वामावती नगरी और सोशल मीडियाई जनता की कहानी

वामावती नगरी के महाराज मिथ्यातथ्याधिपति इरफानेश सिंह हबीबावत नगर भ्रमण को निकले तो उल्लासित प्रजा को देख चौंक उठे – अरे! ये आज किस बात का उत्सव मना रहे हो मूर्खों?

जनता – हुजूर , वीर शिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह जी के जन्मोत्सव का .

हबीबावत – गधे हो तुम ! कौन सी लड़ाई जीती तुम्हारे “महाराणा” ने बताओ तो? हल्दीघाटी?

जान बचाकर निकले थे वो अपने घोड़े की कृपा से. मूर्खों! अकबर को आगरे के महल में जाकर पीटा था क्या उन्होंने?

जनता – जी, ऐसा तो नहीं हुआ हुजूर, लेकिन उन्होंने समर्पण नहीं किया था, वो आखिरी सांस तक लड़ते रहे मुग़लों से और एक सिपहसालार को तो उन्होंने घोड़े समेत एक बटा दो चीर दिया था.

हबीबावत – वज्रलेपो ! घास खाते हो क्या? वैज्ञानिक रूप से संभव है क्या ऐसा, एक बटा दो चीर दिया… इन्हें किंवदंतियां कहते हैं जाहिलो! ये चारण भाटों की बोई हुई चरस है कोरी, और क्या मिला प्रताप को अंत में? चित्तौड़?? बोलो, चुप क्यों हो गए? बहस करेंगे हमसे इतिहास के परब्रह्म से? हुंह……

जनता – बेशक चित्तौड़ तो नहीं मिला महाराज लेकिन शेष सभी ठिकाने उन्होंने वापस अपने नियंत्रण में ले लिए और अंतिम सांस तक मुग़ल उन्हें अपने अधीन नहीं कर पाये जिसका अफसोस स्वयं अकबर को भी रहा जिसे अकबर ने नैतिक हार के रूप में स्वीकार किया.

हबीबावत – बाबाजी का ठुल्लू किया स्वीकार, अक्ल के लट्ठों! क्या होता है लड़ने भर से बताओ, बताओ? जीता क्या ये बताओ? 25000 सैनिक मार भी दिए हल्दीघाटी में तो अकबर के क्या कमी पड़ गई बे बोलो? यह महानता है कि बस आखिरी सांस तक लड़ते रहे, इसे ही महानता कहते हो? बेवकूफों! महान केवल विजय होती है, विजय माने कब्जा, महलों पर, भूमि पर, स्त्रियों पर, शत्रु के समस्त परिसंपत्तियों एवं जीवन मात्र पर (जनता ने मन ही मन सोचा “और इतिहास एवं पुस्तकों पर भी” . ” )

( जनता चुपचाप चली गईं जैसे कि सत्य जानते हुए भी नंबर पाने की चाह में बच्चे परीक्षा में मुहम्मद गौरी को दुर्दांत लुटेरा नहीं बल्कि “successful invader” लिख कर आते हैं बेचारे!)
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4 महीने बाद सारी नगरी चकमक – दकमक, दुल्हन की तरह सजी धजी साक्षात कुबेर की अल्कावती सी.

महाराज इरफानेश हबीबावत अपने हाथी पर पीछे एक सुल्तान का चित्र लगाये घूम रहे और आगे पीछे चमचे ( सॉरी उनके अधीन इतिहास के नव आयामो को “गढ़ते” कारीगर ओह्ह सॉरी इतिहासकार)

जनता – प्रणाम महाराज! यह अद्भुत उत्सव कैसा महाराज?

हबीबावत महाराज ने क्रोध से भरी नजरों से देखा और चीख पड़े – दुष्टों! सांप्रदायिकों! आज शेर – ए- मैसूर टीपू सुलतान की जयंती है. नाचो, गाओ, उत्सव मनाओ.

जनता – लेकिन महाराज गुस्ताखी माफ हो, टीपू ने किया क्या था?

यह प्रश्न सुनते ही महाराज इस उम्र में भी हाथी से कूदकर नीचे जमीन पर आ धमके और शुद्धवृषभ (सांड) की तरह नथुने फुला कर बोले – एहसानफरामोशों! बैगरतों ! कृतघ्नों! मर जाओ कुँए मे कूदकर जाहिलो! टीपू ने क्या किया था नहीं जानते हो?

आज जो तुम अंग्रेजों से आज़ाद हो ना वो टीपू की वजह से है बेईमानों! उसने 4-4 लड़ाइयां लड़ी बरसोबरस अंग्रेजों से और अंतिम सांस तक लड़ता रहा.

