स्मृतियां : हिन्दू अस्मिता और स्वाभिमान के जागरण का वह दौर

तीन साल पहले यानी 2014 का ये लेख सामने आया तो यकायक रोमांच से रोंगटे खड़े हुए तो तुरंत ही भाजपा नेतृत्व की मानसिकता से कसैलेपन, क्षोभ और निराशा वाले कई भावों ने रोमांच तो वहीँ शांत कर दिया… लेकिन अपने युवा मित्रों के लिए इस लेख को पुनः साझा करने से ना रुक सका.

ना तो कोई याद कर रहा है, ना ही कोई याद करना चाह रहा है… लेकिन मुझे सब कुछ याद आ रहा है… क्यों ना आए, पूरे पच्चीसवीं बार वे सारे दृश्य सिनेमा की रील की तरह सामने आकार रोमांचित कर रहे हैं… जो हिन्दू अस्मिता और स्वाभिमान के जागरण के उस दौर के एक-एक पल के गवाह हैं.

वो कारसेवा का जोश… मुल्ला यम का दमन… हिंदूत्व के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को निर्द्वंन्दता से हाँकते हुये हिन्दू हृदय सम्राट ‘आडवाणी जी’… कारसेवकों के येन केन प्रकारेण अयोध्या की ओर बदते कदम…

तो मुलायम के अपने ऐलान ‘परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा अयोध्या में’ को पूरा करने के लिए हर तरह के दमन के क्रम में साधुओं से यूपी की जेलें भरने से भड़कते आक्रोश का… लालू द्वारा आडवाणी जी गिरफ्तारी करके ‘हिन्दू दावानल’ में परिवर्तित होना…

सभी दृश्य ज्यों के त्यों आज आँखों के सामने से गुजर रहे हैं.

29 अक्टूबर 1990… 40 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले हमारे कस्बे की 100 फीसदी मुस्लिम आबादी के बीच से उस दिन निकलने वाला यह तीसरा जलूस था…

जलूस में जोशीले शिशु, तरुण, युवा पूरे जोश से “जिस हिन्दू का खून ना खौले खून नहीं वो पानी है… जन्मभूमि के काम ना आए वो बेकार जवानी है!”… “सौगंध राम की खाते हैं… मंदिर वहीं बनाएँगे!”… बच्चा-बच्चा राम का… जन्म भूमि के काम का!”, जैसे नारे लगते हुये बढ़ रहे थे.

मैं अलग खड़ा हो कर इस जलूस में भी उन चेहरों को तलाश कर रहा था जो कभी भी शाखा गए हों। पिछले 6 दिन से लगातार निकलने वाले जलूसों में शाखा जाने वाले लोगों की संख्या गौण ही रहती थी… ये तथ्य अंदर ही अंदर बहुत आत्मसंतोष और खुशी पैदा करता था कि अब हिन्दू जाग गया है.

तभी CO प्रमोद सक्सेना ने पीछे से आकर कंधे पर हाथ रखकर कहा, “गिरधारी जी अब तो रोकिए इनको…”

मैंने कहा, “इनमें कोई भी ऐसा नहीं है जिसको मैं ठीक से जानता होऊँ तो रोकूँ कैसे…”

सक्सेना जी ने बात काटी, “क्यों… आपके जेल से आने के बाद (23 अक्टूबर) से ही तो ये जुलूस शुरू हुये हैं’.

मेरा जवाब था, “ना… साधूओं की गिरफ्तारी से लगी आग में आडवाणी जी की गिरफ्तारी ने पेट्रोल डाल दिया है…”

“अब ये “जिस हिन्दू का खून का ना खौले… का नारा तो बंद कराओ”…

“ना जी… मेरे वश की कुछ नहीं है…”

अब CO सक्सेना भी लाचार हो जलूस देखने लगे… मैं उनके अंदर भी कोई जोश सा पैदा होने का स्पष्ट एहसास कर पा रहा था…

मैंने यूं ही पूछ लिया, “क्या होगा कल अयोध्या में? गोली चलेगी क्या?”

CO बोले, “भीड़ पर गोली चलतीं हैं क्या?”…

“भीड़ कैसी? मुल्ला यम खान का तो ऐलान है परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा…”

“अजी गोयल साहब, परिंदा ही तो पर नहीं मार पाएगा, शेर को कोन रोकेगा?… अब इस भगवा तूफान के सामने कोई अधिकारी मुलायम जी के हर तरह के आदेश मानने की कोई रिस्क कैसे लेगा! और गोली का आदेश देगा तो किसे, बगावत भी तो हो सकती है!…”

एक आईपीएस का यह कथन मुझे ना केवल कारसेवकों की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त कर रहा था, बल्कि देश और समाज में आए बहुत बड़े परिवर्तन के प्रति रोमांच और आह्लाद का अनुभव करा रहा था.

रात को नींद नहीं आ पा रही थी, ये ही उत्तेजना थी… ‘कल कार सेवा होगी कि नहीं, कौन-कौन पहुंच पाएंगे…’

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