कोठारी बन्धुओं जैसे सैकड़ों कारसेवकों के बलिदान को सादर नमन!

1989-90 में जब रामजन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था, पूरे देश के हिंदू राम मंदिर निर्माण के लिये आंदोलनरत थे और अयोध्या में कारसेवा चल रही थी.

तब मुल्लायमसिंह ने रामभक्तों पर खुलेआम गोलियां चलवाकर सैकड़ों कारसेवकों की हत्या करवाई थी, जिनमें से बंगाल के कोठारी बंधु प्रमुख थे.

रामकुमार कोठारी और शरदकुमार कोठारी दोनों सगे भाई थे. 30 अक्तूबर, 1990 को अयोध्या में हुई कारसेवा में इन दोनों भाइयों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था. फिर 2 नवम्बर को भी कारसेवा हुई. जिसमें कोठारी बंधु भी शामिल थे.

पर तत्कालीन मुल्लायमसिंह की सरकार ने पुलिस को निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाने की अनुमति दे दी. इसके बाद उप्र की पुलिस ने सैकड़ों कारसेवकों को घर से निकाल-निकाल कर गोली मार दी.

इसी क्रम में हैवान बनी पुलिस ने पहले छोटे भाई शरद कुमार को घसीटते हुए कमरे से बाहर किया और सिर पर बंदूक तान दी, यह देखकर बड़ा भाई रामकुमार बाहर निकला और पुलिस वालों से बोला- “मेरे छोटे भाई को छोड़ दो, मारना ही है तो मुझे मार दो.”

किंतु सेकुलरिज्म से ग्रस्त पुलिसकर्मियों पर इस करुण पुकार का कोई असर नहीं पड़ा. उन्होंने दोनों भाइयों को गोली मार दी. इसके अलावा अनेको कारसेवकों को भी इसी तरह गोली मार दी गई…

अनेक शवों को पत्थरों से बांधकर सरयू में बहा दिया गया, पर ईश्वर की इच्छा के चलते इन दोनो भाइयों के शव पुलिस ठिकाने नहीं लगा सकी.

अपने धर्म और भगवान श्रीराम के लिए बलिदान होने वाले इन दोनों भाइयों की मृत देह जब कोलकाता पहुंची तो उन्हें देखने के लिए पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया था.

हर कोई उनके पिता श्री हीरालाल कोठारी और माता श्रीमती सुमित्रादेवी कोठारी को सांत्वना दे रहा था. किंतु अपने दो जवान पुत्रों को खोने के बावजूद कोठारी दम्पति में दु:ख का भाव लेशमात्र नहीं दिखा. उनका कहना था कि उनके दोनों पुत्र प्रभु राम के काज के लिए शहीद हुए हैं. और उनको अपने पुत्रों के बलिदान होने पर गर्व है. और उनको आशा थी कि उनके बलिदान से राम मंदिर निर्माण की नींव में दो पत्थर बढ़ गये.

इस घटना को घटे आज 27 साल हो चुके हैं. इस दौरान सरयू में बहुत पानी बह चुका है. 2 सीट से शुरू हुआ दल आज केन्द्र में पूर्ण बहुमत और उत्तरप्रदेश में प्रचंड बहुमत के साथ 17 राज्यों में सत्तासीन है. विपक्ष में रहने पर राम मंदिर के लिये आंदोलन करने वाला “दल” और उसके “अनुषांगिक संगठन” आज “न्यायालय” या “बातचीत” के जरिये इस मसले को सुलझाने की बात कर रहें हैं और कोर्ट का जो भी निर्णय आये उसका अक्षरश: पालन करने की उद्घोषणाएं की जा रहीं है.

निसंदेह उनका निर्णय स्वागत योग्य है और श्री श्री रविशंकर जैसे 5 स्टार हाई प्रोफाईल सन्त को इस कार्य के लिये चुना जा रहा है. पर यदि बातचीत और न्यायालय से ही रामजन्मभूमि मुद्दा सुलझाना था तो 1990-91 में रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू कर वहां कारसेवा क्यों की गयी?

कोठारी बंधुओं जैसे अनेक मासूम रामभक्तों को बलिवेदी पर अपने प्राण देने के लिये क्यों प्रेरित किया गया? क्या 1990 में देश में सुप्रीम कोर्ट और न्यायालय नहीं थे. और श्री श्री जैसे सन्त तब बातचीत करके इस मुद्दे को हल नहीं कर सकते थे.

जबकि ये प्रकरण तो भारतीय राजनीति में कई दशक पुराना हैं और कई सदियों से सन्त और हिन्दू समाज वहां मन्दिर निर्माण के लिये प्रयासरत और संघर्षरत है.

और यदि रामजन्मभूमि विवाद बातचीत और कोर्ट से हल हो गया तो क्या कोठरी बन्धुओं जैसे सैकड़ों कारसेवकों के बलिदान को भारत और हिन्दू समाज भूल जायेगा?

कोठरी बन्धुओं की पुण्यतिथि पर उनके जैसे सैकड़ों कारसेवकों के बलिदान को सादर नमन!

जय श्री राम

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