इतनी दरिद्रता! विरोधी दल से गोद लेने पड़ रहे महापुरुष

सोमनाथ मंदिर में लगी पटेल साहब की मूर्ति को लगा देख मेरा बेटा मुझसे पूछ रहा था, “पापा, जब पटेल साहब ने सोमनाथ का मंदिर बनवाया तो साथ ही साथ अयोध्या, मथुरा और काशी से गुलामी के चिन्ह क्यों नहीं हटवाए?”

मैने उसको जवाब दिया, “सोमनाथ पर कोई विवाद नहीं था, उन तीनों मंदिरों पर विवाद था.”

उसका सवाल था, “तो गैर विवादित जगह पर तो निर्माण कोई सामान्य से सामान्य व्यक्ति करा लेगा… इसमें ऐसा क्या जो इतनी ऊंची मूर्ति यहाँ लगा दी गयी?”

“अभी तो बेटा उनकी एक स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी दुगनी वाली हाइट की लगनी है.”

अब तो मेरा बेटा एकदम से बिदक गया था… बोला – “‘हाँ पता है, पुराना लोहा इकट्ठा हुया तो था… लेकिन समझ में नहीं आया था कि ऐसा भी क्या कारण था.”

“बेटा, पटेल साब ने 565 देशी रियासतों को भारत में मिलाया था.“

“तो कौन सा स्पेशल काम कर दिया? क्या उन रियासतों को मिलाये बिना शासन चल सकता था…”

“अरे बेटा, अंग्रेजों की चाल थी आज़ाद भारत को उलझाने की, जो उन्होने विफल की.”

“तो उस अधूरी आज़ादी के दिन मोदी जी लाल किले पर झण्डा क्यों फहराते हैं?”

“लीक पीट रहे हैं ना.”

“काहे की लीक! मोदी जी के लिए तो वे सबसे बड़े महापुरुष हैं… और फिर जब देश की सीमाओं में घिरी 565 रियासतों को मिलाने का श्रेय तो गृह मंत्री को मिले जिनको कि कोई अधिकारी भी मिला सकता था… बाहरी सीमा की गोवा और कश्मीर की बदनामी अकेले नेहरू को क्यों?”

“बेटा उनकी चलने नहीं दी नेहरू ने, उनके मन में तो उनको भी निपटाने की थी ही.”

“मन की तो आप भी बताते हो कि मन में तो मुखर्जी साहब के भी बहुत थी… पूरे संघ के मन में थी कि कश्मीर भारत में मिले… मन में तो मेरे भी MLA-MP बनने की है… मन से भी कुछ होता है क्या?”

वो आगे बोला, “और मन से होता है तो अपनी ही पार्टी के मुखर्जी साहब की मूर्ति इतनी ऊंची न सही इससे चौथाई ऊंचाई की क्यों नहीं!”

अब वो कुछ और आगे पूछता या कहता, उससे पहले ही मैं उस पर झल्ला पड़ा, “अबे का टें-टें लगा दई तूनें सबेरे यी सबेरे… भोले नाथ के दर्शन कौ आनंद कछू देर तौ दिमाग में कायम रहन दै…”

लेकिन उसे पता था, मेरी वो झल्लाहट ही इस बात का सूचक थी कि उसने मुझे वाकई विचलित कर दिया था… सो लगभग चिढ़ाने के अंदाज में बोल पड़ा – “अच्छा पापा, अगर पटेल साहब पटेल ना होकर कोई शाह, मोदी या बघेला होते तो भी मोदी जी उनको इतना महान मानते…”

मेरा धैर्य लगभग जवाब दे गया था, सो समुद्र के किनारे बनी रेलिंग पर जाकर सागर की उछाल मार-मार कर आती जाती लहरों में खोने की कोशिश करने लगा… मेरा मगज का हलुआ कर के रख दिया था उस उल्लू के पट्ठे मेरे बेटे ने…

एक दम से ब्रेन वॉश सा कर दिया था… गुस्सा भी था, साथ ही उसके तर्क मुझे अपने ही दिमाग के किसी कोने में छुपी बातों का ही प्रतिबिंब लग रहे थे… सो खुशी बहुत ज्यादा थी कि चूहे के जाये बिल ही खोदते हैं…

सागर की लहरें मंदिर परिसर की विशाल चट्टानों की बजाय मेरे दिमाग से आ कर टकराती लग रहीं थीं… मस्तिष्क में तमाम विचार उठ रहे थे…

कहाँ गया हमारा गैर कांग्रेसवाद… क्या हम, हमारा जनसंघ, हमारा संघ इतना दरिद्र रहा है कि हमको अपने महान पुरुष चुनने के लिए अपने से कतई विरोधी दल के नेता गोद लेने पड़ें!

वो भी ऐसे नेता जिन्होंने गृहमंत्री रहते हुए गांधी की हत्या के झूठे आरोप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगाया हो… और जिनका मूल्यांकन करने के लिए मात्र 40 महीनों का शासनकाल ही हमारे सामने हो.

और वाकई यदि गुजरात में पटेलों की संख्या 14% ना होती और केशु भाई पटेल से अहम का विवाद ना होता तो क्या सरदार पटेल की प्रतिमा की ऊंचाई स्टेच्यु ऑफ लिबर्टी को पार करती…

आखिर ये कौन सी कूटनीति है जो हमको अपने घर-कुनबे के सदस्यों, पूर्वजों, महापुरुषों को छोड़ बाहरी गांधी, पटेल या बाबा साहब के ‘शरणम गच्छामि’ होने को मजबूर करती है?

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