भानुमति – 6

विदुर की सूचना पर कृष्ण पांडवों का पता लगाने हेतु स्वयं ही अभियान पर निकलना चाहते थे परंतु जगत्प्रसिद्ध वासुदेव कृष्ण के लिए ऐसा कर पाना असंभव था.

लोग उनके दर्शन को इतने व्यग्र हो जाते कि उनका प्रेम देख कृष्ण उन्हें मना भी तो नहीं कर पाते थे. वे लम्बी अवधि तक छद्मवेश भी नहीं रख सकते.

उनकी पहचान मोरमुकुट और पीताम्बर को एकबारगी हटा भी लें पर अपने आकाश की रंगत वाले वर्ण का क्या करें.

जैसे भगवान राम की हर समस्या मारुत पुत्र हनुमान सुलझा लेते थे, यहां कृष्ण के लिए उद्धव. बिना अनुमति लिए ही वे नागराज आर्यक के वनों में चले गए थे.

उन्होंने कूटसूचना भिजवाई थी कि कुछ महीनों पूर्व ‘कुछ ब्राह्मणों और एक वृद्धा’ को वन में देखा गया था.

इनमें से एक ब्राह्मण बहुत विशाल एवं बलिष्ठ था जो वृद्धा और कभी कभी अपने अन्य साथियों को अपने कंधे पर बिठा कर चलता था.

काम्पिल्य के रास्ते में ही उद्धव ने दूसरी सूचना भिजवाई कि वे अनुसंधान करते हुए राक्षसावर्त चले गए.

वहां उन्हें राक्षसों के राजा वृकोदर मिले जो देवभाषा संस्कृत बोलते हैं, जिन्होंने पुराने राजा हिडिम्ब को मरणांतक युद्ध में पराजित कर राज्य पाया और कुमारी हिडिम्बा से विवाह किया.

वे कुछ ही महीनों में पुत्रवान होने वाले हैं. उनके अन्य साथी और वो वृद्धा स्त्री इस वन में नहीं रहना चाहते, और राजा की पुत्रप्राप्ति के पांच महीनों पश्चात यहां से प्रस्थान करना चाहते हैं.

इधर कृष्ण का दल जलमार्ग से होता हुआ काम्पिल्य से एक पड़ाव पहले एकचक्रा तीर्थ पर आकर रुका. परम्परा अनुसार युवराज धृष्टधुम्न और प्रधानमंत्री उद्बोधन ने उनका स्वागत किया. फिर अतिथियों और आतिथेयों की सम्मिलित नौकाओं ने यात्रा प्रारंभ की. यात्रा अवधि में कृष्ण ने पाया कि धृष्टधुम्न एक संस्कारी युवा है, उन्हें यह जानकर भी संतोष हुआ कि यहां प्रजा सुखी और सम्पन्न हैं.

आश्चर्य की बात थी कि यहां का राजपरिवार कुंठित था, परन्तु इसका प्रभाव जनता पर नहीं पड़ने दिया गया. इसके उलट हस्तिनापुर का राजपरिवार अत्यंत प्रसन्न था पर प्रजा कुंठित थी.

राजा द्रुपद से औपचारिक भेंट के बाद उनके ही आग्रह पर वे सभी यात्रा की थकान मिटाने विश्राम करने चले गए. अगले दिन राजा द्रुपद ने उन्हें अपने व्यक्तिगत आम्रकुंज में बुलाया और कहा, “वासुदेव मैं यहां आपसे एक विचित्र प्रस्ताव करने वाला हूँ. गुरु संदीपनी से मैंने आपकी बहुत प्रशंशा सुनी है.”

“आदेश करें नरेश, मैं किस भाँति आपका सहायक हो सकता हूँ.”

“औपचारिकताएं छोड़िये वासुदेव, मैं आपसे अपनी पुत्री कृष्णा का विवाह करना चाहता हूं.”

“अभी आपने ही कहा कि औपचारिकता नहीं आनी चाहिए, तो क्या आप मुझे बताएंगे कि इस प्रस्ताव के पीछे असल कारण क्या है?”

