इंदिरा की हत्या और सिख नरसंहार

आज़ादी के पूर्व से ही सिख अलगाववादी नेताओं का मानना था कि अंग्रेज़ों के बाद पंजाब पर सिखों का हक है… लेकिन आज़ादी के समय हुए विभाजन ने उनकी अलग राज्य की उम्मीदों को धूमिल कर दिया… आज़ादी के बाद जब भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश का गठन हुआ तो अकाली दल ने पंजाबी भाषी इलाके को ‘’पंजाब राज्य’’ घोषित करवाने की मांग रखी उधर कुछ पंजाबी हिंदू नेताओं ने आंदोलन चलाकर पंजाबी हिंदुओं को “गुरमुखी” के बजाए “हिंदी” भाषा अपनाने को कहा…

यहीं से हिंदुओं और सिखों के बीच की खाई गहरी होने लग गयी. इस दौरान पंजाब में अकाली दल कांग्रेस का विकल्प बनकर उभर चुका था. इंदिरा गांधी ने पंजाब में अपना वर्चस्व कायम करने के लिये सरदार ज्ञानी जैलसिंह को पंजाब के मुख्यमंत्री के तौर पर खड़ा किया. जैलसिंह ने अकालियों के प्रभाव को कम करने के लिए सिख गुरुओं के जन्म और शहीदी दिवसों पर कार्यक्रमों का आयोजन, प्रमुख सड़कों और शहरों का उनके नाम पर नामकरण और सिख गुरुओं की महत्ता का वर्णन जैसे धार्मिक/राजनीतिक काम करने शुरू कर दिये.

इन सब हालात के बीच पंजाब में एक “कद्दावर शख्स” का उदय हुआ जिनका नाम था जरनैलसिंह भिंडरावाले. माना जाता है कि “रौबीले व्यक्तित्व” वाले भिंडरावाले को आगे बढ़ाने में जैल सिंह और अन्य कांग्रेसियों का ही हाथ था. अकालियों को मात देने के लिए जैलसिंह और दरबारासिंह ने उन्हें आगे बढ़ाया साथ ही अघोषित प्रधानमंत्री “संजय गांधी” ने जरनैलसिंह की पीठ पर हाथ रख कर उनको पंजाब का अघोषित मुखिया बना दिया.

संजय गांधी को लगता था कि अकाली दल के तत्कालीन मुखिया संत हरचरणसिंह लोंगोवाल की काट के रूप में एक और संत को खड़ा किया जा सकता है. यह संत उन्हें दमदमी टकसाल जो सिखों की एक प्रभावशाली संस्था थी, के संत भिंडरावाले के रूप में मिले. कांग्रेसी नेताओं ने उनकी आर्थिक, राजनीतिक तौर पर हर तरह से मदद की पर उन्हें यह अंदाज़ा नहीं था कि भिंडरावाले आतंकवाद का रास्ता चुन लेंगे.

जरनैलसिंह जब सात साल के थे तब उनके पिता ने उन्हें दमदमी टकसाल को सौंप दिया था. यहीं उनकी आरंभिक शिक्षा हुई थी. धीरे-धीरे उनकी चर्चा बढ़ती चली गयी. जरनैलसिंह भिंडरावाले ने सिखों से गुरु गोविन्द सिंह के बताए हुए मार्ग पर लौटने का आह्वान किया. उन्होंने सिखों से शराब, धूम्रपान जैसी लतों को छोड़ने की अपील की. उनकी लोकप्रियता तब बहुत तेज़ी से बढ़ी जब उन्होंने हिंदुओं के ख़िलाफ़ बोलना शुरू कर दिया.

भिंडरावाले अपने भाषणों में हिंदुओं को ‘’टोपीवाले/धोती वाले’’ और इंदिरा गांधी को “पंडितों की बेटी” के नाम से सम्बोधित करते थे. उनके प्रभाव को देखते हुए 1977 में भिंडरावाले को दमदमी टकसाल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. दमदमी टकसाल के भीतर जरनैल सिंह के एकाधिकार के साथ पंजाब का माहौल गर्माने लगा.

