व्यंग्य : पेट के तोंद में बदलने की कहानी

पेट के तोंद में बदलने का अंदेशा सबसे पहले तोंद के मालिक को ही होता है पर असमंजस बना रहता है पहले कुछ महिनो तक. वो उसे पेट ही कहता रहता है. उसके अस्तित्व से ही इनकार करता है.

हल्के से लेता है वो अपनी तोंद को. समझाता है वो खुद को कि ये लगातार हो रहे शादी ब्याहों में उड़ाए गये तर माल का नतीजा भर है. उसे लगता है पिछले कुछ दिनों से पूरी ना हो सकी नींद की वजह से हुआ है ऐसा और जल्दी ही वह अपने पुराने शेप में लौट आयेगा.

नयी नयी तोंद के मालिक को लगता है कि ये मौसमी वायरल टाईप की भरी जवानी में हुये मुँहासो जैसी ही कोई चीज है. जिसे बिना इलाज के एकाध हफ्ते में खुद-ब-खुद ठीक हो ही जाना है.

पर ऐसा होता नही. हफ्ते महिनों में बदलते हैं, वो नामुराद चीज उसके सीने से नीचे और कमर के ऊपर बेशरमी से अपना आयतन बढ़ाती रहती है.

बीबी बच्चे टोकने लगते हैं ऐसे में. वो बीबी के माथे मढता है अपनी तोंद. उसके बनाये खाने को, उसके जिद करके खरीदे गये टीवी को, रोज रोज आते त्यौहारों को, अपने बाप, दादाओं की तोदों सी आनुवांशिकता को इसका जिम्मेदार बताता है. तोंद का जिक्र होते ही मुँह बनाता है. लड़ने भिड़ने पर उतारू होता है और घर का माहौल खराब कर देता है. चाहता ही नहीं कोई यह नाजुक मुद्दा छेड़े. बीबी बच्चे जल्दी ही समझदार हो जाते हैं ऐसे में और तोंद अनदेखी की जाने लगती है.

पर तोंद को पसंद आता नहीं अनदेखा किया जाना. वह शर्ट के बटन तोड कर प्रगट हो जाना चाहती है. हो ही जाती है. मजबूर कर देती है बंदे को कि शर्ट इन करना छोड दे.

बीबी बच्चे मन मार कर भले ही तोंद की तरफ से आँखे फेर लें पर कमीने दोस्त यार मानते नहीं. मजे लिये जाते हैं तोंद के मालिक के. तोंद के फायदे समझाने के साथ साथ उसे तोंद के निकल आने के ऐसे ऐसे कारण बताते हैं जो केवल खून जलाते हैं. तोंद से पीछा छुडाने के ऐसे ऐसे जानलेवा तरीके भी बताना भी दोस्त अपना फर्ज समझते हैं जिन्हें अमल में लाने के चक्कर में बंदे की जान जाते जाते बचती है.

बहुत बार तानों से प्रेरित भी होता है वो. लड़ता है वो अपनी तोंद से. कसम उठाता है कि वो वापस अपनी तेईस साल की उम्र वाला पेट हासिल करके ही दम लेगा. अपने लिये कठिन टाईम टेबल तय कर लेता है वो. नये मँहगे स्पोर्ट्स शू खरीदता है. सुबह जल्दी उठकर घूमने जाना शुरू होता है. क्या खाना है. कितनी पीना है जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओ को भी इस टाईम टेबल में जगह दी जाती है. नजदीकी जिम की साल भर की फीस एडवान्स मे भर दी जाती है.

कपालभाति और अनुलोम विलोम भी जिंदगी में चले आते हैं. आयुर्वेद के मरियल से डॉक्टरो की सलाहों पर अमल भी होता है. यह सिलसिला चलता भी है कुछ दिन. फिर कभी अचानक लेट नाईट पार्टी हो जाती है. मौसम अचानक खराब हो जाता है. सुबह सुबह बॉस को लेने एयरपोर्ट भी जाना पड़ता है बंदे को. कभी कभी पीठ की कोई नस खिंच जाती है. नतीजा वही निकलता है इसका. स्पोट्स शू पर धूल जमने लगती है और तोंद चीन की तरह चुपचाप अपना इलाका बढ़ाने में लगी रहती है.

तोंद और आदमी की लडाई में तोंद हमेशा बाजीराव पेशवा साबित होती है. आपको हथियार डालने ही पड़ते हैं इस अजेय योद्धा के सामने. घुटने टेकता है वो अपनी तोंद के सामने और संधि करने पर विवश होता है.

ऐसे में अब क्या करे आदमी. वो अनचाहे गर्भवती हो गयी महिला की तरह बर्ताव करता है. ढीले कपड़े पहनना शुरू करता है अब वो. कुछ समय पहले ही खरीदी गई पेंट के बगावती हुको को नजरअंदाज कर अगली साईज का पेंट खरीदता है. फोटो शूट करते वक्त साँस बाहर छोडता है और तब तक साँस नहीं लेता जब तक फोटोग्राफर क्लिक ना कर दे. अपनी फोटो तब तक एडिट करता है जब तक उसमे से तोंद अन्तर्ध्यान ना हो जाये.

तोंद से पराजित आदमी सोफे में धँसे रहना स्वीकार कर लेता है. अब टीवी पर बाबा रामदेव का पेट फुलाना, पिचकाना प्रभावित नहीं करता उसे. वो एक लार्ज पिज्ज़ा ऑर्डर करता है और चैनल बदल देता है. मान लेता है कि वो अब अपने घुटने कभी नहीं देख पायेगा.

स्मार्ट लोगों की संगत से बचता है अब वो. अपने जैसे तोंद के मालिक पंसद आने लगते हैं उसे. उसके तर्क अपनी तोंद को सपोर्ट करते हैं अब. मामूली बात है ये यार. क्या फर्क पड़ता है. किसकी नहीं होती तोंद. खाये पिये लोगों की निशानी है ये भाई. एक उम्र के बाद तो सबकी निकल आती है ये. हमारी भी है तो है.

तोंद का निकलना, निकले रहना जन्म मरण सा ही विधि हाथ है. यदि ये आपका नक्शा बिगाड़ कर पाकिस्तान की तरह पैदा हो ही चुकी है तो मान लीजिये कि वह है. इससे लड़ना समय और धन की बरबादी ही है और कुछ नही.

जीना सीखिये अपनी तोंद के साथ इसी में सार है.

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