सिंधु सील : हिन्दू धर्म से सिंधु घाटी सभ्यता का सम्बंध

यहां इस चित्र में स्पष्ट दिख रहा है कि सिंधु घाटी सभ्यता काल के लोगों को पीपल के वृक्ष का महत्व ज्ञात था आधार पर पीपल की जड़ के बायीं ओर अङ्कित चित्र वर्णमाला है. चतुर्भुज के अंदर “चक्र” का अर्थ सम्राट से है और दाहिनी ओर एक मछली की आकृति वाला चित्राक्षर है जिसका अर्थ सम्भवतः मछली ही है. यहां पर भी एक सींग वाले दो बकरों की आकृति है. सम्भव है कि कालांतर में एक सींग वाले बकरों की प्रजाति ही विलुप्त हो गयी हो.

चूंकि लोकजीवन में मैंने अनुभव किया है कि बकरे बड़े ही चाव से पीपल के पत्ते को खाते हैं, शायद इसीलिए पीपल पेड़ के साथ बकरों को रखा गया है क्योंकि पीपल के पत्ते उनका प्रमुख भोजन होते हैं.

और मछली का चित्राक्षर इसलिए क्योंकि मछली का सम्बंध जल से है और प्राचीनकाल में जल का स्त्रोत जलाशय/नदी ही हुआ करते थे. और जल चक्र के अंतर्गत सामान्य सिद्धांत यह है कि जहां पर वृक्ष होंगे वहां पर वर्षा तो होगी ही.

एक विशेष आकर्षण – इस चित्र को ध्यान से देखें तो चित्र में एक बड़े त्रिशूल की आकृति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है. और त्रिशूल क्या है – हिन्दू धर्म के महादेव शिव जी का प्रमुख अस्त्र. यह सभ्यता कितनी विकसित हो चुकी थी इसका पता हमें इस चित्र में अङ्कित अनेक संकेतों से चलता है.

भारत के तथाकथित “इतिहासकारों” को सिंधु घाटी सभ्यता का सम्बंध हिन्दू धर्म से जोड़ने में भय लगता है क्योंकि इस शोध के पश्चात कहीं सारी दुनिया उनको “Communal” न कहने लगे. इसलिए आजकल के इतिहासकार “भीष्म” बनकर द्रौपदी के वस्त्र हरण होता देखकर आनंद लेते हैं.

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