(महाराज की तलइया भर आईं, आँखे नम हो गई, जिह्वा अवरुद्ध हो गई )

जनता – ओह्ह ! तो क्या टीपू ने अंग्रेजो को मार भगाया भारत से? हमने तो सुना कि मैसूर के तीसरे युद्ध में 30 लाख पोंड और आधा साम्राज्य दे दिया था टीपू ने अंग्रेजों और उनके साझीदार निजाम को हारने के बाद संधि में?

महाराज की इस बिगड़ती हालत को देखकर बेगम-ए- फर्जी माजिस्तान, वर्णसंकरावती रोमिलांगी थापरिवाल ने मोर्चा संभाल लिया.

बेगम रोमिलांगी – माटिमिलो मरजाओ कमीनों! यह नहीं दिखता तुम अंधों को कि अगला अंतिम सांस तक लड़ा अंग्रेजो से मुल्क की खातिर? यही इज्जत है देश के लिए लड़ने/मरने वालों की तुम्हारी नजर में?

जनता – साहिबा ! महाराज हबीबावत ही बोले थे प्रताप जयंती के दिन की अंतिम सांस तक लड़ने से कुछ नहीं होता जीतने से होता है, अब टीपू तो चौथे युद्ध में बाकी बचा आधा मैसूर भी लुटवा बैठे अपनी जान के साथ. अंग्रेजों ने राज ही उसके बाद किया जमकर. आप ही बताइये टीपू ने कौन सी विजय हासिल की अंग्रेजों के विरुद्ध जिसे मुकम्मल कहा जा सके?

बेगम की आंखे भी अब आग उगलने लगी – तुम तो हो ही चोट्टे हिंदुस्तानी! तुम्हें कोई सत्य नहीं समझा सकता, झूठे मक्कार लोग हो तुम.

“पागल थे वो जो उसे शेरे मैसूर कहते थे?” अरे गँवारों टीपू उस समय ही रॉकेट (प्रक्षेपास्त्रो) का उपयोग करना जानता था, ये देखो हाथी पर टंगा चित्र जिसमें उसके पार्श्व में रॉकेट उड़ रहा है. शर्म करो अज्ञानियों! टीपू ने दिल जीते हैं दिल!

जनता – क्या मैडम आप भी? ये सब किंवदंतियां होती है मात्र किवदंतियां, चारण-भाट उनके भी पास होते होंगे ना? भला शेर ही होते तो तलवार की क्या जरूरत पड़ती? और वैज्ञानिक रूप से राकेट संचालन की कोई तकनीक/ईंधन अथवा संरचना के साक्ष्य अथवा अवशेष नहीं मिले आज तक सिवाय इस तस्वीर के, बताइये कैसे विश्वास करें?

वैसे मैडम एक बात बताये? क्या कारण था कि महाराणा प्रताप के भाले, तलवारें, कवच आदि आज भी मेवाड़ के संग्रहालय में सुरक्षित पड़े हैं जबकि टीपू की तलवार अपने बेवड़ा सम्प्रदाय के महामंडलेश्वर, ऋणचोर माल्या जी “बोली” में छुड़वाकर लाएं अंग्रेजों के कब्जे से?

दोनों राजजनों को अब उच्च रक्तचाप से चक्कर से आने लगे और लड़खड़ाती हुई महारानी रोमिलांगी ने अंतिम अस्त्र फेंका – “धोखा! धोखा! ये हमारी जनता नहीं हो सकती इतिहास वाली, कला वाली भोली भाली सरल. ये जरूर साइंस/मैथ्स /कॉमर्स वाले धूर्त घुसपैठिये हैं. ये ही ऐसी राजद्रोही बाते करके हमारी भोली जनता को बरगला रहे हैं. अचानक गुस्से की आग से जलते महारानी के दिमाग के मैसूर पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया और वो फट पड़ी
You scoundrels, frauds, morons, saffron goons, bloody Narcissist, get lost and go to hell ……….

जनता – अच्छा मैडम एक बात और बताइये कि आखिर क्यों मेवाड़ मे आज भी कोई शहर, कस्बा, महत्वपूर्ण इमारत, अकबर/मानसिंह /अंग्रेजों के नाम पर नहीं है? कुछ तो गड़बड़ है ना इरफानेश महाराज/रोमिलांगी जी?

चलिए एक अंतिम सवाल ,” अगर कोई भेड़िया कहे कि उसने भेड़ो को बचाने के लिए लक्कड़बग्गे से लोहा लिया था तो आप उसे शेरे- गुलिस्ता कहेंगी क्या?

अब तो दोनों को भाव (शरीर काँपना / state of be in a “zone” / शरीर में अलौकिक तत्वों का आगमन) आने लग गए और गालियों की भाषा अंग्रेजी से भी ऊपर पहुंच गई, जिससे बचकर आज की सोशल मीडियाई जनता भी निकल पड़ी अपने वास्तविक योद्धाओं का माल्यार्पण करने .

हर हर महादेव !
जय एकलिंग, जय मेवाड़ ..

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