करोगे तो मैं भी तुम्हें उत्कृष्ट योद्धा बनाने के लिए परिश्रम करूँगा”.

सभी के जाने के बाद गुरु तीसरे लड़के को ध्यान से देखते हैं जो सहमा सकुचाया सा खड़ा था. कमानीदार भवें, गहरी आंखें, रक्तिम कपोल, मुलायम केश, सीने पर कसकर बांधा गया कपड़ा, और नितंबों की बनावट सारा भेद खोल रही थी. जब उसने कुछ पग चलकर गुरु को प्रणिपात किया तो उसकी चाल में स्त्रियोचित माधुर्य था. इन सभी बातों के अतिरिक्त बालक विनयशील और दृढ़ प्रतीत होता था. गुरु द्रोण सहज ही उसकी तरफ आकर्षित हुए और पूछा, “तुमने कल से भोजन क्यों नहीं ग्रहण किया वत्स?”

“मुझे गुरुकुल से चले जाने के लिए कहा गया था देव, परन्तु मेरे जीवन का ध्येय तो आपका शिष्य बनना है.”

“तुम्हारी आयु क्या है वत्स?”

“सोलह वर्ष.”

“परन्तु तुम तो बारह वर्ष से अधिक के नहीं लगते. अस्तु, क्या तुमने वेदाभ्यास किया है?”

“हाँ गुरुदेव.”

“और धनुर्विद्या की प्रारंभिक शिक्षा?”

“प्राप्त की है गुरुदेव.”

“गदायुद्ध?”

“वह मैं आपके श्रीचरणों में प्राप्त करूँगा देव.”

“हूँ, और मल्लयुद्ध?”

लड़का थोड़ा सकुचाया, पर जब बोला तो उसके स्वर दृढ़ थे, “नहीं गुरुदेव, मेरे आचार्यों ने मुझे गदा और मल्लविद्या नहीं सिखाई. उन्हें लगता था कि मैं लड़की हूँ.”

द्रोण थोड़ा मुस्कुराए और बोले, “लड़कियों को तो मैं भी शिक्षा नहीं देता वत्स. उनके लिए योग्य गुरु मेरे गुरुकुल में नहीं. तुम अपना पूर्ण परिचय दो ब्रह्मचारी.”

“मैं ब्राह्मण नहीं हूं देव. कौशिक क्षत्रीय हूँ. मेरी स्वर्गीय माता काशी की राजकन्या थी. और मेरे पिता, मेरे पिता आपके शत्रु पांचाल नरेश यज्ञसेन द्रुपद हैं.”

अभी तक मंद-मंद मुस्कुराते द्रोण की हँसी विलुप्त हो गई, वे चौकन्ने हो गए. सशंकित द्रोण बोल पड़े, “ओह, तो जो सुना, वह सच है. द्रुपद का एक पुत्र वास्तव में पुत्री है.”

“इसमें मेरे पिता का दोष नहीं गुरुदेव. वे तो आज भी कहते हैं कि मैं वास्तविकता स्वीकार कर लूं. मेरा जन्म ननिहाल में हुआ था, जहां मेरी शंकालु माता ने यह समझकर कि पिता को पुत्र चाहिए था, पुत्री होने पर वे कुपित होंगे, उन्हें मिथ्या समाचार भिजवाया. दस वर्ष की अवस्था में माता की मृत्यु पश्चात मुझे काम्पिल्य लाया गया जहां ये भेद खुला.”

“पर तुम तो विवाहित भी हो?”

“हाँ गुरुदेव, छह वर्ष की अवस्था में दशार्ण की राजकुमारी का प्रस्ताव आया था जिसे पिता ने स्वीकार कर लिया. कठिनाई यही है गुरुदेव, अब राजा हिरण्यवर्मा अपनी पुत्री को विदा करना चाहते हैं. यदि वे आ गई तो सारा भेद खुल जायेगा देव. मेरे कारण मेरे पिता एवं पूरे साम्राज्य को नीचा देखना होगा. मेरे पास कोई रास्ता नहीं था देव, मैं आत्महत्या करने जा रहा था कि मुझे वे मिले. उन्होंने मुझे आपके पास भेजा.”

“मेरे पास, परन्तु क्यों? जिसने भी तुम्हें मेरे पास भेजा है वह अवश्य ही कोई मूर्ख व्यक्ति होगा.”

“नहीं देव, वे पृथ्वी पर सभी जीवित मनुष्यों में सबसे अधिक बुद्धिमान हैं.”

“अच्छा! क्या नाम है उनका.”

“वे कृष्ण वासुदेव हैं देव.”

द्रोण को एक झटका सा लगा. उन्हें लगा कि ये कृष्ण उनके चारों ओर कोई जाल बुन रहा है. द्रुपद की एक पुत्री से विवाह, और दूसरी पुत्री को उनके पास भेजने का क्या प्रयोजन हो सकता है? उन्होंने पूछा, “कृष्ण? वे तो द्रौपदी से विवाह करने वाले हैं ना?”

“मेरे पिता ने यह प्रस्ताव किया था, परन्तु जनार्दन ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे मेरे पिता के क्रोधोन्माद की आहुति बनने हेतु सज्ज नहीं हैं.”

