The Bicycle Thief के बहाने : स्कूल में या बाहर कहीं, बच्चों को मुस्कुराना भी सिखाते हैं क्या?

फिर से फिल्म की कहानी सुनाने जा रहे हैं और इस बार फिल्म जरा पुरानी है. “द बायसाइकिल थीफ” मूलतः एक इतालवी (Italian) फिल्म थी. वित्टोरियो डी सिका (Vittorio De Sica) ने इसे 1948 में निर्देशित किया था. ये एक गरीब आदमी की फिल्म है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के रोम में है. उसका काम चलाने के लिए उसके पास साइकिल होनी जरूरी है. साइकिल चोरी हो जाती है और बाप बेटा उसे ढूँढने निकले हैं. फिल्म की कहानी इनके साथ साथ चलती रहती है. लूगी बारटोलिनी (Luigi Bartolini) की लिखी एक किताब के आधार पर ये फिल्म बनी थी.

अमेरिका में रिलीज करने के लिए इसका अंग्रेजी नाम “द बायसाइकिल थीफ” हो गया था. अंटोनियो अपनी पत्नी मारिया, बेटे ब्रूनो और एक नवजात के साथ रोम में रहता है. उसे इश्तेहार के पोस्टर चिपकाने का काम मिल रहा होता है लेकिन इस नौकरी के लिए साइकिल होना जरूरी था. गरीब परिवार के पास पैसे नहीं थे तो पत्नी अपनी प्रिय दहेज़ में मिली चीज़ों को गिरवी रख आती है. जैसे तैसे साइकिल तो आती है, लेकिन जब सीढ़ी पर चढ़कर अंटोनियो काम कर रहा होता है तो नीचे से एक चोर उसकी साइकिल ले भागता है. (यहाँ संजीव कुमार वाली “कोशिश” जैसी कोई फिल्म याद आये तो मेरी कोई गलती नहीं.)

अंटोनियो चोर का पीछा भी करता है लेकिन पकड़ नहीं पाता. पुलिस भी उसकी कोई ख़ास मदद नहीं करती. चोरी का माल जहाँ बिकता था, वो वहां भी जाता है, लेकिन उसे जो साइकिल अपनी लग रही थी वो उसकी नहीं होती. उसे चोर एक बूढ़े से बात करता भी दिखता है लेकिन चोर फिर से भाग जाता है और बूढ़ा, चोर से कोई जान पहचान होने से इनकार कर देता है. एक पुल पर बेटे ब्रूनो को छोड़कर अंटोनियो, बूढ़े का पीछा करने की कोशिश करता है मगर बच्चे के डूबने का शोर सुनकर दौड़ा आता है. उसका बेटा नहीं डूब रहा था ये देखकर वो खुश होता हुआ उसे रेस्तरां में खिलाने ले जाता है. फिर एक अमीर परिवार को बढ़िया खाना खाते देख खुद को कोसता भी रहता है.

आखिर अंटोनियो उस चोर को एक कोठे में घुसते ढूंढ कर पकड़ भी लेता है. चोर दौरा पड़ने और जुटी हुई भीड़ की सहानुभूति बटोरने में भी कामयाब होता है. इतने में बेटा ब्रूनो एक पुलिसकर्मी को ले आया था इसलिए चोर की नौटंकी कामयाब नहीं होती. चोर के घर की तलाशी में साइकिल मिलती नहीं और कोई गवाह ना होने के कारण अंटोनियो का मुकदमा भी कमजोर था. चोर बच जाता है और चोर के साथियों के खिल्ली उड़ाने के बीच अंटोनियो वहां से लौटता है. लौटते समय उन्हें एक स्टेडियम के बाहर बहुत सी साइकिल खड़ी दिखती हैं. वो लालच में साइकिल चुरा लेना चाहता है. बेटे को जाने कहकर वो एक साइकिल चुरा लेना चाहता है, लेकिन इस कोशिश में पकड़ा जाता है.

भीड़ उसे पीटना शुरू करती ही है कि ब्रूनो भी लौट आता है. शायद उसकी बस छूट गई थी और वो बाप का गिरा हुआ हैट उठा कर देता है. ये देखकर साइकिल के मालिक को वस्तुस्थिति कुछ कुछ समझ आती है और वो अंटोनियो को जाने देता है. फिल्म के अंतिम दृश्य में आँख में आंसू लिए बाप-बेटा घर की तरफ लौटते भीड़ में खो जाते हैं.

जी हां, फिल्म दुखांत है, और पिछली आलेख के साइकिल से इस आलेख के साइकिल पर आने की वजह भी यही है कि फिर से बिहार की बात करनी है. बेरोजगारी, बढ़ती आबादी की भीड़, जर्जर शिक्षा व्यवस्था, और अपराध के बीच का बिहार वैसा ही होता है जैसा फिल्म का दूसरे विश्वयुद्ध वाला काल दिखा रहे होते हैं. इसके बाद भी टूटी सड़कों और कीचड़ से बचकर निकलता बिहारी आपको मुस्कुराता हुआ ही दिखेगा. बीच सड़क पर खड़े बैल की वजह से हुए जाम में घंटे भर फंसकर लौटा वो परिवार के लोगों को खाने नहीं दौड़ता. घर के तो क्या बाहर के लोगों से भी वो मुस्कुरा के बात करने का दम रखता है.

मुश्किल से मुश्किल हालात का हँसते मुस्कुराते सामना करना हम लोग बचपन से सीखते सिखाते हैं ना इसलिए. बाकी तथाकथित गैर-बीमारू अमीर राज्यों में जब किसान अपने ही खेत में डालने वाला पेस्टीसाइड पीकर, या अपने जानवरों के फंदे से लटक कर मरता है तो बिहारी किसान ऐसा नहीं करता. बाढ़ में बह गए खेतों को देखकर दुखी तो होगा, लेकिन पानी उतरते ही फिर से उतनी ही हिम्मत के साथ वो खेतों में फिर से खड़ा होता है. हर बार आप जीत ही जाएँ ऐसा नहीं होता. जीवन में जीत-हार दोनों होगी. जीत के जश्न के साथ हम हार का मजबूती से सामना करना भी सिखाते हैं.

छठ की छुट्टियाँ ख़त्म होने पर जब आप या आपके रिश्तेदार लौटने लगें तो पूछियेगा, वहां भी ऐसा ही होता है क्या? ग्रॉस प्रोडक्शन नापते हैं या ग्रॉस हैप्पीनेस? वहां के स्कूल में या बाहर कहीं, बच्चों को मुस्कुराना भी सिखाते हैं क्या?

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