कहाँ है टीपू की तथाकथित रामनामी अंगूठी-2

यदि ये सिद्ध हो जाए कि रामनामी अंगूठी का अस्तित्व है तो हिंदुओं के कत्लेआम की सच्ची घटना को झूठ बना देना वायर जैसे मीडिया के लिए बड़ा आसान हो जाएगा. अंगूठी को ‘मोहरा बनाया गया है.

नीलामी पर बीबीसी की खबर ने इस संदेहास्पद तथ्य को सटीक बना कर रख दिया. ये षड्यंत्र इतनी बारीकी से रचा गया कि कभी इसका पटापेक्ष हो ही नहीं सकता था, यदि आर्थर वेस्ले न होते तो.

[टीपू की तथाकथित रामनामी अंगूठी-1]

41.2 ग्राम की ये विशालकाय अंगूठी कोई फेक नहीं है. देवनागरी में राम लिखी हुई इस अंगूठी को सन 1799 से लेकर 1805 तक वेलिंगटन ड्यूक आर्थर वेस्ले के परिवार ने सुरक्षित रखा. इसके बाद रॉयल यूनाइटेड सर्विस म्यूजियम में ये 1952 तक रही.

बाद में इसे पुनः वेल्स स्थित वेस्ले परिवार को सौंप दिया गया. सन 2012 में जब रामनामी अंगूठी को नीलामी के लिए ‘क्रिस्टीज़’ लाया गया तो ये फिर चर्चा में आई. हालांकि उस वक्त कोर्ट में आपत्ति के कारण ये नीलाम नहीं हो सकी थी.

‘उंगली से उतारने’ वाली बात म्यूजियम के कैटलॉग में भी लिखी गई है. और इसी गलती ने वामपंथियों के हाथ मे नया हथियार दे दिया. कुरान में लिखा है कि मुस्लिम पुरुष किसी किस्म का जेवर नहीं पहन सकता. टीपू तो धर्मांध था, फिर कैसे अंगूठी पहन सकता था, वो भी रामनामी.

कैटलॉग में लिखा है कि 1799 में श्रीरंगपट्टनम की लड़ाई में टीपू के मरने के बाद ये अंगूठी उसकी ‘उंगली’ से उतारी गई. अब जानते हैं टीपू को ये अंगूठी किसने दी और ये उसके लिए बहुत खास क्यो थी और अंग्रेज़ों को ये कहाँ से मिली.

4 मई 1799 की सुबह टीपू अपनी राजधानी को ब्रिटिशों और उनके सहयोगियों से बचाने का संघर्ष कर रहा था. उनके ज्योतिषियों ने चेता दिया था कि चांद का आखिरी फेरा उसके लिए जानलेवा साबित हो सकता है.

जब वह दोपहर का भोजन कर रहा था तो ज़ोर का धमाका हुआ. वह घोड़े पर सवार होकर तेज़ी से धमाके की जगह की ओर भागा. कहते हैं वो टीपू की आखिरी दौड़ थी. जब रात को उसकी तलाश की गई तो छर्रों से क्षत-विक्षत टीपू जमीन पर पड़ा मिला.

मेजर एलन मौके पर मौजूद थे और उन्होंने टीपू के शव के पास जो मिला उसका जिक्र किया है. उन्होंने लिखा ‘ उसने कीमती व्हाइट लीनन के साथ एक जैकेट पहन रखा था. उसकी कमर पर सिल्क और कॉटन का महंगा पट्टा बंधा था. लाल और हरे सिल्क का बना एक बटुआ उसके कंधे पर झूल रहा था. उसकी पगड़ी खुली हुई थी. उसके बाजू पर एक तावीज़ बंधा मिला, जिस पर अरबी और पर्शियन में कुछ लिखा था.

इसके अलावा टीपू के पास कुछ नहीं मिला. धमाका टीपू को फंसाने की साज़िश थी. कहा जाता है उस दुर्दान्त शासक की हत्या कुछ अज्ञात भाड़े के हत्यारों ने की थी. अंगूठी इस विवरण में कहीं नहीं थी. फिर कहाँ थी अंगूठी?

लार्ड वेस्ले खुद टीपू का शव देखने आए थे. वहीं वेस्ले जिनका जिक्र पूर्व में किया था. टीपू अपने खजाने में हीरे-जवाहरात रखने का शौकीन था. वेस्ले को रामनामी अंगूठी टीपू के सबसे सुरक्षित ख़ज़ाने ‘तोषखाने’ से मिली थी.

इसका जिक्र बाहर इसलिए नहीं किया गया क्योंकि वेस्ले ने इसे अपने निजी संग्रह में रख लिया था. ये रामनामी अंगूठी इतनी खास नहीं थी कि टीपू उसे अपने निजी ख़ज़ाने में जगह देता. फिर टीपू ने इसे अपने पास क्यो रखा.

टीपू के खजाने के लिए ये अंगूठी चमत्कारिक रूप से भाग्यशाली सिद्ध हुई. उसे ये अंगूठी शंकराचार्य सच्चिदानंद भारती से प्राप्त हुई थी. इस बात की पुष्टि उन 47 पत्रों से होती है जो उसने 1753-1799 के बीच उन्हें लिखे थे.

जब टीपू को उसके ज्योतिषियों ने अंधकारमय भविष्य के बारे में बताया, तो वह भयभीत हो गया था. अंतिम दिनों में हिन्दू मंदिरों में दान करने लगा था. रामनामी अंगूठी की महिमा वह जानता था इसलिए उसने इसे पाने के लिए लंबे समय तक शंकराचार्य से याचना की थी.

वो अंगूठी जिसने भी नीलामी में खरीदी है, उसकी अद्भुत विशेषता के बारे में जानता है. यहीं कारण है कि उसकी जानकारी गुप्त रखी गई है. द वायर, बीबीसी और एनडीटीवी जैसे मीडिया संस्थान बदस्तूर इस अंगूठी के बहाने झूठ फैलाकर टीपू को नायक बताने का प्रयास जारी रखे हुए हैं. ये उनके षड्यंत्र का भंडाफोड़ है.

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