वामपंथी चक्रव्यूह में फंसी भारत की सांस्कृतिक परम्पराएँ

ये इसलिए पूछा क्योंकि रोटी से जुड़ा कुछ पूछना था. रात में या सुबह के नाश्ते में जब रोटी आप खाते हैं तो वो कैसरोल में रखा होता है. नाम अंग्रेजी का है, Casserole तो जाहिर है ये भारत का कोई परंपरागत बर्तन तो है नहीं. आया कहाँ से ? जिन्हें भारत में टीवी का शुरुआती दौर याद होगा उन्हें एक प्रसिद्ध पारिवारिक सीरियल भी याद होगा. उसका नाम था ‘बुनियाद’. रात में जिस वक्त आता था वो टाइम उस दौर में खाना खाने का समय होता था.

उसी सीरियल के बीच में कैसरोल का प्रचार आया करता था. लोग जब खाना खा रहे होते थे रोटी उसी वक्त बनाई जाती थी. अब घर की महिलाएं अगर रोटियां सेक रहीं हों, और पुरुष भी चौके में खाना खा रहे हों, तो टीवी पर ‘बुनियाद’ कैसे देखेंगे? उसी दौर में कैसरोल का प्रचार आना शुरू हुआ जिसमें कहा जाता था कि रोटियां पहले ही बना के कैसरोल में रख लीजिये. वो गर्म ही रहेंगी तो आप आराम से बैठ कर टीवी देख सकती है. अब कई महिलाएं तो पड़ोसियों के घर टीवी देख रही होती थी, कई जो अपने घर में देख रही होती थीं, उन्हें भी ये आईडिया सही लगा.

इस तरह धीरे से भारत के हर घर में कैसरोल आ गया, और रोटियां पहले से बना के रखी जाने लगी. यकीन ना हो तो मम्मी से पूछिए, नानी के पास था क्या कैसरोल? अभी कन्फर्म हो जाएगा. खैर तो कैसरोल से जो समस्या आई वो ये थी कि रखी हुई रोटियां थोड़ी काली सी पड़ जाती थी. इसके लिए दूसरा तरीका इस्तेमाल होने लगा. मिल वाले आटे को पहले छलनी से छान कर जो चोकर निकाला जाता था वो परथन में इस्तेमाल होता था. अब मैदे जैसा बारीक आटा मिल से ही छनवा कर इस्तेमाल किया जाने लगा.

मक्का, जौ जैसी चीज़ें जो गेहूं के साथ ही मिला कर पिसवाई जाती थी वो भी बंद हो गया. इस तरह दिखने में खूबसूरत लगने वाले आटे का फैशन आया. अस्सी के दशक के सीरियल और प्रचार के असर से पिछले करीब बीस साल लोगों ने लाइफस्टाइल डिजीज को आमंत्रण दिया.

फिर धीरे लोगों को समझ आने लगा कि ये कम उम्र में डायबिटीज, हार्ट की प्रॉब्लम और ब्लड प्रेशर की समस्याएँ है क्या! ऐसी कई बीमारियों को मिला कर फिर Lifestyle Disease कहा जाने लगा. लोग अब फिर से पंचरत्न आटे और ये मिक्स आटा तो वो मिक्स आटा खरीदने लगे हैं. वो भी आम आटे से कहीं महंगे दामों पर! आटे का चोकर भी अब उतनी घटिया चीज़ नहीं नहीं होती. देर रात तक ना खाने के बदले, शाम में जल्दी खा लेना भी अब स्टेटस सिंबल है. धीरे धीरे लोगों को समझ आने लगा है कि भारत की सांस्कृतिक परम्पराएँ बेहतर थी. कांग्रेसी युग में कुछ मुट्ठी भर लोगों ने अपने कम्युनिस्ट चाटुकारों के जरिये जो फैलाया था वो मोह माया ही थी.

भारत का बहुसंख्यक समाज अपनी परम्पराओं में ही इकोसिस्टम को शामिल रखता है. असली मूर्ख वो थे जो परम्पराओं का वैज्ञानिक कारण ढूँढने के बदले उन्हें पोंगापंथ घोषित कर रहे थे. उन्होंने कोई वैज्ञानिक जांच किये बिना ही जिन चीज़ों को सिरे से खारिज़ कर दिया था, उनके बंद होते ही पर्यावरण और शरीर पर उनका असर भी दिखने लगा. तथाकथित प्रगतिशील जमात को अब दिवाली पर वायु-प्रदूषण और होली पर पानी की बर्बादी का रोना रोने के बदले वैज्ञानिक तथ्य प्रस्तुत करने चाहिए.

गाड़ियों से, फैक्ट्री से, ए.सी. से, फ्रिज से प्रदूषण कितना? पटाखों-दिए से कितना? दिए से कीड़े ना मरे तो इकोसिस्टम पर क्या असर होगा? होली के समय भी बता दीजियेगा. कार धोने से कितना पानी बर्बाद होगा, होली खेलने में कितना? शेव करने में कितना बहा दिया जाता? अगर पानी ना छिड़का तो धूल उड़ने से होने वाले प्रदूषण का क्या होगा ?

बाकी अधूरी तो कई साल हम सुन चुके हैं, और माफ़ी तो आप कैराना, डॉ. नारंग, वेमुल्ला जैसे संवेदनशील मामलों में भी नहीं मांगते! इसमें भी आधा ही बताया होगा, सिर्फ अश्वत्थामा मर गया तक, मनुष्य कि हाथी भी बताते ना?

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