इस्लामी दुनिया को ले कर सभ्य समाज का दायित्व

सभ्य संसार और इस्लामी दुनिया के चिंतन-जीवन में इतनी दूरी है कि सभ्य सँसार इस्लामी दुनिया को समझ ही नहीं सकता.

सभ्य समाज में स्त्रियों के बाज़ार जाने, रेस्टोरेंट जाने, स्टेडियम जाने को ले कर कोई सनसनी जन्मती ही नहीं.

यह कोई समाचार ही नहीं है मगर इस्लामी संसार के लिए यह बड़ा समाचार है कि सऊदी अरब अब अपने देश में होने वाली खेल प्रतियोगिताएं को देखने के लिए महिलाओं को स्टेडियम में जाने की अनुमति देगा.

यह अनुमति 2018 में लागू होगी. अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि महिलाएं स्टेडियम में जा कर खुद भी खेल सकेंगी कि नहीं.

यह फ़ैसला युवराज मुहम्मद बिन सलमान ने समाज को आधुनिक बनाने और अर्थ व्यवस्था को बढ़ाने के तहत किया है.

प्रारम्भ में इसे तीन बड़े नगरों रियाद, जद्दा और दम्माम में बने स्टेडियमों में लागू किया जायेगा. अब उन्हें पुरुषों के खेल देखने की अनुमति भी होगी.

सऊदी अरब खेल प्राधिकरण के अनुसार नई व्यवस्था के लिये स्टेडियम परिसर में रैस्टोरेंट, कैफ़े, सी.सी.टी.वी. कैमरे, स्क्रीन और ज़रूरी व्यवस्थाएं की जायेंगी.

32 वर्षीय युवराज के विज़न 2030 के तहत जल्द ही देश में म्युज़िक कंसर्ट और सिनेमा देखने का सिलसिला प्रारंभ होने की उम्मीद है. इसमें अभी भी पेच है.

किसी भी सामान्य मस्तिष्क में भी प्रश्न आयेगा कि आख़िर औरतों को स्टेडियम में खेल देखने की यह अनुमति 2018 में लागू क्यों होगी? आज ही लागू करने में क्या परेशानी है?

इसमें पेच यह है कि सऊदी व्यवस्था को स्टेडियम परिसर में रैस्टोरेंट, कैफ़े, सी.सी.टी.वी. कैमरे, स्क्रीन और ज़रूरी व्यवस्थाएं बनानी हैं.

इसका मतलब यह है कि औरतों के लिये यह सारी व्यवस्था स्टेडियम में अलग से बने हिस्से में होगी. जिसमें बैठी महिलायें न दायें-बायें देख सकेंगी, न उनके बॉक्स में कोई बाहर से देख सकेगा.

यह एक बक्सा सा होगा जो तीन तरफ़ से बंद और केवल सामने से खुला होगा. आपने यदि ताँगे के घोड़े को देखा हो तो आप पायेंगे कि उसकी आँखों के दोनों ओर चमड़े का बनी खिड़की की झावट सी होती है. जिसके होने से वो केवल सीधा ही देख सकता है.

सभ्य समाज को अपने लिए ही नहीं बल्कि मुल्ला समाज के लिए जानना और जनवाना उपयुक्त होगा कि सऊदी अरब ही नहीं अपितु पूरे अरब जगत में औरतें भारी बंदिशें झेल रही हैं.

उनके पहनावे के कड़े नियम हैं. सार्वजनिक गतिविधियों, ग़ैरमर्द से बात करने पर प्रतिबंध हैं. पुरुषों के साथ काम करने पर रोक है. घर से अकेले निकलने पर रोक है.

इससे उस घोर-घुटन, संत्रास, पीड़ादायक जीवन का अनुमान लगाइये जो क़ुरआन और हदीसों के पालन के नियम ने मुसलमानों के आधे हिस्से को सौंपा है.

पुरुष अभिभावक के बिना स्त्री कहीं और जाना तो दूर, डॉक्टर के पास भी नहीं जा सकती. कल्पना कीजिये कि सऊदी अरब में कोई लड़की या औरत घर पर अकेली हो और उसके चोट लग गयी हो.

साहब जी, इस्लामी क़ानून के अनुसार उसकी विवशता है कि उसका कोई पुरुष अभिभावक आये और उसे डाक्टर के पास ले जाये अन्यथा वह घायल बाध्य है कि तड़प-तड़प कर, रो-रो कर मर जाये.

मुसलमान औरत के लिए पुरुष की अधीनता, बल्कि दासता इस्लामी व्यवस्था है और इससे उसका छूटना, बाहर आना उसकी निजी आवश्यकता ही नहीं है अपितु मानवता के लिए अनिवार्य है.

मानवता स्वयं प्रस्फुटित नहीं होती, इसे स्थापित करना पड़ता है. प्रत्येक पुरुष के बराबरी के अधिकार, सभी स्त्री-पुरुषों के बराबर के अधिकार मानवता की शर्त है.

अतः यह सभ्य समाज की मानवीय और नैतिक ज़िम्मेदारी (moral duty) है कि आप और हम इस्लाम के शिकंजे से मुसलमान समाज को मुक्ति दिलायें.

इसके लिये अनिवार्य शर्त इस्लाम से मुसलमानों को परिचित कराना, उसकी सत्यता का मुसलमानों को अहसास कराना है. एक बार मुसलमान स्थिति को समझ गये तो इस्लाम में बदलाव ले आयेंगे.

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