ज़िन्दगी में जब दिमाग और दिल अलग-अलग राह सुझाएँ, तब दिल की सुनो…

अनुराग कश्यप की उम्र बमुश्किल 20 साल की रही होगी जब वो दिल्ली छोड़ मुम्बई आ गए. उन्हें फिल्मकार बनना था. उनको सिर्फ फिल्मकार ही बनना था. कैसे? ये उन्हें पता नही था. पर वो सिर्फ इतना जानते थे कि उनको फिल्मकार बनना है.

फिर वो एक दिन दिल्ली से मुम्बई चले आये. कहां रहूंगा, क्या खाऊंगा, कहा सोऊंगा… पैसे कहां से आएंगे, ये सब कुछ नही सोचा… बस चले आये.

फिल्म लाइन में घुसने का एक रास्ता था थिएटर. सो पृथ्वी थिएटर पहुंचे. पर उसके गेट में घुसना ही मुमकिन न था. सो थिएटर में न घुस सके तो उसकी कैंटीन में ही जा पहुंचे.

कैंटीन में coffee shop के मालिक से बोले, अपने यहाँ वेटर रख लो… उसने कहा, वेकेंसी नहीं है. इन्होने कहा, मैं फ्री में काम करूंगा. सिर्फ खाना खिला देना.

अब हिंदुस्तानी आदमी को फ्री का माल बहुत अच्छा लगता है सो उसने फ्री का वेटर रख लिया. अनुराग पृथ्वी थिएटर की कैंटीन में लोगों को सर्व करने लगे.

थिएटर में हमेशा रिहर्सल चलती रहती थी. संवाद पढ़ने के लिए एक रीडर की ज़रूरत होती थी. अनुराग ने कहा, मैं पढ़ दूं? फ्री में…

जल्दी ही अनुराग की डिमांड पृथ्वी थिएटर में रीडर के रूप में होने लगी… वो लड़का जो फ्री में पढ़ देता है. वो जो न पैसे मांगता है, न नाटक में रोल…

अनुराग लिखना जानते थे… सो लिखने भी लगे… फ्री में…

उन दिनों टीवी पर दैनिक सीरियल (Soap Opera) आने लगे थे. उनका रोज़ाना एक एपिसोड शूट होता था. जल्दी ही अनुराग कश्यप की ख्याति एक लेखक के रूप में हो गयी. वो लड़का जो लिख देता है, और न पैसे मांगता है न credits.

अनुराग बताते हैं कि उस दौर में उन्होंने सीरियल्स के लिए जम के लिखा… 100-100 पेज लिख देते थे हाथ से… फिर एक दिन महेश भट्ट की नज़र पड़ी उन पर. और महेश भट्ट ने उनके साथ अनुबंध कर लिया… कभी-कभी नामक सीरियल के लिए संवाद लिखने का… और वेतन तय हुआ 2.5 लाख रूपए महीना… और अगले 3 साल का contract था. अनुराग ने वो ऑफर स्वीकार कर लिया.

तभी एक मशहूर फिल्मकार भी एक फ़िल्म का ऑफर ले के आ गए. पर वो ऑफर सिर्फ 10 महीने के लिए था और वेतन था सिर्फ 10 हज़ार रूपए महीना.

कहां एक तरफ 3 साल के लिए अढाई लाख रूपए महीना और कहां सिर्फ 10 हज़ार रूपए, वो भी सिर्फ 10 महीने के लिए… महेश भट्ट का ऑफर स्वीकार कर काम करते हुए अभी सिर्फ एक महीना हुआ था.

अनुराग अब एक दोराहे पर खड़े थे… एक तरफ 2.5 लाख रूपए थे दूसरी ओर सिर्फ 10 हज़ार… पर एक तरफ सीरियल था और दूसरी तरफ फ़िल्म…

अनुराग ने महेश भट्ट और उनका सीरियल छोड़ दिया और उस फिल्मकार की वो फ़िल्म साइन कर ली… क्योंकि वो मुम्बई पैसा कमाने नहीं बल्कि फिल्मकार बनने आये थे.

उस फिल्मकार का नाम था राम गोपाल वर्मा और फ़िल्म थी सत्या…

शेष इतिहास है…

सत्या, भारतीय फिल्म इतिहास की एक कालजयी रचना है ज़िसे अनुराग कश्यप ने लिखा था और RGV ने बाकायदे उन्हें इसका credit भी दिया…

उसके बाद अनुराग के पास फिल्में लिखने के ढेरों ऑफर आये, कुछ उन्होंने लिखी भी… पर अंततः उन्हें फिल्मकार ही बनना था.

उन्होंने बिना किसी बजट के, सिर्फ अपने टैलेंट के बल पर पहले ‘पांच’ बनाई जो सेंसर में फंस गई.

फिर Black Friday बनाई जो कोर्ट में उलझ गयी…

पूरे 5 साल वो इसी में उलझे रहे पर कभी हार नहीं मानी.

आज गुलाल, Dev D, No Smoking, Girl In Yellow Boots और फिर उसके बाद Gangs Of Wasseypur जैसी Cult Classic बना के अनुराग एक बहुत बड़ा नाम बन चुके हैं.

ज़िन्दगी में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं जब आपको फैसला करना होता है… दिमाग और दिल दोनों अलग-अलग राह सुझाते हैं.

दिल की सुनो…

Know How से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है Know Why…

यदि Know Why मज़बूत हो तो Know How तो मिल ही जायेगा जैसे तैसे, कैसे भी. Know Why को मज़बूत रखो.

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