गुजरात गतिमान है क्योंकि गुजरात गतिशील है

गन्धर्वराज पुष्पदंत ने लिखा है- ‘महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः, कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्.’ अर्थात् भगवान् शिव जो सबके मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं, उनके अपने ‘उपकरण’ हैं- बूढ़ा बैल, खटिये का पावा, फरसा, चर्म, भस्म, सर्प और कपाल. भोलेनाथ सीधे-सादे मंदार धतूरा खाने वाले औघड़ देवता माने जाते हैं. ऐसे शिव शंकर के स्वर्ण जड़ित भव्य मन्दिर कम ही देखने को मिलते हैं.

मैं काशी का निवासी हूँ जिसके कण-कण में शंकर हैं किंतु भगवान् सोमनाथ जैसे ऐश्वर्यशाली भव्य स्वरूप की कभी कल्पना नहीं की थी. द्वादश ज्योतिर्लिंग में प्रथम सोमनाथ का वर्णन केवल शिवपुराण में पढ़ा मात्र था. पंचाक्षर स्तोत्र में आया है- ‘श्रीनीलकंठाय वृषध्वजाय’- पता नहीं कितनी बार इस स्तोत्र का पाठ किया होगा किंतु धर्म के प्रतीक वृषभ (वृषो हि भगवान धर्मः) को कभी ध्वजा में बैठा हुआ प्रत्यक्ष नहीं देखा था. भगवान् सोमनाथ की ध्वजा में स्वयं नन्दी और त्रिशूल विराजमान हैं.

श्रीसोमनाथ के शिखर पर जब यह ध्वजा लहराती है तो उसे देखकर ही आभास होता है कि पश्चिम से आने वाले व्यापारी और लुटेरे इस मन्दिर से क्यों घबराते थे. मन्दिर सदा से ही धर्म और राजसत्ता के प्रतीक रहे हैं. न जाने कितनी बार सोमनाथ मन्दिर को तोड़ा गया और इतिहास की पुस्तकों से इसका अस्तित्व मिटाने के अथक प्रयास किये गए. परन्तु धर्म का यह प्रतिष्ठान आज भी अपने सम्पूर्ण गौरव के साथ खड़ा है.

आक्रांताओं से मन्दिर को बचाने के लिए वीर हमीरजी गोहिल और न जाने कितने ब्राह्मणों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी जिनकी स्मृति में मन्दिर के सम्मुख स्मारक बनाया गया है. बलुआ पत्थर की चट्टानों पर उकेरी गयी शिल्पकृतियों को देखकर अचंभा होता है कि जो रेत हाथ से क्षणभर में फिसल जाती है उसकी चट्टानों पर शिल्पकारों के औजार किस प्रकार टिके होंगे.

जब हम दर्शनार्थ जा रहे थे तब हमारे साथ पंक्ति में चल रही दक्षिण से आई महिलाएं भगवान् शिव को समर्पित सुंदर गीत गा रही थीं. तभी भगवान् की आरती का समय भी हो गया था. स्थानीय मान्यता है कि जब भगवान् सोमनाथ की आरती होती है तब उतने समय के लिए समुद्र एकदम शांत हो जाता है और लहरें नहीं उठतीं. प्रभास की भाँति हमारा मन भी शांत और वातावरण दिव्य हो गया था. भगवान् सोमनाथ के दर्शन के पश्चात इसमें कोई सन्देह नहीं रह गया कि शिव भारत की आध्यात्मिक चेतना के अधिष्ठाता हैं.

भगवान् सोमनाथ का दर्शन करने के पश्चात हम दीव की ओर चले. पहले लगा कि यह गोआ अथवा पॉन्डिचेरी के समान पुर्तगाली या फ्रांसीसी प्रभाव से ग्रसित द्वीप होगा. दीव में पुर्तगाली क़िला, चर्च और सब प्रकार के अवशेष हैं जिनसे पाँच सौ वर्ष पूर्व आये ईसाई आततातियों की प्रवृत्ति का पता चलता है परन्तु आश्चर्य हुआ जब दीव में छोटे-छोटे खिलौने जैसे सुंदर घर देखे जिनका नामकरण राम और कृष्ण पर किया गया है. साफ़ सुथरा मनोरम समुद्र का तट और ढेर सारे मन्दिरों ने दीव की अस्मिता को गुजरात की सीमाओं से अधिक विस्तार दिया है.

हम यही सब देखकर प्रसन्न हो रहे थे कि तभी आँखें भर आयीं जब सड़क किनारे लगे बोर्ड ने ‘भारतीय नौसैनिक पोत-खुखरी’ स्मारक के बारे में बताया. आईएनएस खुखरी युद्धपोत 1971 के युद्ध में डूब गया था जिसकी स्मृति में दीव में स्मारक बनाया गया है. हमें प्रायः थलसेना या वायुसेना के समाचार मिलते रहते हैं किंतु भारतीय नौसेना के बारे में सामान्य जन बहुत कम जानते हैं. इस दृष्टि से जब भी कोई पर्यटक गुजरात में दीव जायेगा तो आईएनएस खुखरी के स्मारक पर जाकर उस युद्धपोत के कैप्टन महेंद्रनाथ मुल्ला (महावीर चक्र) के बारे में जानेगा.