इस बीच अमृतसर में 13 अप्रैल 1978 को अकाली कार्यकर्ताओं और निरंकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई जिसमें 13 अकाली कार्यकर्ता मारे गए. इसके विरोध में आयोजित रोष दिवस में जरनैल सिंह भिंडरावाले ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.. हिंसा लगातार फैलती गई.. सितंबर 1981 में पंजाब केसरी अखबार निकालने वाले “हिंद समाचार समूह” के मुखिया लाला जगत नारायणसिंह की हत्या हो गई. आरोप भिंडरावाले पर लगे. लेकिन उनकी लोकप्रियता इतनी ज़्यादा थी कि इन हत्याओं में उनकी नामज़दगी के बावजूद पंजाब पुलिस उन्हे पकड़ने की हिम्मत नहीं दिखा पायी.

भिंडरावाले ने खुद अपने गिरफ्तार होने का दिन और समय निश्चित किया था. उस वक़्त जैलसिंह केंद्र में “गृह मंत्री” थे. भिंडरावाले को गिरफ्तार करके उन्हे सर्किट हाउस में रखा गया. लेकिन सबूतों के अभाव में उनको जमानत मिल गई.

इसके बाद भिंडरावाले ने हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत का खुला इज़हार करना शुरू कर दिया. इस दौरान असामाजिक तत्वों द्वारा गायों के सर काट कर मंदिरों के सामने फेंके जाने लगे. हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों का अपमान किया गया. पर किसी की हिम्मत नहीं थी कि जरनैलसिंह भिंडरावाले को रोक सके.

कुछ जगह पर सिखों के धार्मिक ग्रंथ को जलाने और सिगरेटों के जले हुए टुकड़े गुरुद्वारों में फेंकने की घटनायें भी घटी. जब स्थितियां नियंत्रण के बाहर होने लगी तो जैलसिंह और दरबारा सिंह ने भिंडरावाले से दूरी बनाना शुरू कर दी. इस दौरान दो बार दरबारा सिंह की हत्या के भी प्रयास किये गए. उसी साल 5 अक्टूबर 1983 को आतंकियों ने अमृतसर से दिल्ली जाने वाली एक बस का अपहरण कर लिया और उसमें बैठे छह हिंदुओं को गोलियों से भून दिया.

पूरे राज्य में अलगाववादी राजनीति भड़क उठी. जब तक सरकारी तंत्र उनके ख़िलाफ कार्रवाई करता, भिंडरावाले दिसंबर 1983 से स्वर्ण मंदिर के अकाल तख़्त की सुरक्षा में रहने लगे. जहां हरदम 200 हथियारबंद लोग उन्हे घेरे रहते. वह समझ चुके थे कि अब संघर्ष होना तय है. उन्होंने स्वर्ण मंदिर में हथियार और गोला-बारूद जमा करने शुरू कर दिए थे. पंजाब में आतंकवाद और अलगाववाद चरम पर पहुंच चुका था.

तेज़ी से बदलते हालात में अकालियों और भिंडरावाले ने हाथ मिला लिए और वे एक साथ सरकार के ख़िलाफ़ खड़े हो गये. 1982 में हरचरणसिंह लोंगोवाल ने धर्मयुद्ध मोर्चा की स्थापना की जिसकी मुख्य मांग “आनंदपुर साहिब प्रस्ताव” को मनवाना थी. इस प्रस्ताव की मांगें देश के संघीय ढांचे को तोड़ने वाली और एकता अखंडता के खिलाफ थीं. पंजाब को इसमें ज़्यादा अधिकार देने की मांग थी. हालांकि इसमें तात्कालिक तौर पर खालिस्तान की मांग नहीं की गयी थी. पर पंजाब की स्थिति बिगड़ चुकी थी और अब एक ही रास्ता रह गया था- सरकार और भिंडरावाले के बीच टकराव.

