गुजरात को पसंद है विकास का यह पागलपन

रैली के मंच पर खड़े होकर राहुल गांधी जब लोगों से पूछते हैं कि – “बताइए विकास को क्या हो गया है?” तो लोगों की प्रतिक्रिया सुनकर राहुल फुले नहीं समाते हैं. सामने की पंक्ति से आवाज आती है – “विकास गांडो थाई छो”… अर्थात, विकास पागल हो गया है. लेकिन पीछे की पंक्तियों से जो आवाज़ आती है उसे राहुल सुन नहीं पाते हैं.

लोगों के जवाब से मैं भी सहमत हूँ… यानी जिस प्रकार विकास के पागलपन से गुजरात के लोग वाकिफ हैं, कमोबेश मैं भी वाकिफ हूँ.

पहले तो ये समझ लें कि पागलपन एक ऐसी स्थिति है जिसमें कोई भी व्यक्ति जुनून की हद तक जाकर कुछ ऐसा करने लगता है, करने को प्रेरित होता है या… ऐसा कुछ कर जाता है जिसकी चर्चा आम हो जाती है, लोगों की जुबान पर आ जाती है.

और यदि यही जुनून लोक हित में हो तो उस पागल का ‘पागलपन’ भी लोगों को तहे दिल से स्वीकार्य होने लगता है, लोग उस पागल को भी अपना तारणहार मानकर अपने हृदय में बसा लेते हैं. लोगों की इसी भावना को राहुल सरीखे अविकसित नेता समझ नहीं पाते हैं.

साल के दिन और दिन के घंटे सभी के लिए बराबर होते हैं, लेकिन करोड़ों में कोई एक जुनूनी व्यक्ति इसी दौरान कुछ ऐसा कर जाता है, जिसे लोग महान कहने लगते हैं.

आइंस्टीन के पागलपन ने theory of relativity की खोज कर डाली तो थॉमस एडिसन के पागलपन ने एक हजार से ज्यादा आविष्कार करके दुनिया को तोहफा दिया. दशरथ माँझी पागल हुए तो एक हथौड़े और छेनी लेकर पहाड़ काट कर सड़क निकाल दी.

पागलपन की लिस्ट तो बहुत लंबी है लेकिन अब गुजरात में विकास के पागलपन पर आते हैं.

मोदी जब गुजरात में सत्ता में आए तो एक उजड़ा हुआ गुजरात मिला था. एक विनाशकारी भूकंप ने, जिसकी तीव्रता 8.0 थी, राज्य को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. बीस हजार लोग मारे गए थे, सात सौ गाँव तबाह हो गए थे… अर्थव्यवस्था अचानक ही पटरी से उतर गई.

इस हादसे से उबर कर गुजरात कब पटरी पर आ गया, देश के लोगों को पता भी नहीं चला था. इस उपलब्धि के पीछे भी एक जुनूनी का पागलपन ही था कि चंद वर्षों में गुजरात बिना किसी सहायता के अपने पैरों पर खड़ा हो गया था.

गुजरात के वोटर इस जुनूनी पागल को जानते हैं… उसके विकास के पागलपन को पहचानते हैं.

आज देश में सड़क, बिजली और पानी के मुद्दे हर चुनाव में छाए रहते हैं… लेकिन 2002 से पहले यही गुजरात बिजली की कमी और खस्ताहाल सड़कों की परेशानी से जूझ रहा था… आज वहाँ हर गाँव में 24 घंटे बिजली और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सड़कें मौजूद हैं.

2012 में जब नेशनल ग्रिड फेल हुआ था, 19 राज्यों में दो दिनों तक अँधेरा था. बिजली संकट से सारी व्यवस्थाएँ चरमराने लगी थी उस वक्त भी गुजरात बिजली की रोशनी से जगमगा रहा था. 100% गाँवों में बिजली देने वाले गुजरात को देश का पहला राज्य बनाने वाले उस पागल जुनूनी को गुजरात की जनता जानती है… विकास के पागलपन को पहचानती है.

राज्य का 70% हिस्सा सूखाग्रस्त, नदी के नाम पर साबरमती लेकिन वह भी 1990 में सूख चुकी थी. मध्यप्रदेश से नर्मदा के पानी को गुजरात लेकर आना ये पागलपन ही तो था. गुजराती जानते हैं.. उनका राज्य बारिश के मामले में चेरापूँजी नहीं है लेकिन कृषि विकास दर में वृद्धि 11.2% (2001-2011) रही जबकि शेष भारत की दर मात्र 4% थी. यहाँ भी गुजरातियों को विकास का पागलपन साफ दिखाई दे जाता है.

