इन बच्चों में अपार ऊर्जा है, लेकिन ऊर्जा तो एटम बम में भी है

गीत संगीत और नृत्य का होता देहात्मवादीकरण अर्थात Westernization : It’s a travel towards pure Physicality: अर्थात मॉडर्न सोसाइटी. लेकिन जिसको glamorize किया जाय वही समाज का आदर्श बनता जाता है. कोई आवश्यक नहीं कि आप इससे सहमत हों.

भारतीय शास्त्रों के अनुसार गीत संगीत और नृत्य भी पूर्णतः आध्यात्मिक यात्रा का साधन और अंग होते हैं. इसीलिए हमारे धार्मिक ग्रंथ गेय शैली में हैं.

अपने जीवन काल में आपने कुमार गंधर्व को कबीर को गाते सुना है – उड़ जाएगा हंस अकेला, हरिदर्शन का मेला, हरिदर्शन का मेला. — पूर्णतः आध्यत्म

इसके साथ सूफी संगीत गजल और कव्वालियाँ भी एक आध्यात्मिक दर्शन हुआ करती थीं.

इसको कहा गया क्लासिकल – यानी भौतिक प्राणी को जो समझ में न आये, लेकिन उसके शब्द और संगीत मन को अच्छा लगता था/ हैं इसलिए प्रायः भौतिक प्राणी जो अध्यात्म का अ भी नहीं जानते थे/ हैं, वे भी इसको सुनते थे, देखते थे/हैं.

फिर समय आया – आदमी मुसाफिर है, आता है और जाता है – सेमिक्लासिकल.

फिर गीत संगीत और नृत्य अधि आत्म ( आध्यत्म) को छोड़कर अंतःकरण के मात्र एक तत्व मन तक सिमट गये. जिसमें भाव प्रधान गीत संगीत और नृत्य की रचना होने लगी –

“आने से उनके आये बहार. जाने से उनके जाए बहार.
बड़ी मस्तानी है मेरी महबूबा – भाव प्रधान. जिसमें सिर्फ मनोभाव उद्वेलित होते हैं.

फिर आया कि – मनमयूर के साथ शरीर भी थिरकने लगे – उड़ें जब जब जुल्फें तेरी कंवारियों का दिल मचले – मनो भाव और शरीर प्रधान.

फिर आया – अरे दीवानों मुझे पहचानों, कहाँ से आया में हूँ कौन – भावशून्य देहशून्य. सिर्फ आंखों को अच्छा लगने वाला.

फिर आया – सरकाए ल्यो खटिया जाड़ा लगे या कांटा लगा – पूर्णतः भोंडापन.

फिर जो आजकल के गाने के साथ म्यूजिक – लिफ्ट तेरी बन्द है टाइप से – जिसमें शरीर को भी सिर्फ मद मस्त होने के बाद ही हिलाना संभव है.

लेकिन टी वी पर बड़ी बड़ी हस्तियाँ सुपर डांसर टाइप प्रोग्राम में बच्चों को एक रोबोटिक डांस पर भाव भंगिमा के कृत्रिम भाव के साथ नचाने को glamorize कर रहे हैं.

ये डांस सड़क पर दो पोल पर रस्सी बांधकर 6 साल के बच्ची या बच्चे के नटगिरी या जिमनास्टिक जैसा ही दिखता है – टोटल physicality. न मन न भाव.

हो सकता है कि इन आयोजकों प्रायोजकों और पार्टिसिपेंट्स को इसमें भाव में और आध्यत्म भी महसूस होता हो. लेकिन पूर्णतः बाजारवाद है जिसमें मासूम मनों को हथियार बनाया जा रहा है.

लेकिन पूरा भारत ऋषि चार्वाक के चंगुल में है जो बोलते हैं –
“जावत जीवेत सुखं जीवेत. ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत..
भष्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनम कुतः ??

जिस बच्चे और कलाकार की वीडियो और फ़ोटो लगा रहा हूँ , वे ये न समझे कि उनको अपमानित कर रहा हूँ. इनके अंदर अपार ऊर्जा है. लेकिन ऊर्जा तो एटम बम में भी है.

डॉक्टर इंजीनियर से पहले इंसान बनाएं अपने बच्चों को

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