“आनंदपुर साहिब प्रस्ताव” की ज़्यादातर मांगें इंदिरा सरकार ने नामंजूर कर दी थीं और जो मानी थीं उन पर अमल नहीं किया था. टकराव बढ़ता ही जा रहा था. सरकार और असंतुष्टों के बीच 1984 में छह बार मीटिंग हुई और आख़िरी मीटिंग 26 मई 1984 को हुई. ये भी बेनतीजा रही. न इंदिरा गांधी मानने को राज़ी थीं और न ही भिंडरावाले गुट के लोग. भिंडारवाले ने अब तेज़ी से स्वर्ण मंदिर को एक किले में तब्दील करना शुरू कर दिया. उनका साथ देने वालों में फौज के पूर्व मेजर-जनरल “शुबेग सिंह” और सिख फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के मुखिया “अमरीक सिंह” भी थे. शुबेग की निगरानी में मंदिर की दीवारों पर रेत के बोरे रखवा दिये गए और प्लान बनाया गया कि संघर्ष को तब तक जिंदा रखा जाएगा जब तक आम पंजाबी विद्रोह न कर दे.

दूसरी तरफ भारतीय फौज के तत्कालीन मेजर जनरल कुलदीपसिंह बरार को आंतकवादियों के ख़िलाफ़ कमान सौंपी गयी. उस समय भारतीय फौज के मुखिया “अरुण श्रीधर वैद्य” थे. बरार को समझाया गया था कि पंजाब में आम जनता का विद्रोह हो सकता है इसलिए 48 घंटों के भीतर स्वर्ण मंदिर को नुकसान पहुंचाये बिना उसे आतंकियों से खाली करवाना है..

“जनरल शुबेग” और “जनरल बरार” एक साथ 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लडे थे. पर कालचक्र ने इस बार दोनों को आमने-सामने खड़ा कर दिया था.

2 जून 1984 को इंदिरा गांधी ने आल इंडिया रेडियो से देश को संबोधित करके देश को पंजाब के हालात से वाकिफ कराया और आतंकवादियों से हथियार छोड़ देने की अपील की. 3 जून को सेना ने ऑपरेशन ब्लूस्टार शुरू कर दिया.. सबसे पहले राज्य की टेलीफोन और बिजली व्यवस्था काट दी गयी. फिर मंदिर की घेराबंदी करके फायरिंग शुरू कर दी गई. उस दिन गुरु अर्जुनदेव शहीदी दिवस भी था और इस वजह से मंदिर के अहाते में काफी लोग थे.

सेना खुलकर फायरिंग नहीं कर सकती थी. आतंकियों ने श्रद्धालुओं को ढाल बना लिया. सेना की मुश्किल बढ़ गयी थी. जैसे तैसे करके लोगों को बाहर निकला गया और 5 जून की रात को सेना ने “अंतिम” और “निर्णायक” हमला बोल दिया. सेना को सख्त आदेश था कि ‘’अकाल तख़्त’’ पर गोलीबारी नहीं की जायेगी.. पर उस दिन सबसे ज़्यादा गोलीबारी अकाल तख़्त की तरफ से ही हो रही थी और सेना इधर से खुलकर फायर नहीं कर पा रही थी. पर गोलियां दोनो ओर से चल रही थी सैनिक और आतंकी लगातार मारे जा रहे थे.

रात के दो बज गए थे और काम अभी आधा भी नहीं हुआ था. समय निकला जा रहा था. बरार ने आतंकियों की ताक़त का गलत अंदाज़ा लगा लिया था. स्थिति भांपते ही बरार ने दिल्ली फ़ोन करके टैंकों से हमले की इजाज़त मांगी जो तुरंत ही मंज़ूर हो गयी. उसके बाद फौज के टैंकों से मंदिर की बाहरी दीवार तोड़कर ताबड़तोड़ बमबारी की जिससे आतंकियों को काफी नुकसान पहुंचा. इसके बाद दोनों ओर से भीषण गोलीबारी के साथ जबर्दस्त खूनी संघर्ष छिड़ गया. जिसमें अतंत: शुबेग सिंह, अमरीक सिंह और भिंडरावाले मारे गए. इसके बाद ऑपरेशन ब्लू स्टार को रोक दिया गया.. इस ऑपरेशन में भिंडरावाले सहित लगभग 200 आतंकी मारे गए. सेना के 79 जवानों की भी जान गई जिनमें चार सैन्य अधिकारी थे.

ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद इंदिरा गांधी की सुरक्षा बढ़ा दी गयी और उनको सलाह दी गयी कि वे अपने अंगरक्षक के रूप में सिख सुरक्षाकर्मियों को तैनात न करें, पर इंदिरा ने “आदर्शवाद” और “सेकुलर” होने का “दिखावा” करने के लिये इस सलाह को मानने से इंकार कर दिया और सिखो को अपने अंगरक्षक के रूप मे तैनात रखना जारी रखा….

इस घटना के 5 माह बाद 31 अक्टूबर 1984, प्रातः 9 बजे के लगभग श्रीमती गांधी को अकबर रोड जाना था, जहाँ उनका कार्यालय था. उनके साथ- आर.के.धवन, कांस्टेबल नारायण सिंह, सब-इंस्पेक्टर रामेश्वरदास और चपरासी नाथूराम थे. जैसे ही श्रीमती गांधी कक्ष से बाहर निकलकर कुछ दूर चली, रास्ते में खड़े बेअंतसिंह ने पहले उनको सेल्यूट किया फिर अपनी पिस्टल निकाली और एक मीटर से भी कम फासले से उन पर दनादन गोलियां बरसाना शुरू कर दिया इंदिरा गाँधी जमीन पर गिर पड़ी.

तभी सुरक्षा सैनिक सतवंतसिंह ने भी फुर्ती से दूसरी ओर आकर अपनी थॉम्पसन कार्बाइन से मृत प्रायः श्रीमती गाँधी पर दनादन गोलियां चलानी शुरू कर दी. उसने 20 राउंड गोलियां चलाकर जमीन पर पड़े शरीर को लहूलुहान कर डाला. इसके बाद बेअंत सिंह ने 3 राउंड गोलियां और चलाकर उनके शरीर को पूरी तरह छलनी कर दिया. फिर दोनों ने अपने अपने हथियार फेंककर आत्मसमर्पण कर दिया. उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां उन्हें बचाने की हर सम्भव कोशिश की गई किंतु ढाई बजे इंदिरा गांधी का देहांत हो गया. बीबीसी ने यह खबर पूरी दुनिया में लीक कर दी और शाम 6 बजे तक इंदिरा की हत्या की सूचना भारत सरकार ने भी सार्वजनिक कर दी.

इसके बाद दिल्ली और पूरे देश में सिख विरोधी दंगे भड़क गए. कांग्रेसी नेता हिंसक भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे. निर्दोष सिखों के गले में “जलते हुऐ टायर” डालकर उनकी हत्याऐं की जा रही थी. कई सिखो ने जान बचाने के लिए अपने केश कटवा लिये. महिलाओं ने अपने छोटे बच्चो को लड़कियों के कपड़े पहनाकर उनकी जान बचाई गयी. अनेक गुरुद्वारों पर हमले किये गये. पूरे देश में तत्कालिन कांग्रेसी नेताओं ने सिख विरोधी हिंसा भड़काई. इस हिंसा में सैकड़ो/हजारों सिख मारे गये. अगले ही साल जनरल वैद्य की पुणे में हत्या हो गई. इंग्लैंड में कुलदीप सिंह बरार का गला रेतकर उन्हें मारने की कोशिश हुई… पंजाब में आतंकवाद की आग और भड़क गयी…1985 में संत लोंगोवाल की हत्या कर दी गयी…!

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया…नवम्बर 1984 में जब वे एक सभा में लोगो को सम्बोधित कर रहे थे तब उन्होंने सिख विरोधी हिंसक घटनाओं पर यह कहकर पर्दा डालने कि कोशिश की कि- “जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती दहल जाती है.”

फौजी अफसरों के रूम में घुसा रिक्शेवाला और कहा, ‘Myself Ajit Dobhal…’

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