दीव से निकलकर हम पुनः सोमनाथ लौटे और अगले दिवस गीर के पशुओं को देखने के पश्चात द्वारिका की ओर चल पड़े. भगवान् द्वारिकाधीश श्रीसोमनाथ जी के उलट साधारण वेशभूषा में दर्शन देते हैं. उनके मन्दिर में सोना चाँदी अधिक नहीं है. भक्त अपने भगवान् को किस प्रकार सजाते हैं इससे उस क्षेत्र के आर्थिक संसाधनों का ज्ञान होता है.

गुजरात में सोने चाँदी की खान नहीं है. प्राचीनकाल में सोमनाथ मन्दिर में बाहर से सोना लाकर मढ़ा गया होगा जिसे आक्रांताओं ने समय-समय पर लूटा. परंतु श्रीकृष्ण की प्रतिमा को महाराज द्वारिकाधीश के रूप में विभिन्न प्रकार के रंगीन वस्त्र पहनाकर ही सजाया जाता है. प्राकृतिक संसाधनों के मामले में गुजरात एक निर्धन राज्य है फिर भी वहाँ के लोग प्रभु द्वारिकाधीश को ऐसे सजाते हैं जैसे माँ अपने बेटे को दूल्हे के रूप में सजाती है.

द्वारिकाधीश मन्दिर के शिखर पर लगा विराट ध्वज वार के हिसाब से बदला जाता है तथा प्रत्येक ध्वज पर गोल टीके के ऊपर चन्द्रमा बना होता है. यदि गुजरात के गोवंश को दूर से देखा जाये तो गाय का मुख गोल टीके के समान और सींग चन्द्रमा जैसा प्रतीत होगा. सोमनाथ और द्वारिका के ध्वज यह संकेत करते हैं कि यदि भारत की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना करनी है तो गोवंश में विदेशी नस्ल का मिश्रण न किया जाये और राज्य गोरक्षा को संरक्षण प्रदान करे. हमने अपनी पूरी यात्रा के दौरान बड़ी-बड़ी सींगों वाली सुंदर गौएँ देखीं जिनमें एक भी विदेशी नस्ल की अथवा वर्णसंकर नहीं थी.

सोमनाथ से द्वारिका जाते समय पोरबन्दर तथा अन्य तटवर्ती क्षेत्रों में लगी अनगिनत पवनचक्कियाँ देखीं तो पता चला कि बहने वाली हवा भी एक मूल्यवान ‘संसाधन’ है. चूँकि हमारी अधिकांश यात्रा सड़क मार्ग से पूर्ण हुई अतः गाँवों में खेतों में लगी लाइटें देखीं जो सौर ऊर्जा से संचालित होती हैं. पूरी यात्रा में एक भी दुकान पर ‘अंकल चिप्स’ या ‘लेज़’ टँगी हुई नहीं देखी. गुजरात में अधिकांश फ़ास्ट फ़ूड यहीं की कम्पनियों द्वारा निर्मित होता है.

दो दिन अहमदाबाद में घूमने पर भी सम्भवतः एक भी विदेशी कम्पनी का होटल नहीं दिखाई दिया. गुजराती मीठा बोलते हैं और मीठे ढोकले भी बनाते हैं. श्रीखण्ड का मौसम नहीं था किंतु पग-पग पर मिलने वाली छाछ और लस्सी के क्या कहने! द्वारिका के एक रेस्तरां में खाई ‘अनलिमिटेड’ गुजराती थाली का स्वाद मुँह में अभी भी बना हुआ है.

गुजरात पर्यटन के दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश से सैकड़ों मील आगे है. यहाँ घूमते हुए मुझ जैसे ब्राह्मण को जनेऊ अशुद्ध होने का भय नहीं रहा क्योंकि यहाँ प्रत्येक पर्यटन स्थल पर शौचालय है. यात्रा में मेरी माँ को भी तनिक भी असुविधा नहीं हुई. आप जहाँ भी जाएंगे वहाँ स्वच्छ शौचालय मिलेगा. गुजरात में यहाँ के निवासियों और उनके बच्चों के लिए छुट्टियां मनाने के लिए बहुत कुछ है. गुजरातियों को बच्चों को घुमाने हमारी तरह दूसरे राज्यों में नहीं जाना पड़ता.

मैं तो आईआईएम और विक्रम साराभाई द्वारा स्थापित फिज़िकल रिसर्च लेबोरेटरी जैसे बड़े संस्थान ही जानता था किंतु आश्चर्य होता है कि बच्चों के लिए गुजरात साइंस सिटी जैसा उत्कृष्ट संस्थान राज्य सरकार की पहल पर निर्मित हुआ था. गुजरात का पानी खारा है और यहाँ वर्षा बहुत कम होती है फिर भी गुजरात गतिमान है क्योंकि सड़कों पर गतिरोधक गड्ढे नहीं हैं. गुजरात गतिमान है क्योंकि गुजरात गतिशील है. गतिशील होना गति में प्रगति करने वाला स्वभाव है जो गुजरातियों को भगवान् द्वारिकाधीश और भगवान् सोमनाथ जी के आशीर्वाद से सहज ही प्राप्त है.

अब वीरों की भूमि राजस्थान के लिए प्रस्थान.

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