भविष्य की संभावनाओं के प्रतीकों को छांटने के लिए कश्मीर में वार्ताकार की नियुक्ति

बीती शाम को गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस की और देश को बताया कि केंद्र सरकार ने पूर्व इंटेलिजेंस ब्यूरो चीफ दिनेश्वर शर्मा को सरकार की तरफ से कश्मीर समस्या पर वहां की समस्या पर बात करने के लिये वार्ताकार नियुक्त किया है.

मैने जब पहली बार ट्विटर पर इस खबर को पढ़ा तो मुझे लगा कि यह क्या बकवास है? यही करना था तो अब तक क्या कर रहे थे? अब यह कर रहे हो तो 370 और 35-ए को लेकर क्यों बात हो रही है?

आज जब सारी खबर पढ़ ली और टीवी से लेकर सोशल मीडिया (यहां मोदी की खाल उतारी जायेगी) पर हुई और होने वाली प्रतिक्रिया अनुमान लगा लिया तब मैंने सोचने की शुरुआत की है.

यह क्या हो रहा है? क्या राजनाथ सिंह जिनकी ‘कड़ी निंदा’ के नाम पर राष्ट्रवादी खिल्ली उड़ाते हैं, वो वाकई इतने मूर्ख हैं जो शासन की तीन साल बीत जाने पर वही कर रहे है जो केंद्र में रही सरकारें पिछले 15 वर्ष से कर रही है?

दिनेश्वर शर्मा चौथे वार्ताकार है. इससे पहले यह भूमिका निभाने वाले, पूर्व केंद्रीय मंत्री के सी पंत, वी एन वोहरा जो आज कल जम्मू कश्मीर के राज्यपाल है और आखिरी में त्रि-सदस्यीय दल था जिसमे अंसारी एक नौकरशाह, राधा कुमार एक वामी बुद्धिजीवी और सेक्युलर पत्रकार दिलीप पडगांवकर थे.

मैं किसी भी हालत में यह बिल्कुल भी उम्मीद नहीं रखता हूं कि केंद्र सरकार इस कदम को उठा कर ‘कश्मीर समस्या का कोई हल निकाल पायेगी’. यह असंभव है. लेकिन यदि यह असंभव है तो फिर संभव क्या है?

संभावना यही है कि कुछ समय गुज़रेगा. अंतरराष्ट्रीय स्थिति को देखते हुये, खास तौर से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की इच्छा का संज्ञान लेते हुये, कूटनैतिक रूप से पाकिस्तान से चौतरफा बात करने की मजबूरी में है, क्योंकि भारत अफगानिस्तान मामले में अमेरिका के लिये सेना भेजने से इनकार कर चुका है. भारत अभी इस औकात में नही आया है कि वह इज़राइल की तर्ज़ पर फिलिस्तीन की तरह कश्मीर का फैसला कर ले.

मुझे व्यक्तिगत तौर पर पूरा भरोसा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का यह प्रयोग, जो गृह मंत्री राजनाथ सिंह के कंधे पर किया जा रहा है, वह पूर्णतः असफल होगा. मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह असफलता पूर्व निर्धारित है.

अब जब मैं इसको असफल होने की भविष्यवाणी कर रहा हूं तो मेरे पास इसके कुछ कारण भी है. मुझे इसका मुख्य कारण यह लगता है कि जिन दिनेश्वर शर्मा को केंद्र सरकार की तरफ से वार्ता के लिये नियुक्त किया गया है वह राजनैतिक या कूटनैतिक जगत के व्यक्ति नही है.

मेरा मानना है कि इन की नियुक्ति किसी राजनैतिक समाधान निकालने से ज्यादा अलगाववादी व अराजक तत्वों में से कमजोर कड़ी को छांटने के लिए है. मैं नहीं समझता हूँ कि यह बातचीत किसी मानवतावाद की छत्रछाया में होने वाली है क्योंकि दिनेश्वर शर्मा की प्राथमिकता में भारत की सामरिक चिंताये व अभिलाषायें पहले है.

यदि शर्मा जी का पूर्व इतिहास देखा जाय तो पता चलता है कि वे आईबी के सिर्फ पूर्व प्रमुख ही नहीं थे बल्कि वह जब जॉइंट डायरेक्टर आईबी थे तब वह इस्लामिक आतंकवाद की डेस्क को देखते थे. दिनेश्वर जी न सिर्फ 1976 बैच के केरल कैडर के आईपीएस है बल्कि जब नेशनल सिक्युरिटी एडवाइज़र अजित डोभाल, आईबी के प्रमुख थे, जो स्वयं केरल कैडर के आईपीएस अधिकारी थे, तब दिनेश्वर शर्मा ने ब्यूरो में उनके साथ काम किया हुआ है.

वार्ताकार की पृष्ठभूमि व कश्मीर की घाटी के लोगों की मानसिकता को देखते हुये यह सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इसके परिणाम राजनैतिक न हो कर भविष्य की संभावनाओं के प्रतीकों को छांटना ज्यादा है.

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