विरह में तड़पते प्रेम का आर्तनाद : तेरे बिन फीका फीका है दिल का जहां

आसमान का नीला रंग चुराकर, प्रेम की नदी में घोल आने से नदी आसमानी हो जाती है. कामनाएं दुनियावी पैरहन उतारकर नीले रंग को देह पर मलती हैं, और जलपरियों की भांति क्रीड़ा करती हुई चाँद का गोला एक दूसरे पर उछालती हैं…

गीले पानी में सूखे भाव भी, तेज़ी से भागती रात के साथ रतजगा करते हुए पार कर जाते हैं रात में रत सारे पहर को. सुबह स्वागत की सुनहरी चुनरियाँ देती हैं भेंट और कामनाएं सद्यस्नाता सी उसे बदन पर लपेट फिर लौट आती हैं सभ्य समाज के बीच ससम्मान.

लेकिन धरती के धूसर रंग में कोई भी रंग मिला दो धरती का धरतीपना कभी नहीं जाता… धरती का धैर्य और धीमा प्रेम, धूप की धार पर धीरे धीरे कदम बढ़ाते हुए भी पार कर जाता है प्रतीक्षा का वह समय… जहां प्रेम को विरह वरदान रूप में मिलता है… और लांछन को भी वो लाज की लालिमा नहीं बनने देता.

क्योंकि प्रेम केवल कविता में उतरती कलात्मकता नहीं, गीतों में उतरता गायन भी नहीं, प्रेम पीड़ा के पहाड़ पर लहराती पताका है जहां हार और जीत कोई मायने नहीं रखती. जान की बाजी लगा देने वाली जीवन की जिजीविषा, मृत्यु सदृश्य संतापों और यातनाओं को ह्रदय के अंतरतम खंड में नगीनों की भांति जड़कर भी चेतना को जड़ नहीं होने देती. समय की तरलता के साथ वो प्रेम को भी तरल कर देती है.

तरल प्रेम के समंदर में लहरें तो उठती हैं लेकिन ठोस रेतीले किनारों पर अपनी लहरियों की चूड़ियाँ तोड़ कर भी वो हर उगते और ढलते सूर्य की सिंदूरी किरणों को माथे पर सजाकर सदा सुहागन का वरदान प्राप्त कर लेती है… और प्रेम का सिंदूरी रंग जब धरती पर बिखरता है तो धरती की धूसर मिट्टी से उगते हैं जीवन के नवरंग जिसे वो नौ दिशाओं में बिखेरती हुई वो आवाज़ लगाती है…

मैं छुपी हूँ पिया तेरी पलकन में
तेरी धड़कन में, तेरी हर साँस में,
तेरी हर आस में
मैं छुपी हूँ कहाँ मेरा ये राज़ सुन
दर्द के हाथों ग़म से भरा साज़ सुन
मेरे रोते हुये दिल की आवाज़ सुन
जब तलक तेरा मेरा न होगा मिलन
मैं ज़मीं आसमाँ को हिलाती रहूँगी
आख़िरी आस तक आख़िरी साँस तक
ख़ुद तड़पूँगी और तड़पाती रहूँगी…

और तभी धरती पर बिखरे नवरंग को देख आसमानी प्रेम धरती की पुकार के जवाब में दसवीं दिशा से प्रकट होता है…

ये कौन घूँघरू झमका
ये कौन चाँद चमका
ये धरती पे आसमान आ गया पूनम का
ये कौन फूल महका
ये कौन पँछी चहका
महफ़िल में कैसी ख़ुश्बू उड़ी दिल जो मेरा बहका
लो तन में जान आई, होंठों पे तान आई
मेरी चकोरी चाँदनी में कर के स्नान आई
बिछड़ा वो मीत आया, जीवन का गीत आया
दो आत्माओं के मिलन का दिन पुनीत आया
सूरत है मेरे सपनों की तू सोहनी
जमना तू ही है तू ही मेरी मोहनी
तेरे बिन फीका फीका है दिल का जहां….

ये धरती और आसमान का मिलन गीत है, ये उस पावन रिश्ते पर मोहर है… जो कवि की मोहिनी के ह्रदय से उठकर जमना के माथे तक पहुँचता है तो सुहाग के वरदान के रूप में सदा चमकता रहता है… ये उस आसमानी प्रेम की कहानी है जो जब धरती की हकीक़त में ढलता है तो ढलती उम्र के साथ, दुनिया के अचम्भे पर लगातार चढ़ता जाता है…

16 बरस की बाली उमर को सलाम, ऐ प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY