ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा जान भी लो ये कहानी

1962 में हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान चकनाचूर हो गया था. उस सतत स्मृति के आज 55 साल हो रहे हैं. बीस अक्तूबर को चीन ने धावा बोला और हमें लहूलुहान करने के बाद 20 नवंबर को अपनी मर्जी से, अपनी शर्तों पर युद्ध खत्म किया. इससे जुड़ी लगभग सारी चीजें अब भी गोपनीय फाइलों में हैं.

ब्रूक्स हेंडरसन कमेटी की रिपोर्ट के कुछ हिस्से सार्वजनिक किए गए पर उतना ही जिससे दशकों की कड़ी मेहनत से गढ़े गए हमारे महान नेता की छवि दागदार न होने पाए. लेकिन इसकी पुनरावृत्ति से बचना है तो किसी की शेरवानी पर छींटे लगने की परवाह नहीं करनी होगी. बहुत से राज़ फाश हो चुके हैं बस हम और आप जानते नहीं.

युद्ध में लड़ती फौज है और नेतृत्व नागरिक सरकार करती है. और नेतृत्व अगर अपनी सेना से ही घृणा करने लगे तो देश माओ की कृपा पर ही रहेगा. माओ चाहें तो कब्ज़ा की हुई ज़मीनें छोड़ दें या कलकत्ते तक आ पहुंचें. विजयी सेना को दोष देने का कोई औचित्य नहीं. हमें तो यह देखना होगा कि हमारी सरकार ने तैयारियां कैसी की और सेना को किस तरह से लैस किया, उसका मनोबल बढ़ाया. पर इसकी तफ्तीश करेंगे तो शायद क्रोध, घृणा के ज्वार मन में उठें. समस्या आपकी है, पत्रकार का काम बस तटस्थ भाव से बताने का है.

अपने शांतिकामी प्रधानमंत्री सकल विश्व के चाचा बनना चाहते थे. इतिहास में अमरत्व और यश-कीर्ति प्राप्त की उनकी जो उत्कट आकांक्षा थी, वह विरल है. वे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता थे, एशिया के नेता थे, वैश्विक नेता थे, भारत का प्रधानमंत्री होना बस एक संयोग था या अपने कद को दुनिया में बढ़ाने का साधन, यहां आपकी राय मानी जाएगी. उनके चीनी समकक्ष चाऊ एन लाई ने कहीं कहा था कि दुनिया के जितने भी नेताओं से वे मिले हैं, उनमें नेहरू का अहंकारोन्माद (Megalomania) सबसे ज्यादा था.

शायद इसीलिए चच्चा को अपनी सेना से विकट घृणा थी, वे तो शांतिकामी ताकतों के वैश्विक अगुआ बनना चाहते थे. आज़ादी के तुरंत बाद भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ जनरल राबर्ट लाकहार्ट ने जब पप्पू चच्चा से कहा कि हमें एक रक्षा योजना की ज़रूरत है तो उन्होंने सेनाध्यक्ष को डपट दिया. कहा, ‘हमें किसी रक्षा योजना की जरूरत नहीं है. हमारी नीति अहिंसा की है. आप चाहें सेना को भंग कर सकते हैं. हमारी सुरक्षा ज़रूरतों के लिए पुलिस काफी है’.

सेना को भंग करने की बहुत जल्दी थी चच्चा को. आजादी के ठीक एक महीने बाद 16 सितंबर को प्रधानमंत्री ने फरमान सुनाया कि सैनिकों की संख्या 2 लाख 80 हज़ार से घटाकर डेढ़ लाख की जाए. 1950-51 में जब चीन तिब्बत पर कब्ज़ा कर चुका था और तनाव बढ़ रहा था तब भी नेहरू ने सेना को भंग करने का सपना देखना नहीं छोड़ा. उस साल 50,000 सैनिकों को घर भेजा गया कि वीर सैनिक, अब ज़रूरत नहीं रही तुम्हारी. 47 में दिल्ली के नार्थ ब्लाक में सेना का एक छोटा सा दफ्तर होता था जहां गिनती के सैनिक थे. एक दिन चच्चा की नजर उन पर पड़ गई और उन्हें तत्क्षण गुस्सा आ गया- ये यहां क्या रहे हैं? फौरन हटाओ इन्हें यहां से. यूं दुत्कारे गए.

‘लोकतंत्र के लिए चुनौती’ यानी सेना अंदर से ही खोखली हो जाए इसलिए स्वतंत्रता के तुरंत बाद उन्होंने राष्ट्र और धर्मनिरपेक्षता के हित में बहुत बड़ा कदम उठाते हुए इसे थलसेना, वायुसेना और नौसेना में बांट दिया. तब से आज तक हम यूनीफाइड कमांड/थियेटर कमांड और सीडीएस (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) बनाने को जूझ रहे हैं.

प्रधानमंत्री जी को शायद गंभीरता से लगता था कि भारतीय सेना को लड़ने नहीं आता. तभी तो 1948 के युद्ध में सैन्य कमांडरों को बताने लगे कि कैसे लड़ें. परिणाम यह कि एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान के हाथ चला गया. फील्डमार्शल केसी करियप्पा ने 1948 के युद्ध में उत्कृष्ट नेतृत्व करते हुए मोर्चे से सेना की अगुआई की. चच्चा कैसे खुश होते? उन्होंने जनरल करियप्पा को हटाने की ठान ली और उनकी जगह जनरल राजेंद्र सिंह जी जडेजा को फील्डमार्शल बनाने की कोशिश की. जनरल जडेजा मना नहीं करते तो ये भी हो जाता.

भारतीय सेना के निरंतर अपमान और मनोबल तोड़ने की परंपरा को आगे बढ़ाने में विलक्षण प्रतिभा के धनी कृष्ण मेनन ने पूरी ऊर्जा झोंक दी. मेनन ने सेना के पूरे चेन ऑफ कमांड को ध्वस्त कर दिया. कायदे से रक्षा मंत्री सिर्फ सेना प्रमुख से बात करता है लेकिन मेनन के क्या कहने. वे तो फोन उठा कर मेजर से भी बात कर लेते थे. सेनाप्रमुख की उनके लिए कोई विशेष हैसियत नहीं थी.

के.सी. करियप्पा के बाद नेहरू-मेनन जोड़ी के निशाने पर जनरल कोडांडेरा सुबैय्या थिमैया यानी जनरल केएस थिमैया आए. 1959 में सेना प्रमुख बने जनरल थिमैया का कद इतना बड़ा था कि नेहरू-मेनन को खतरा लगने लगा. दिखावे के लिए चच्चा सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा का कोई मौका नहीं चूकते थे. गर्वीले सैनिक जनरल थिमैया सेना से नेहरू-मेनन की चिढ़ से अंजान नहीं थे पर घुटने टेकने वालों मे से नहीं थे. 28 अगस्त, 1959 को उनकी नेहरू से तल्ख बहस हो गई.

उसी रात पीने के बाद टल्ली हुए रक्षा मंत्री मेनन ने जनरल साहब को धमकाया कि सीधे प्रधानमंत्री से कैसे बात कर लिए. नतीजा बुरा होगा. जनरल थिमैया ने अगले दिन इस्तीफा दे दिया. नेहरू ने उन्हें बुलाया और इस्तीफा नहीं देने के लिए मनाया. पर जैसे ही जनरल पीएमओ से निकले, चच्चा ने खबर लीक कर दी. दो सितंबर को नेहरू ने इस्तीफे के बाबत संसद में बयान दिया और ठीकरा थिमैया पर फोड़ दिया.

सेना प्रमुख को ठिकाने लगाने का यह उतावलापन तब, जब अगस्त में ही चीनियों ने एक भारतीय को बंदी बना लिया था और एकाध जगह झड़पें भी हो चुकी थीं. इस्तीफा प्रकरण के ठीक दो महीने बाद चीनियों ने अक्साईचिन में भारतीय फ्रंटियर पुलिस के आठ सिपाहियों की घात लगाकर हत्या कर दी.

जिस सेना को दफन करने का सपना चच्चा ने पाल रखा था, ज़रूरत पड़ने पर उसी सेना के भरोसे वे फॉरवर्ड पॉलिसी अपनाने का भी मंसूबा रखे थे. 1961 में चच्चा के परमप्रिय जनरल बीएम कौल आर्मी चीफ ऑफ जनरल स्टाफ बने. उनका मानना था कि चीनी बिना लड़े ही भाग जाएंगे.

पहले लद्दाख सेक्टर की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही वेस्टर्न कमांड ने फॉरवर्ड पॉलिसी के खिलाफ आगाह किया, फिर सेनाप्रमुख जनरल पीएन थापर ने. लेकिन चच्चा को लगता था कि सेना को उन्होंने कानी उंगली का बल दे दिया है. पर चच्चा न जामवंत थे और न ही जनरल कौल हनुमान. चीनियों ने रौंद दिया. लगा कि पूरा आसाम चला जाएगा और चच्चा ने रेडियो पर कहा- मेरा दिल आसाम के लिए रो रहा है.

चच्चा, आपने जो किया वो भुगता. अब भी समाजवाद और धर्मनिरेपक्षता की मुगली घुट्टी पी रहे सुधीजनों को यह ईशनिंदा लग सकता है. पर कर्मन की गति न्यारी!

पराजय से पूरा देश टूट चुका था. चच्चा का यशोगान मद्धिम पड़ गया था. कवि प्रदीप ने अंधेरे में एक दिया जलाया और अमर गीत लिखा, ‘ऐ मेरे वतन के लोगों.’ दो महीने बाद 1963 में गणतंत्र दिवस के अगले दिन जब लता जी ने यह गाना गाया तो नेहरू बिलख पड़े थे. हम कभी नहीं भूलेंगे ये बलिदान.

पर ये जो कहानी आपने पढ़ी, उसे याद रखना और दूसरों तक पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. वो यह कि राजा अगर आत्ममुग्ध हो जाए तो राज्य रसातल में जाएगा. ऐ मेरे वतन के लोगों, 1962 का यही एकमात्र सबक है. जयहिंद की सेना…

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