ईश्वर! इस देश में दोबारा न आये 1984

अचानक समाचार आया कि किसी ने इंदिरा गांधी को गोली मार दी. पूरा देश सन्न रह गया. दोबारा चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री बनने तक इंदिरा गांधी दुनिया के राजनैतिक पटल पर एक भारी भरकम शख्सियत थीं.

ख़बरें छन-छन कर आ रही थी. शाम तक पता चला कि उन्हें गोली उनके सिख गार्ड ने ही मारी थी और वे नहीं रहीं.

रात के समाचारों में दिल्ली में छुट पुट हिंसा के समाचार आते रहे. संचार के सारे माध्यम सरकार के नियंत्रण में थे. मीडिया की आज जैसी हालत नहीं थी.

अगले दिन वो हुआ जो स्वतन्त्र भारत के इतिहास पर एक शर्मनाक दाग है. कांग्रेस ख़ास तौर पर संजय गाँधी के बनाये यूथ कांग्रेस के गुंडे, भीड़ को साथ लेकर शहर-शहर, गली-गली भयानक, क्रूरतम हत्याएं करते घूम रहे थे. संपन्न सिखों का सामान लूटा जा रहा था और आग लगाई जा रहीं थी.

दोपहर 12 बजे मैं नवयुग मार्किट के अपने दफ्तर में था कि किसी ने बताया कि कर्फ्यू की घोषणा हुई है. घर चले जाओ.

रास्ते में लोहिया नगर में एक सरदार जी की हथियारों की दुकान थी. बन्दूक-पिस्टल आदि. पचास साथ लड़के उसका शटर तोड़ने में जुटे थे. थोड़ी देर में शटर टूट गया और मैंने 13-14 साल के लड़कों को रिवॉल्वर और बन्दूक लूटकर भागते देखा.

अराजक तत्व लूट का लाभ उठाने में शामिल हो गए थे. मेरठ रोड पर एक सिख ड्राइवर का ट्रक रोक लिया गया. ड्राइवर कूदकर भागा किन्तु बाद में उसे पकड़ कर मार दिया गया और ट्रक में आग लगा दी गई.

ये तो छोटी-मोटी घटनाएं हैं जिन्हें मैंने देखा. दिल्ली में अनेक सिखों के गले में टायर डाल कर ज़िंदा जलाया गया और खुद को दयालु और सहिष्णु बताने वाले धार्मिक समाज के लोग उन दर्दनाक चीखों के रोमांच का आनंद उठाते रहे. बलात्कार भी हुए.

बाद में एक टायर मार्किट से हम गुजरे तो वो डेढ़ किलोमीटर का पूरा बाज़ार ख़ाक में तब्दील था. मेरे कई सरदार मित्र अपने केश कटवाते हुए फूट-फूट कर रोते रहे.

खैर. एक सुखद घटना बताने के लिखना शुरू किया था, पर न जाने कहाँ भटक गए. हमारे गांव के ट्यूबवेल पर एक सरदार जी ट्यूबवेल ऑपरेटर थे जो कविनगर गाजियाबाद में रहते थे.

जब 1984 का उपद्रव हुआ तो निकट के गांव मोरटी के लोगों को विचार आया कि कहीं सरदार जी का परिवार संकट में न हो. आनन फानन में दो ट्रैक्टर ट्रॉली और कई नौजवान तैयार हुए और पहुँच गए सरदार जी के घर.

सरदार जी और उनका परिवार बेहद डरा हुआ था. गांव के लोगों ने न कुछ पूछा न ताछा, सीधे उनका ज़रूरी सामान ट्रेक्टर में लादा, परिवार को बिठाया और गाँव ले आये.

फिर दंगा शांत होने तक परिवार गांव में सुरक्षित रहा. बाद में मैंने इस घटना पर एक कहानी भी लिखी. ईश्वर! इस देश में 1984 दोबारा न आये.

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