अपने पर उतर आईं सेनायें, तो नहीं लगेगी ‘इस्लामाय स्वाहा नेताय स्वाहा’ होने में देर

किसी भी मुल्क की पुलिस और सेना, उस देश की आम जनता से ही आती है. यही कारण है कि मैं जर्मनी, फ्रांस तथा स्वीडन और नॉर्वे को लेकर बिलकुल निराश नहीं हूँ हालांकि वहाँ स्थिति बहुत गंभीर है.

वैसे अब स्वीडन और नॉर्वे करवट बदलने लगे हैं. ब्रिटेन और जर्मनी में भी जनाक्रोश का ज्वालामुखी खदबदा रहा है. इटली में माफिया, मुसलमानों के लिए काल बनी हुई है क्योंकि अपने चरित्र के अनुसरण करते हुए मुसलमान वहाँ गुनहगारी में लिप्त होने लगे थे, तो वहाँ स्थापित माफिया को यह बर्दाश्त न होना स्वाभाविक था.

पोलैंड, हंगरी और चेक रिपब्लिक ने खुलकर शरणार्थियों (migrants) को लेने से इन्कार किया है. जर्मन चांसलर मरकेल और यूरोपियन यूनियन टोले ने इन्हें धमकियाँ दी हैं आर्थिक नुकसान करने की, लेकिन इन्होने सीधा जवाब दिया है कि ‘झेल लेंगे, नुकसान भी उठा लेंगे लेकिन अपने देशों को इस्लामग्रस्त नहीं होने देंगे. आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी हमारी कोई ज़िम्मेदारी है.’

तुर्कों ने यूरोप में 1680 के दशक में बहुत अंदर तक कब्जा कर लिया था और 1683 में विएना जो ऑस्ट्रियन साम्राज्य की राजधानी थी, उसके प्रवेश द्वार पर हमला बोल दिया था. विएना के बुर्ज तुर्की तोपों की मार से चरमरा रहे थे.

उसी समय पोलैंड के राजा जॉन सोबीएसकी तृतीय ने अन्य यूरोपियन राज्यों के गठबंधन का सेनापतित्व करते हुए तुर्की सेना पर ज़बर्दस्त हमला बोल दिया था और विएना का घेरा तोड़ दिया था. उसके बाद भागती तुर्की सेना यूरोप से बुरी तरह खदेड़ी गयी.

आज पोलैंड उसी विजय को लेकर शॉर्ट फिल्में बना रहा है. अलग-अलग यूरोपीय भाषाओं में डब कर रहा है. बढ़िया फिल्में हैं और उनका राजनैतिक संदेश भी स्पष्ट है. साफ कहा गया है कि तब कैथॉलिक पोलैंड ने ही यूरोप में क्रिश्चियनिटी को इस्लाम से बचाया था.

इसका अनकहा संदेश यह है कि आज भी क्रिश्चियन पोलैंड यह ज़िम्मेदारी निभाने को तत्पर है. पोलैंड के नेता तथा जनता भी यही कह रही है. एक सुंदर लड़की के वीरश्रीयुक्त भाषण का विडियो भी वायरल है.

भीड़ कितनी भी हिंसक हो, प्रशिक्षित पुलिस और सेना का मुक़ाबला नहीं कर सकती. लीबिया में जो सशस्त्र क्रान्ति हुई थी वह प्रशिक्षित मर्सिनरीज़ और आधुनिक शस्त्रास्त्र भेजकर हुई थी.

यूरोप में जितनी भी इस्लामी भीड़ है, वो कितनी भी खूंख्वार क्यों न बने और उनमें कितने भी ISIS वाले क्यों न हो, उनके पास वो शस्त्र नहीं जो उन यूरोपीय देशों की सेनाओं के पास हैं. और वे सेनायेँ अपने पर उतर आई तो ‘इस्लामाय स्वाहा नेताय स्वाहा’ होने में देर नहीं लगेगी.

इनमें से हर देश ने दूसरे विश्वयुद्ध में हानि झेली है, सिवाय स्वीडन के. लेकिन स्वीडन का भी युद्धों का इतिहास रहा है. अहिंसा-अहिंसा कह कर देश को नपुंसक बनाने वाला कोई नेता वहाँ नहीं हुआ.

पोलैंड की आक्रामकता देखकर जर्मनी, स्वीडन और नॉर्वे के नेताओं के सुर अब बदलने लगे हैं. लेकिन भस्मासुर का स्वागत जो किया है, उससे अब क्या सलूक करेंगे, यह देखने की बात है.

शरणार्थी बस कभी भी बेकाबू होते हैं और बदतमीजी पर उतर आते हैं, जिन पर पुलिस से नरमी बरतने को कहा जाता है. मरकेल को मुसोलिनी समान मौत मिले तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होगा.

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