फेसबुक चौपाल : राजनेताओं के मोह में आपा खोते प्रबुद्ध लोग

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अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करना सामान्य मानवीय स्वभाव है. फिर वो कनबतियाँ या चुगली के माध्यम से हो, चौपाल या कॉफी शॉप में हो, यारों की चौकड़ी या बहस मुबाहिसे में हो या सामूहिक मंच पर और सोशल मीडिया में हो. हम सब अपनी बात कहना चाहते हैं.

व्यस्त और एकाकी जीवन में फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम और वॉट्सएप अपनी बात कहने का और भड़ास निकलने का एक माध्यम भी है.

फेसबुक आदि की भी एक आचार संहिता होती है और कम से कम मैं और मेरे 5000 दोस्तों में से अधिकतर उसका पालन भी करते हैं कि राजनैतिक वार्तालाप में, कहानी में, व्यंग में कोई व्यक्तिगत बात या आक्षेप न लगाएं. शालीन शब्दों का प्रयोग करें और जातिगत टिप्पणी न करें.

जहाँ तक नेताओं का सवाल है, उन्होंने खुद को सार्वजनिक जीवन के लिए स्वयं ही प्रस्तुत किया है. पुरानी कहावत भी है कि जिसे अपने खानदान का पता न हो वो चुनाव लड़ ले. आलोचक खुद बता देंगे.

वे सार्वजनिक वस्तु हैं. जनता की मिलकियत हैं. उनकी समीक्षा करना, आलोचना करना, उनकी कमियां जनता को बताना, आर्थिक और सामाजिक चरित्र उजागर करना लोकतंत्र का एक हिस्सा है जो पूरी दुनिया में चलता है.

कोई लिखे कि स्मृति ईरानी और मोदी का कुछ है तो मैं ये तो लिख सकता हूँ कि सोनिया या राहुल की तरफ देखो. किन्तु यदि मैं ये कहूँ कि आप अपना चरित्र देखो तो ये अनैतिक और आचार संहिता के विरुद्ध है. इससे भी आगे बढाकर कोई माँ-बहनों तक पहुँच जाए तो उसे सोशल मीडिया के सार्वजनिक मंच पर रखने का अधिकार मुझे है कि नहीं.

जब उन्होंने फेसबुक की चौपाल पर अपने घृणित विचार अपनी शिक्षा, संस्कार और नैतिकता को तिलांजलि देकर रख ही दिए हैं तो फिर छुपाव कैसा इस लिए उदहारण लिख रहा हूँ.

मेरे कांग्रेसी मित्र अ@# %$गी जी लिखते हैं, “भक्तों, अपनी दादी पड़दादियों का पता बता दो. टीपू सुल्तान के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट करनी है. क्या पता, आप को मुआवज़ा मिल ही जाये”.

एक दूसरी महिला, जिन्हे मैं अच्छे लेखन और कभी-कभी कविता लिखने के लिए जनता था सुश्री म$# @$नी जी, एक कमेंट में लिखती हैं, “राहुल गाँधी के विवाह की चिंता वो करे जिसे उस से अपनी बेटी ब्याहनी हो”.

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप लगाना सामान्य बात है और राजनीतिज्ञों के समर्थक-विरोधी होना भी. अमेरिका जैसे अति आधुनिक देश में भी बिल क्लिंटन को अपने अवैध संबंधों के कारण कटघरे में खड़ा होना पड़ा था. किन्तु आप उनसे इतने भी न जुड़ जाएँ कि आपसी मर्यादा ही खो बैठें और गाली गलौज करने लगें. मैं ऐसे मित्रों को स्थायी प्रणाम करता हूँ.

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