संघ के प्रबुद्ध सदस्य -2 : पद्मश्री विष्णु श्रीधर वाकणकर

मेज पर पड़े शोध पत्र के पुलिंदे और तस्वीरों के संग्रह के गिर्द कुछ लोग बैठे थे और कुछ गम्भीर वार्ता चल रही थी. एक व्यक्ति ने (जो सबमें वरिष्ठ और सम्मानित लग रहे थे) बोलना प्रारंभ किया- “विष्णु जी, आपका यह शोध अब तक भारत में हो रहे ऐतिहासिक शोधों के लिए एक मील का पत्थर सिद्ध होगा. जिसे हम सब लगभग 2500 वर्ष पुरानी मौर्य व बौद्धकालीन गुफाएं मानकर बैठे थे, उनके चालीस हजार वर्ष पुराने होने के अद्भुत प्रमाण आपने प्रस्तुत किए हैं.

फ्रांस और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में आपके व्याख्यानों के प्रति वहां विद्वानों के उत्साह से हम सबको आनंद का अनुभव है. मौलिक शोध किस प्रकार से हो सकता है यह आपने सिखाया है अन्यथा अब तक के शोधार्थी वन में घुसकर गुफाओं की खाक छानने की बजाय वहां के वनवासियों की कही सुनी बातों पर निबंध लिखकर अपना शोध प्रकाशित कर लेते थे.”

सम्बोधित किए गए व्यक्ति ने कहा- “इस खोज के पीछे कहीं न कहीं ईश्वरीय प्रेरणा है अन्यथा मैं तो भोपाल से रेल में बैठकर इटारसी जाने वाला था. वन के भूभाग में जैसे ही इन गुफाओं पर दृष्टि गई तो मुझे अनुभव हुआ कि ये वैसी ही प्रागैतिहासिक गुफाएं हैं जो मैंने स्पेन और उत्तर अमेरिकी यात्राओं में देखी हैं. बस वहीं अगले छोटे से स्टेशन पर उतर पड़ा और उस दिन से ही खोज प्रारंभ हो गई. यह श्रेय केवल मेरा ही नहीं, मुझे सहयोग करने वाले अनेक विशेषज्ञ लोगों और मित्रों के बिना कुछ भी सम्भव नहीं था.”

वहीं उपस्थित तीसरे व्यक्ति ने कहा- कितनी रोचक बात है कि जब कुछ पश्चिमी विद्वान यह अफवाह फैलाने में सफल हुए हैं कि आठ से दस हजार वर्ष पूर्व आर्यों ने बाहर से आकर भारत में सभ्यता का निर्माण किया जबकि आपके शोध ने चालीस हजार वर्ष पूर्व की नटराज के चित्रों से सजी गुफाओं वाली विकसित सभ्यता के अस्तित्व को मध्य भारत में प्रमाणित किया है.

वरिष्ठ महानुभाव पुनः बोले- विष्णु जी, अन्यथा न लें तो एक जरुरी सलाह दूंगा आपको, आप भारतीय इतिहासकारों के समाज में अपनी पैठ बनाना चाहते हैं तो अपने शोघ में एक वाक्य को संशोधित करिए. आपने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति जो कृतज्ञता ज्ञापित किया है उसे हटा दीजिए क्योंकि विद्वानों से लेकर सरकारी तंत्र में भी कोई संघ से जुड़े लोगों को स्वीकार नहीं करना चाहता. आप इतने बड़े विद्वान हैं कि आपसे इतिहास को बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है तो आप किसी भी विवाद से स्वयं को मत जोड़िए.

विष्णु जी ने उत्तर दिया- इस शोध को मान्यता मिले या न मिले, मैं संघ से अपने सम्बन्ध को नहीं छुपाऊँगा. संघ ने जो दिया है उसी के कारण आज विश्व भर में भीमबेटका के गुफाओं की चर्चा हो रही है. यह शोध अनुदान और पुरस्कार पाने के लिए नहीं है, यह भारत के गौरवशाली अतीत की से उसकी पीढ़ियों को परिचित करने के लिए है. जब मुझे मेरे आत्मस्वरूप से वास्तविक परिचय भी संघ ने कराया तो मैं संघ से स्वयं को एक क्षण के लिए भी अलग नहीं करूँगा. यह सब राष्ट्र का है, मेरा कुछ भी नही. इदं राष्ट्राय, इदं न मम.

ये थे पद्मश्री विष्णु श्रीधर वाकणकर, उज्जैन के इस सरल व्यक्ति ने विश्वभर में अपने कार्य को स्थापित किया. भीमबेटका की गुफाओं की प्रागैतिहासिकता की खोज से बढ़कर भी इनका विराट कार्य था सरस्वती नदी के सम्पूर्ण मार्ग का वास्तविक निर्धारण. अपने स्वभाव के अनुरूप इन्होंने पूरे मार्ग की पैदल यात्रा की. लगभग दो वर्षों की यात्रा में इनके साथ भिन्न भिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ जुड़ते रहे. भूमिगत जल के विद्वानों से लेकर मिट्टी और भूगर्भीय विद्वानों तथा इसरो के सैटेलाइट चित्रण के वैज्ञानिकों तक ने इनके साथ काम किया. यह स्वयं में इतना विराट विषय है कि इस पर अगले लेख में चर्चा होगी.

संघ ने ऐसे ऐसे अद्भुत लोग दिए हैं देश को जो चुपचाप अपने लक्ष्य की ओर ध्यान लगाकर बढ़ते हैं. प्रसिद्धि से बचते हुए कार्य में लगे रहना यह संघ का व्यवहार है. श्री विष्णु जी वाकणकर के स्थापित संस्थान अनेक शोध में संलग्न हैं. आज के अंग्रेजी पढ़े लोग पूछते हैं कि संघ इनका प्रचार क्यों नहीं करता? मेरा उत्तर है कि संघ को काम करने दीजिए, आप भी कुछ काम करिए. यदि काम करने के योग्य नहीं हैं तो आइए मेरे साथ, हम इनका प्रचार करते हैं. मैं भी आपकी तरह निठल्ला हूँ.

अगला लेख सरस्वती नदी पर.

– विष्णु कुमार

संघ के प्रबुद्ध सदस्य -1 : प्रो. शिवाजी सिंह

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