सत्ता का खेल इतना ही सरल होता तो फिर हर कोई राज कर लेता

सुन रहे हैं, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पूर्व राष्‍ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की हत्‍या से जुड़े करीब 2800 गोपनीय दस्‍तावेज जारी करने का आदेश दिया है. अर्थात कैनेडी की हत्या से सम्बंधित फाइलें सार्वजनिक की जाएंगी.

यह सब मुझे बड़ा हास्यास्पद लगता है. क्या हत्या किसी फाइल में अप्रूव करने के बाद की गई होगी? हद ही है, जैसे की मानों हत्या करवाने का कोई सेक्शन या विभाग हो जो एक प्रस्ताव रखेगा, जिसे फिर एक अथॉरिटी अप्रूव करेगी, और फिर दशकों बाद हमे उसे देख-पढ़ कर यह पता चल जाएगा कि हत्या किसने की, किसने करवाई, कैसे मारा, कौन-कौन इस हत्या के पीछे था, कैसे योजना बनी आदि आदि.

यह सब सोच कर ही हँसी आ जाती है. उस पर से भी अगर आप को हत्या का अंदेशा सीआईए और केजीबी जैसी संस्थाओं पर हो. इन खुफिया एजेन्सी के दाएं हाथ को पता नहीं होता है कि बाएँ हाथ ने क्या किया. और फिर इस खेल में वामपंथी तानाशाह रूस के राष्ट्रपति ख्रुश्चेव और क्‍यूबा के कद्दावर फिदेल कास्त्रो जैसो का नाम भी हो तो यह कितना गहरा अँधेरा होगा, यह वही समझ सकता है जो वामपंथ की षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति को जानता है.

वैसे भी क्या कोई हत्यारा सबूत छोड़ता है? नहीं, बल्कि सबूत मिटाने की कोशिश करता है. और अगर राजनैतिक और हाई प्रोफाइल हत्या है, वो भी षड्यंत्र के तहत की गई है तो इसके प्रमाण का मिल पाना असम्भव है.

मगर जनता तो फिर जनता ही है, चाहे अमेरिका की हो या फिर भारत की.

क्या मिला हमे नेताजी की फाइलों में? बाकी जो भी मिला हो, जैसे की अनेक जानकारियां, मगर यह पक्के तौर पर नहीं मिला कि कोई दुर्घटना हुई भी या नहीं. जब दुर्घटना का ही नहीं पता तो फिर उससे जुड़े षड्यंत्र पर जैसे कयास पहले लगते रहे वही लगाते रहो. और उस साज़िश के पीछे कौन था यह तो जान पाना दस्तावेजों में असंभव है.

यह सोचना भी कितना मूर्खतापूर्ण है कि युद्ध में लड़ रही जापान और रूस की सेना एक दूसरे के समर्थकों-शुभचिंतकों को मारने का रिकॉर्ड रखेगी. ठीक इसी तरह क्या कभी शास्त्री जी की असामान्य मौत के राज़ खुल पाएंगे? कभी नहीं.

इसकी उम्मीद जो करते हैं वे बड़े भोले हैं. किसी ने फ़ाइल में लिख कर उनकी हत्या का षड्यंत्र नहीं रचा होगा. ना ही सबूत और प्रमाण को कॉपी करके सहेज कर रखा होगा कि हम उसे पढ़ सकें. क्या कोई यह रेकॉर्ड करेगा कि हाँ मैंने इसे गोली मारने के इतने पैसे दिए थे या ज़हर देने के लिए इसे रखा था.

जब छोटे-बड़े गिरोह अपने ज़िंदा सबूत को नहीं छोड़ते तो फिर तो ये सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों का मामला है. इसमें कोई कैसे बच सकता है. कैनेडी मामले में भी यही हुआ. इस हत्या के लिए बंदूकधारी ओसवाल्ड को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन उस पर इस हत्‍या का मुकदमा शुरू होने से पहले ही उसकी भी हत्‍या कर दी गई.

हत्या की गुत्थियां कम ही सुलझ पाती हैं. आरुषी से लेकर जब सुनंदा जैसों की पहेली नहीं सुलझ पायी तो जिनका सम्बन्ध सत्ता के शीर्ष से हैं उनके तो हाथ फिर लम्बे और एक साथ अदृश्य रूप में कई जगह होते हैं. क्या आज तक दुनिया के किसी भी सत्ता शीर्ष की हत्या प्रमाणित हो पायी है. नेपाल राजवंश एक दिन में समाप्त कर दिया गया, किसी को कुछ नहीं पता!

यह जानकार हैरानी होगी कि उच्च वर्ग, उसमें भी सत्ताधारियों की हत्याओं का प्रतिशत सर्वाधिक है. वो भी आज से नहीं सदियों से. और षड्यंत्र में अधिकांश नजदीक के ही लोग होते हैं. ये सब हत्यायें कभी अपने हाथ से, कभी अपने लोगों के द्वारा करवाई जाती रही है. हत्या वही करवाता है जिसे सत्ता पर बैठना है या फिर सत्ता में उसकी भागीदारी बढ़नी है. इसलिए भी करवाई जाती है अगर वर्तमान सत्ता से आप को नुकसान हो रहा हो. हर षड्यंत्र का कोई मकसद होता है. लाभ और लोभ का सरल सिद्धांत है.

बहरहाल वो ज़माने चले गए जब औरंगजेब ने किस-किस को मारा सबको खुले में पता है. लेकिन आज के युग में भी यह ओपन सीक्रेट होता है कि किसकी हत्या में किसका हाथ हो सकता है. भारत के जन सामान्य को पता है कि नेताजी के साथ जिस किसी ने जो कुछ किया है उसके पीछे कौन हो सकता है. शास्त्री जी की मौत के षड्यंत्र में कौन-कौन शामिल हो सकता है यह आम भारत का नागरिक जानता है.

ठीक इसी तरह यह अमेरिका की जनता को तय करना है कि वो अपने सर्वाधिक चर्चित और लोकप्रिय राष्ट्रपति की हत्या के लिए किसको जिम्मेवार ठहराती है. अगर वो यह मत नहीं बना पाती तो फिर यह उनका दुर्भाग्य है.

यह दुर्भाग्य ठीक उसी तरह है जिस तरह से हमें भी यह तो पता है कि गांधी को गोली गोडसे ने मारी थी और उनको जल्द ही फांसी दे दी गई थी. संघ पर कार्यवाही भी की गई थी, मगर क्या सच में गोडसे की गोली से ही वो मरे थे?

गांधी की मौत का असली खेल क्या था, यह किसके कारण और कैसे हुई, यह भारत कभी नहीं जान पायेगा. क्योंकि कई बार जो बताया जाता है वो होता नहीं और जो होता है वो बताया नहीं जाता. अगर सत्ता का खेल इतना ही सरल होता तो फिर हर कोई राज कर लेता.

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