ओह, कितना अच्छा होता कि इस युवक की अपेक्षा इसके पिता से बात करता, द्रुपद यही सोचते हुए बोले, “मैंने आपके बाहुबल की प्रशंसा सुनी है जिसने मल्लयुद्ध में कंस और चारुण जैसे योद्धाओं को हराया, आपका शाङर्ग भगवान शिव के त्रयम्बक के समान है, आपकी गदा विख्यात है और आपके कंधे पर रखा यह चक्र, इस शस्त्र का प्रयोग तो पीढ़ियों पहले हुआ करता था. आप बिना सारथी के चलते रथ से शरसंधान कर सकते हैं. हमने जरासंघ और कालनेमि से हुए संघर्ष में आपकी युद्धनीति सुनी है. गुरुकुलों में आपकी रणनीतियां शोध का विषय हैं.

वासुदेव, मैं स्पष्ट ही कहूँ तो मैं ऐसे वीर से अपनी पुत्री का विवाह करना चाहता हूं जो सर्वश्रेष्ठ वीर हो, जो द्रोण के विरुद्ध अभियान में मेरी सेनाओं को विजय दिलाए. मैं स्पष्ट ही पूछता हूँ वासुदेव, क्या आप ये प्रस्ताव स्वीकार करते हैं?”

“महाराज, आपका यह प्रस्ताव पाकर आर्यावर्त का कौन सा युवक प्रसन्न नहीं होगा. पर आपने स्पष्ट होने की बात की है तो मैं आपको निराश नहीं करना चाहता, और ना ही कुरुओं और पांचालों के मध्य युद्ध का कारण बनना चाहता हूं”.

“क्या आप द्रोण से डरते हैं?”

“इस यादव को सिर्फ एक चीज से डर लगता है, अधर्म से. कुरुओं और पांचालों का युद्ध अधर्म होगा महाराज.”

“धर्म-अधर्म की सीख मुझे न दीजिये वासुदेव. मैंने हमेशा धर्माचरण किया है. मेरी प्रजा से पूछिए कि क्या उनमें से कोई एक भी अप्रसन्न है, किसी के साथ कोई अन्याय हुआ है.

कुरुओं पर अभियान अधर्म है वासुदेव तो जब द्रोण ने पांचाल पर अपने शिष्यों द्वारा आक्रमण करवाया था तो वो क्या था? उसे क्या आप धर्म कहेंगे? एक राज्य पर बिना चुनौती दिए आक्रमण करना, राजा को साधारण बंदियों की तरह बेड़ियों में बांध किसी अहंकारी ब्राह्मण के चरणों में डाल देना, क्या धर्म था? आप बताइये कृष्ण कि पिछली बार आपने कब सुना कि किसी विजेता ने पराजित राजा से उसके राज्य का एक भाग छीन लिया, उस क्षेत्र के नागरिकों की सारी संपत्ति अपने अधिकार में लेकर उन्हें खदेड़ दिया.

तब क्यों नहीं किसी वासुदेव ने धर्म अधर्म का पाठ पढ़ाया था द्रोण को, या कुरुसत्ता को?”

कृष्ण द्रुपद की कटुता समझ रहे थे, सात्वना सी देते हुए बोले, “निश्चित ही ये द्रोण की गलती थी. यदि उनका कोई व्यक्तिगत अपमान हुआ भी था तो उन्हें इसे भूल जाना चाहिए था. आप ये भी मानेंगे कि यदि गुरु की आज्ञा नहीं होती तो अर्जुन सहित अन्य कुरुकुमारों ने आपके राज्य पर आक्रमण तथा आपका अपमान नहीं किया होता.”

द्रुपद हाँ या ना सुनने के लिए व्याकुल थे, बोले, “तो आप मेरी कन्या से विवाह नहीं करेंगे”.

“महाराज, तनिक धैर्य रखें और शांतमस्तिष्क से सोचे कि मुझसे विवाह करने पर लाभ होगा या हानि. मुझसे सम्बन्ध होते ही मगधराज जरासंघ और उसके करद राजे आपके शत्रु बन जाएंगे. वे आपके विरुद्ध अभियान भी कर सकते हैं. मैं समझ नहीं पाता कि इतनी दूर द्वारका में बैठे हम यादव कैसे आपकी सहायता कर पाएंगे. मैं भी हमेशा ही तो गंगा-यमुना के तट पर नहीं रुक सकता.”

