पूछने का ढंग हो तो जवाब देंगे पेड़, फूल, घास!

हकीम लुकमान के जीवन में उल्लेख है कि लुकमान पौधों के पास जाता, उनके पास आंख बंद करके, ध्यान करके बैठ जाता और उन पौधों से पूछता कि तुम किस काम में आ सकते हो, मुझे बता दो!

वो पूछता कि तुम किस काम में आ सकते हो? तुम्हारे पत्ते किस काम में आएंगे, किस बीमारी के काम आएंगे? तुम्हारी जड़ किस काम में आएगी? तुम्हारी छाल किस काम में आएगी?

कहानी अजीब-सी मालूम पड़ती है, लेकिन लुकमान ने लाखों पौधों के पत्ते, जड़ों और उन सबका विवरण दिया है कि वे किस काम में आएंगे.

असंभव मालूम पड़ता है कि पौधे बता दें. लेकिन जब लुकमान की किताब हाथ में लगी वैज्ञानिकों के, तो कठिनाई यह हुई कि दूसरी बात और भी असंभव है कि लुकमान के पास कोई प्रयोगशाला रही हो, जिसमें लाखों पौधों की करोड़ों प्रकार की चीजों का वह पता लगा पाए.

वह और भी असंभव है. क्योंकि लेबोरेटरी मेथड्स तो अब विकसित हुए हैं; और केमिकल एनालिसिस तो अब विकसित हुई है, लुकमान के वक्त में तो थी ही नहीं.

लेकिन आपकी केमिकल एनालिसिस, रासायनिक प्रक्रिया से और रासायनिक विश्लेषण से आप जो पता लगा पाते हैं, वह गरीब लुकमान बहुत पहले अपनी किताबों में लिख गया है, सुश्रुत अपनी किताबों में लिख गया है, धनवंतरि ने उसकी बात कर दी है.

और इनके पास कोई प्रयोगशाला नहीं थी, कोई प्रयोगशाला की विधियां नहीं थीं. इनके पास जानने का जरूर कोई और विधि, कोई और मेथड था, कोई और उपाय था.

वह ध्यान का उपाय है. ध्यान के गहरे क्षण में आप किसी भी वस्तु के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकते हैं.

मनोवैज्ञानिक उसे एक खास नाम देते हैं, पार्टिसिपेशन मिस्टीक. एक बहुत रहस्यमय ढंग से आप किसी के साथ एकात्म हो सकते हैं.

ध्यान के क्षण में, गहरी शांति और मौन के क्षण में, अगर आप गुलाब के फूल को सामने रख लें और इतने एकात्म हो जाएं कि उस गुलाब से पूछ सकें कि बोल, तू किस काम में आ सकता है?

तो गुलाब नहीं बोलेगा, लेकिन आपके प्राण ही, आपकी अंतर्प्रज्ञा ही कहेगी, इस काम में.

तो कुशल उस व्यक्ति को कहते थे, जो अनंत तरह की घासों के बीच से उस कुश घास को खोज लाता था, जो ध्यान में सहयोगी होने का वातावरण निर्मित करती है.

– ओशो

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