समाजवाद की वह देन, जिसकी कोई बात नहीं करता

क्या आप ने सोचा है कभी कि लोग एक नंबर में सारा पैसा रखने से क्यों डरते हैं?

एक कारण मेरे मन में आता है – समाजवाद… जब सरकार समाजवाद का पुरस्कार करती है तो चींटी की मेहनत से टिड्डे को खिलाती है. और किसी भी मेहनतकश चींटी को यह गवारा नहीं होता.

मनुष्य मूलत: स्वार्थपरायण होता है, अपने और अपनों के लिए मेहनत करता है. समाज और सभ्यता के चलते यह बात को मानता है कि सरकार जो इन्फ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा आदि मुहैया करती है वह टैक्स से ही संभव है. इसलिए टैक्स देता है और वहाँ भी चाहता है कि जो है उससे कम हो या बिलकुल ना हो.

पुराणों की दुहाई देने वाले भी यह जान लें कि तब भी उन राजाओं को टैक्स वसूलने वाले रखने पड़ते थे. याने यह बात तो तय है कि रकम या प्रतिशत कितनी भी ‘रीज़नेबल’ हो, जनता से टैक्स ‘वसूलना’ ही पड़ता रहा है.

ऐसे में जब सत्ता में बैठे लोग यह कहने लगे कि जनकल्याण की योजनाओं के लिए अधिक आय वालों को ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा और वही सरकार दूसरी तरफ कर-योग्य आय की सीमा बढ़ाती है तो अधिक आय वालों के मनों में एक आक्रोश उठता है कि यह ज्यादती है. मैं अपने लिए और अपनों के लिए मेहनत करता हूँ, लेकिन अगर सरकार जनकल्याण के नाम पर लूट मचाये तो सही बात नहीं है.

सरकार के पास प्रचार व्यवस्था होती है जिसके तहत ऐसी सोच को गणशत्रु स्थापित किया जा सकता है और बगैर मेहनत मुफ्त की शराब-कबाब भकोसने के आदी वामी भुक्खड़ यह काम तत्परता से कर देते हैं.

और यहाँ वो स्थिति उत्पन्न होती है जिसका Ayn Rand ने अपने उपन्यास ‘एटलस श्रग्ड‘ में बहुत सटीक शब्दों में वर्णन किया है – “सत्ता चलाना हमारा मकसद है और वो भी पूरी सत्ता, समझ लीजिये. आप लोगों की समझ उतनी है ही नहीं.

बेहतर होगा कि आप हमें ठीक से समझ लें. निर्दोष लोगों पर सत्ता नहीं चलाई जा सकती. सरकार को असली सत्ता होती है गुनहगारों को सज़ा देने की. तो अगर जनता में गुनाहगारों की संख्या कम है तो सारी जनता को ही गुनाहगार बना दो…

ऐसी बातों को गुनाह बना दो कि गुनाह किए बिना जीना ही असंभव हो जाये. किसको चाहिए कानून से चलने वाले लोगों का देश? उसमें किसको क्या मिलेगा? लेकिन कानून ही कुछ ऐसे बना दो जिनका पालन संभव न हो, उनका कड़ाई से लागू करना भी संभव न हो और उनका एक ही निष्पक्ष अर्थघटन भी संभव न हो – तो फिर आप को कानून तोड़ने वालों का देश मिलता है और आप उनके अपराधबोध से कमा सकते हैं. यही सिस्टम है श्रीमान रेयर्डेन; आप इसे जितने जल्दी समझ जाएँ, आप से निपटना आसान होगा.

दो नंबर का पैसा या काला धन यहीं से शुरू होता है और उसे लेकर किसी को अपराधबोध नहीं होता क्योंकि वो व्यक्ति मानता है कि उस धन पर सरकार का नहीं, उसका अपना हक है.

और जब जो सफ़ेद नहीं वो काला है, कम-ज़्यादह कुछ नहीं, तब ये सब एक होकर अपना संख्या-बल आजमाते हैं क्योंकि संख्या ही बल है. और इसमें महज अपनी मेहनत की कमाई को सरकार से छुपाने वाले को भी किसी ड्रग का धंधा करनेवाले या flesh trader से हाथ मिलाना पड़ता है. फिर कोई नैतिक मूल्यों की या नैतिक श्रेष्ठता की बात अलग नहीं रह जाती.

यह समाजवाद की वह देन है जिसकी कोई बात नहीं करता. ये देश को आर्थिक रूप से दिवालिया तो करता ही है, प्रजा को भी नैतिक रूप से दिवालिया बना देता है.

और जब तक सरकार समाजवाद को सर पर बिठाये रहेगी, लोग अपनी कमाई व्हाइट में रखने से हिचकिचाएँगे क्योंकि समाजवाद के नाम पर सरकार उनके पैसे पर हाथ मार सकती है. और अगर आप के सब पैसे व्हाइट के हैं तो उन्हें बचाना आप के लिए मुमकिन नहीं.

यह ना होता तो भारत इतना तो गिरा नहीं है अब तक कि ज़रा से पैसे बच जाने पर हर कोई उन्हें ब्लैक बनाने की सोचता. आज सरकार व्हाइट में लाने के लिए प्रोत्साहन दे रही है लेकिन ये पिछली सरकारों का hangover उतरा नहीं है.

और इन्दिरा के चिपकाए समाजवाद का लेबल अभी भी संविधान पर फेविकोल से चिपका बैठा है. बाकी भारत को जबर्दस्ती समाजवाद की घुट्टी पिलाने वाली इन्दिरा और उसके परिवार की गरीबी और सादगी तो सब जानते ही हैं.

97% इन्कम टैक्स किसके ज़माने में था, याद है? हाँ, एक करोड़ कमाने वाले को लगता था. अब यह बताएं, यदि एक करोड़ कमाकर तीन लाख ही जेब में आए तो आदमी चार लाख कमाने से ही संतुष्ट क्यों न रहे?

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