“बच्चे मत पढ़ाइये वासुदेव, जरासंध यदि पांचाल पर आक्रमण करता है तो द्रोण कुछ भी कहें, कितनी भी शत्रुता हो, हस्तिनापुर की सीमाएं सुरक्षित रखने के लिए भीष्म अपनी सेना लेकर हमारी सहायता हेतु अवश्य आएंगे. आप अपना उत्तर दीजिये.”

“अवश्य, पर पहले मेरा एक प्रश्न. आपकी न्यायबुद्धि क्या कहती है महाराज, जैसे द्रोण ने अपने व्यक्तिगत अपमान का प्रतिशोध लिया, और अन्याय कर गए, क्या आप भी वही नहीं कर रहे. इस युद्ध में कितना निर्दोष रक्तपात होगा, आप भी समझते ही होंगे. आपका उद्देश्य द्रोण को नीचा दिखाना है तो मैं इसका उपाय आपको बताता हूँ. आप उनकी लकीर मिटाने की जगह अपनी लकीर बढ़ाइए. इतने बड़े बन जाइये कि द्रोण आपके सम्मुख गौण हो जाएं.

आप कृष्णा का स्वयंवर कीजिये. सच्चा स्वयंवर, जिसमें पुराने समय के अनुसार एक अत्यंत कठिन कसौटी हो. समूचे आर्यावर्त को आमंत्रित कीजिये. इससे आपको सर्वश्रेष्ठ वीर जमाता के रूप में मिलेगा और साथ ही उसके मित्र भी आपके मित्र बनेंगे. ये भी है कि स्वयंवर हारने वाले शत्रु नहीं बनते.”

द्रुपद इस युवक की टालमटोल से चिढ़ चुके थे, परन्तु स्वयंवर का विचार उन्हें अच्छा लगा. सही ही तो है. यादवों से सम्बन्ध कर वे जरासंघ, शिशुपाल और रुक्मी के शत्रु बन जाते, पर स्वयंवर में ऐसा कुछ भी होने की संभावना नहीं थी. फिर भी वे पूछ बैठे, “इस स्वयंवर में यादव भी भाग लेंगे ना? और यदि दुर्योधन, शिशुपाल या जरासंध अथवा उसका पौत्र मेघसन्धि जीत गए तो?”

महाराज अब भी वासुदेव को ही अपना जमाता देखना चाहते थे, “यदि मेरी इच्छा हुई तो प्रतियोगिता में मैं भी भाग लूंगा. दाऊ बलराम के नेतृत्व में यादव आएंगे. इस स्वयंवर को सफल बनाने की जिम्मेदारी यादव लेते हैं. और महाराज मेरी माने तो आप कल ही घोषणा कर दें कि अगले वर्ष कृष्णा का स्वयंवर होगा. कसौटी की घोषणा ना करें. रही दुर्योधन, शिशुपाल इत्यादि की बात, तो विश्वास जानिए कि उनके लिए भी स्वयंवर जीतना आसान नहीं होगा. गुरु संदीपनी की देखरेख में आचार्य श्वेतकेतु कसौटी तय करेंगे.”

ना जाने कैसा प्रभाव था इस युवक की वाणी में, अदम्य द्रुपद भी उसकी बात मानने को सहमत हो गए. आज कौन सा ऐसा युवक होगा जो कृष्णा जैसे विदुषी, सुंदरी स्त्री को, साथ ही द्रुपद जैसे सामर्थ्यवान नरेश से होने वाले सम्बन्ध को यूँ ठुकरा दे. सामने खड़े मुस्कुराते युवक की ओर देख द्रुपद बोले, “जैसा आप उचित समझे कृष्ण. पर मुझे एक वचन दें. प्रतियोगिता में भले ही आपके शत्रु रुक्मी, शिशुपाल या जरासंध विजयी हों, यादव पांचालों के मित्र बने रहेंगे”.

“जी महाराज, कृष्ण सदैव ही आपका और आपकी पुत्री कृष्णा का मित्र रहेगा, ये ग्वाला आपको वचन देता है.”

भानुमति -5 : कृष्ण हैं हृषिकेश, इंद्रियों के स्वामी

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