गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ : श्रद्धांजलि गिरिजा देवी

सोचती हूँ कि देवी सरस्वती ने स्वयं काया धारण कर सृष्टि में अवतरित होने की ठानी होगी, तभी सरस्वती बाबा विश्वनाथ की “गिरिजा” बन काशी में अवतरित हुई होंगी.

विन्ध्याचल मंदिर में पहली बार दर्शन हुए थे. विंध्यवासिनी मां के रूप तेज जैसा ही रूप और तेज था हमारी अप्पा के व्यक्तित्व में! देवी की नाक में झूलती बड़ी नथ और अप्पा की की हीरे की लौंग में एक सा सम्मोहन था.
पूरे बचपन, यौवन, उन्हें देखती सुनती रही, दूर से प्रणाम करती रही. एकलव्य की तरह!

ऐसा भी एक दिन चमत्कार हुआ जब स्वयं अप्पा ने मुझे सिखाने की पेशकश की. भातखंडे अंतिम वर्ष में मेरा नटबिहाग सुन अप्पा ने इच्छा प्रकट की, लेकिन तब यह सम्भव न हो सका. मैं विधि का विधान मान मौन रह गई. विवाह हुआ, जीवन अलग रंग में रंग गया.

पति ने विवाह बाद पहला उपहार दिया, अप्पा जी की ठुमरी और चैती का ‘कैसेट’!

नाहक लाये गवनवा…. मन में हर प्रहर अप्पा की भैरवी के सुर ही गूँजते.
और फिर, माँ विंध्यवासिनी को कृपा से नवरात्रि में बनारस पहुँची और स्वयं को अप्पा जी को समर्पित कर दिया. अठारह वर्षों से बना यह गुरु शिष्य का संबंध शब्दों में क्या साझा करूँ, कैसे कैसे अनुभव, कैसी नसीहतें, क्या स्मृतियाँ हैं!
बनारस में उनसे गण्डा बंधाया तो उन्हें गुरु मानकर परंतु ये गुरु कब मां में बदल गई, मैं जान ही न सकी.

जाना तो केवल इतना कि उनकी गोद मे सिर रखकर निश्चिन्त हुआ जा सकता है, उनका हाथ कांधे पर हो तो साहस अनुभव किया जा सकता है और संगीत के सुरों के साथ साड़ियों के रंगों पर भी घण्टों बात की जा सकती है. अप्पा ने अनजाने में सिखाया, कि आत्मबल हो तो नई इबारत लिखी जा सकती है! ठुमरी और दादरा की बंदिशों में व्यक्त भावों पर खुल कर चर्चा करती और ऐसे भी पल आएं हैं जब प्रेम भाव पर उनसे विस्तृत चर्चा हुई. प्रेम को लेकर अप्पा की मौलिक और स्वतंत्र सोच थी. वही सोच उनके भावों में दिखती थीं.

अप्पा की संगीत साधना पर भला मैं क्या लिखूँ. वो अपने मे संस्थान थीं. गहन और विराट. नए बच्चों के लिए सीखने की बात है कि इतनी ऊंचाइयां पा लेने के बाद वो अब भी घण्टों रियाज़ करती थीं. संगीत उनके लिये साधना थी, उनकी तपस्या थी.

अप्पा को जीवन की कठिनाइयों ने पुष्ट किया था. उनके संघर्षों ने उन्हें दृढ़ता दी थी. जीवन ने उन्हें सिखाया था और अपने ये गुण उन्होंने हम सबको खुल कर बांटे. वो सिखाने बैठतीं तो जहां सुर बिगड़ने पर कस कर डांट लगा देतीं वहीं जब दुलराने पर आतीं तो कसर न छोड़तीं. अप्पा को जानने वाले जानते हैं कि उन्हें खाना बनाने और खिलाने का बड़ा शौक था. वो इतना स्वादिष्ट चूड़ा मटर बनातीं थीं और इतना रच रच कर खिलातीं कि पेट भर जाए पर मन न भरे.
एक निजी अनुभव साँझा करना चाहूंगी, आज से दस वर्ष पूर्व अप्पा जी की बाई पास हार्ट सर्जरी हुई. सर्जरी में आठ दिन बाद ही उनसे मिलने की अनुमति हुई तो मैं कलकत्ता एक सप्ताह के लिए उनके पास गई.

मैं उनके कष्ट का अनुमान लगाए हुए घबराये हुए उनके घर पहुँची, अप्पा जी बिस्तर पर थीं. सामान्य शिष्टाचार, कुशल क्षेम आपरेशन की जानकारी के बाद, वे चिंतित हो उठीं मेरे भोजन की व्यवस्था को लेकर! मैं लज्जित हो गई, अप्पा इतनी अस्वस्थ और उसमें भी मेरे लिए व्यग्र! मुन्नी दीदी और सबने भोजन लगाया, सभी लोग थे, खाने को तैयारी हुई. अप्पा जी ने हाँथ पकड़ कर कहा, चलो हाँथ मुँह धो कर कुछ खा लो पहले!

भोजन अभी शुरू ही किया कि तभी देखा कि बिस्तर से उठ अप्पा आकर खड़ी हो गई और बोलीं “फ्रिज से लीची वाला संदेश निकालो मालिनी के लिए” हतप्रभ में खड़ी हो अप्पा को बिठाने लगी, तभी घर में मुन्नी दीदी और सबने बताया कि “तुम आ रही थीं इसलिये अप्पा ने खुद लीची छील उसकी गुठली निकालकर उसमे संदेश का छेना भर कर फ़्रिज में जमाया है” मैं निःशब्द अप्पा को देखने लगी, स्नेह का यह भाव सिर्फ एक शिष्या के लिए नहीं, एक माँ का अपनी बेटी के लिए ही हो सकता था! कितना प्यार था अप्पा के भीतर! और कितना आत्मबल!

बनारस में उनका घर हो या लखनऊ, मेरठ नोयडा, दिल्ली में मेरे यहाँ उनके चरण पड़े हों, उनके साथ बिताए अनगिन पल मेरी अनमोल निधि हैं. वही स्मृतियाँ है जो मुझे आगे दिशा दिखाएंगी.

संतान की आयु कितनी ही क्यों न हो जाये, मां तो माँ ही होती है. उसका होना भर ढाढस और आत्मबल देता है. आज यहां कोलकाता में उन्हें अंतिम विदा देते हुए मन मे उनके साथ बिताए समय की मानो फ़िल्म चल रही थी.
अप्पा कहीं नहीं गईं. वो यहीं हैं. मेरे पास हैं. मेरे हृदय में हैं. उनसे मेरा संवाद चलता रहेगा, कभी लोक और शास्त्र के समन्वय पर, कभी प्रेम के रूप पर, कभी स्त्री के मनोभावों पर! कोई राग, कोई सुर समझना होगा तो उन्ही से पूछ लूंगी.

बस, वो अब फोन पर उलाहना नहीं देंगीअब… “अरे मालिनी, पहले ये बताओ, तुम हो कहाँ ! हमारे बाबू ठीक है न! मेरा कान्हा और कुहू कैसे हैं”
शत शत नमन अप्पा जी

– पद्मश्री मालिनी अवस्थी

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