द्रोण को लगा कि वे स्वप्न में ऐसी बात सुन रहे हैं. ऐसा प्रस्ताव कौन युवक ठुकरा सकता है. उन्हें लगा कि उनके अंदर कुछ परिवर्तित हुआ है. कुछ समय मनन करने के पश्चात उन्होंने पूछा, “कृष्ण के इतने अधिक नाम क्यों हैं. मेरा प्रिय अर्जुन भी कई नामों से प्रसिद्ध था. हाँ! तो उन्होंने तुम्हें यहां क्यों भेजा?”

“गुरुवर, जब कृष्ण वहां आये तो मैंने देखा कि सबमें सकारात्मक ऊर्जा भर आई है. मेरे क्रोधित पिता, अदम्य भाई, दृढ़ बहन, सबमें कुछ सुखद परिवर्तन सा हुआ. उसी समय मेरी ससुराल से दूत ने आकर सूचित किया कि कुछ ही दिनों में राजा हिरण्यवर्मा अपनी पुत्री, अर्थात मेरी पत्नी को लेकर काम्पिल्य आ रहे हैं. मैं डर गया था, कोई उपाय ना देख मैंने मृत्यु की शरण जाने का निश्चय किया. परन्तु वहां स्वयं कृष्ण थे. मैं रात्रि में उनसे मिलने गया. वे मेरे साथ नदी तट पर टहलते हुए मेरी व्यथा सुनते रहे. उन्होंने मेरे अश्रु पोंछे, मेरे गाल थपथपाए जैसे मैं कोई बच्चा होऊं.

उन्होंने मुझसे कहा कि वत्स, जब तक धर्मयुक्त जीवन जीने का विकल्प हों, मरना नहीं चाहिए. तुम मरना ही चाहते हो तो मैं तुम्हें सम्मानपूर्वक मरने का मार्ग बताऊंगा. योद्धा बनो और किसी युद्ध में क्षत्रिय के समान वीरगति प्राप्त करो. गुरु द्रोण के पास जाओ, इस संसार में वही हैं जो किसी स्त्री को सच्चा योद्धा बना सकते हैं.”

“और तुमने उनका विश्वास कर लिया?”

“मेरे पास कोई विकल्प कहाँ था गुरुदेव. जब वे बोल रहे थे तो जैसे इस संसार में सिर्फ दो ही व्यक्ति थे, एक वे और दूसरा मैं. उन्होंने मुझसे कहा कि तुम पिता की अनुमति के बिना मरने जा रहे थे तो उनकी इच्छा के विरुद्ध उत्तम जीवन जीने के लिए जीवित भी रह सकते हो. गुरु द्रोण के पास जाओ. वे भले ही तुम्हारे पिता के शत्रु हैं पर वो गुरु-शिष्य परम्परा के ध्वजवाहक हैं, वे किसी भी सच्चे शिष्य को विमुख नहीं कर सकते. उनके समक्ष सच्चे हृदय से जाना, मन में द्वेष का लेश भी ना रखना. उन्हें अपना पिता मानना.”

अचंभित द्रोण ने कहा, “और तुम यहाँ आ गए?”

विनीत शिखंडी ने उत्तर दिया, “हाँ गुरुदेव, मैं आपकी शरण में हूँ. आप मेरे आध्यात्मिक पिता हैं”.

द्रोण सोचते रह गए कि ये कृष्ण तो वास्तव में चमत्कारी है. मरने जा रहे व्यक्ति के अंदर जीवन का संचार तो कोई चमत्कारी ही कर सकता है. उसे मुझपर भी इतना विश्वास है कि शत्रु की पुत्री को मेरी शरण में भेज दिया, आश्चर्य.

द्रोण गदगद स्वर में बोले, “शिखंडी, मैं तुन्हें स्वीकार करता हूँ. मैं तुम्हें उत्कृष्ट योद्धा बनाऊंगा, परन्तु क्या तुम पुरुष भी बनना चाहते हो?”

“चाहता हूं गुरुदेव, पर जानता हूँ कि ये सम्भव नहीं.”

“मेरे प्रश्न का स्पष्ट उत्तर दो वत्स.”

“हाँ गुरुदेव, मेरा पुरुष मन इस स्त्री शरीर को स्वीकार नहीं कर पाता. आशीर्वाद दें गुरुदेव.”

“सोच लो शिखंडी. तुम्हारे इस सुंदर शरीर को काटा जाएगा, छीला जाएगा, कूटा जाएगा, मर्मान्तक पीड़ा होगी वत्स. महीनों तुम्हें कड़वी जड़ीबूटियों पर निर्भर रहना होगा, अन्न और कभी-कभी जल भी नहीं मिलेगा.”

“मैं सब सहूंगा गुरुदेव.”

“ठीक है. तुम इस आश्रम में ब्रह्मचारी के भेष में रहोगे. पर पहले तुम्हें यक्ष स्थूलकर्ण के पास भेजा जाएगा. वह विलक्षण व्यक्ति है, स्त्री से पुरुष बनाने वाली शल्य विद्या उसे आती है. शंख तुम्हें उसके पास ले जाएगा. मेरा आशीर्वाद लो पुत्र, तुम्हें इतिहास याद रखेगा.”

भानुमति – 6

भानुमति -5 : कृष्ण हैं हृषिकेश, इंद्रियों के स्वामी

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  1. अदभुत कहानी सुना रहे है आप. बड़ी रुचिकर और बांध कर रखने वाली लेखनी है आपकी.

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