नारीवादी हैं तो भारतीयता से दूर होंगी ही : ज़रा नाक पर सिंदूर लगाने का रहस्य भी जान लीजिए

आदरणीया Maitreyi Pushpa जी,

…सर्वप्रथम बधाई. सुना था आप लेखिका हैं, वो भी नारीवादी. आपकी एकाध किताब भी पढ़ीं हैं, लेकिन ये अद्भुत भाषा जो आपने रची है, यह अनुपम है. तिरस्कार से भरी इस भाषा के लिए बधाई. और हां, सिंदूर लगाया जाता है, पहना तक जा सकता है…. पर पोतना! यह खोज भी आप ही ला सकती थीं.

….आप तथाकथित नारीवादी हैं, तो भारतीयता से दूर होंगी ही, सांस्कृतिक अनपढ़ होंगी ही, ऐसा मैं मान लेता हूँ. तो, ज़रा नाक पर सिंदूर लगाने का रहस्य भी जान लीजिए. वैसा सिंदूर शक्ति का, स्त्रीत्व का प्रतीक है, सामर्थ्य और ऊर्जा का पोषक है.

कथा रामायण की है. जब लंका-विजय के बाद राम अयोध्या लौटे तो रावण के भाई (जी हां, भाई) महारावण ने उन्हें युद्ध की चुनौती दी. उसको यह भी वरदान था कि उसका वध एक स्त्री के हाथों ही होगा. यह भी आप जैसी छद्म-नारीवादियों को शायद पता नहीं हो कि नारीवाद की शिक्षा के बहुत पहले भारत उसे जीता था-सनातन धर्म में.

चंद रोज पहले नरक-चतुर्दशी भी बीती है. आपको पता है, नरकासुर-वध में सत्यभामा ने रथ-संचालन किया था, दशरथ के साथ युद्ध में कैकेयी सारथ्य करती थीं. खैर, तो महारावण के वध के लिए राम ने अपनी शक्ति का आह्वान किया. शक्ति काली के रूप में प्रकट हुईं. अतिशय क्रोध की वजह से उनका मुखड़ा लाल था, सिंदूर बिखरकर नाक तक आ गया था. उनको ही प्रतीक मान महिलाएं नासिका तक सिंदूर करती हैं, जब उनको परम-शक्ति का आह्वान करना होता है. समझी महाशया!

…..वैसे, यूरोप से उधार का खाकर अपच होगा ही. यह मसला केवल छठ का है भी नहीं, कई मांगलिक कार्यों में महिलाएं इस तरह सिंदूर लगाती हैं. आपकी सिमोन और वर्जीनिया के हज़ारों साल पहले लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी (!), घोष, अपाला आदि की भूमि है यह देश. अपनी भाषा, इतिहास-बोध और नारीवाद पर आप फिर से काम करें.

इसी आकांक्षा के साथ,
आपका एक पूर्व पाठक…

व्यालोक पाठक

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