एशिया का सबसे बड़ा अस्पताल अहमदाबाद में है… सिर्फ दक्षिण गुजरात में ही इतनी इंडस्ट्रीज़ है कि दर्जन भर पिछड़े राज्यों में उतनी नहीं होंगी…

टूरिज्म के क्षेत्र में गुजरात कभी फिसड्डी हुआ करता था.. यहाँ ना ही ताजमहल और ना ही बर्फ के पहाड़ और ना ही झरने… ले देकर गिर के शेर और कच्छ का रण लेकिन गुजराती गधे की करामात देखें कि एक तरफ जहाँ देश के टूरिज्म में ग्रोथ 2% है तो गुजरात में डबल है यानी कि 4% है…

विकास के पागलपन की ही तो ये उपलब्धि है.

विकास का पागलपन देखें कि वाइब्रेंट गुजरात के कान्सेप्ट ने औद्योगिक विकास का वो नज़ारा पेश किया कि आज समूचे भारत से करोड़ों लोग आकर यहाँ नौकरी कर रहे हैं.

महिला सुरक्षा की बात हो या गरीब बच्चों की शिक्षा का, तो इसी पागल विकास ने गुजरात को अन्य राज्यों की तुलना में शीर्ष पर रखा है.

विगत डेढ़ दशकों में जहाँ देश भ्रष्टाचार से त्रस्त रहा था… गबन, घोटाले और लूट का साम्राज्य था, वहीं गुजरात अपनी कानून व्यवस्था एवं स्वच्छ प्रशासन के दम पर प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहा था.

विकास यहाँ भी पागल हो गया था क्योंकि उसने यूटीआई घोटाला, तेलगी स्टाम्प पेपर, आदर्श, टू जी स्पेक्ट्रम, सत्यम, कामनवेल्थ, रक्षा डील, हेलिकॉप्टर घोटाले नहीं किए थे.

यही जुनूनी जब गुजरात से दिल्ली आया, और साढ़े तीन वर्षों के छोटे से कार्यकाल में पूरे देश में एक भी भ्रष्टाचार का मामला नहीं आया तो राहुल जी, आपने यहाँ भी विकास को कोसना शुरू कर दिया लेकिन बदकिस्मती आपकी, देश के लोग इस विकास के पागलपन को भी पसंद करने लगे जिसे पहले सिर्फ गुजराती लोग पसंद किया करते थे.

जहाँ तक मैं समझ रहा हूँ आपने विकास को पागल इसलिए कहा होगा क्योंकि कुछ लोगों का विकास ज़रूर रूक गया है जो अब तक देश की संपत्ति और संसाधनों पर ऐश करते आ रहे थे, उनकी राजनीति की दुकान बंद होने लगी है.

आपकी तड़प इस बात की ओर इशारा कर रही है कि आपकी पार्टी भी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुकी है… क्योंकि वह ‘पागल विकास’ आपके अपने लोगों का विकास नहीं कर रहा है.

पर राहुल जी अब वो दौर गया जब आपकी पार्टी देश की जनता को गुमराह करके वोट बटोरने का काम किया करती थी. आपके झाँसे में ना ही देश के लोग आएँगे और ना ही गुजरात के.

फिलहाल तो गुजरात के लोगों को विकास का यह पागलपन पसंद आ चुका है.

गाँधीजी तो पता नहीं कहाँ से तीन बंदर पकड़ कर लाए थे जो कुछ भी बोलते, सुनते और देखते नहीं थे…. देश का बँटाधार कर गए वे बंदर.

अब आपने भी वही काम शुरू किया है, देखना है ये तीनों गुजराती बंदर आपकी राजनीति और आपकी पार्टी का बँटाधार कब तक करते हैं ?

रैलियों में मंच पर खड़े होकर जब आप लोगों से पूछते हैं… “विकास को क्या हो गया है?” तो पता है पिछली पंक्तियों में बैठे लोग क्या कहते हैं?

वे कहते हैं – “राहुल गांडो थाई छो”, इसका अर्थ ये है कि राहुल जी कि विकास नहीं बल्कि आप पागल हो गए हो.

गुजरात के लोग आपसे भलीभाँति वाक़िफ़ हैं, आप अपना और पार्टी दोनों का मज़ाक उड़वा रहें हैं… आप जिस दिन ये बातें समझ जाएँगे उस दिन आप भी नेता बन जाएँगे.

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