अगर आपको 6,500 में होने वाला काम 450 में कराना हो तो यह लेख ज़रूर पढ़ें

LG का एलसीडी टीवी है अपने पास. पिछले करीब दस दिनों से ख़राब पड़ा था. मुझे तो खैर कोई फर्क नहीं पड़ा, आप देखेंगे भी क्या भला टीवी पर? ख़बरों के अपडेट के लिए फेसबुक है ही. लेकिन मां का गुजारा आस्था/संस्कार के बगैर मुश्किल है, साथ ही अना को पोगो और CN चाहिए ही. खैर.

टीवी में विजुअल आ रहे थे लेकिन आवाज़ गायब थी. अपनी इंजीनियरी करके थक जाने के बाद सर्विस के लिए अधिकृत कस्टमर केयर को फोन किया. पहली ही शर्त उनकी थी कि मैकेनिक विजिट करेगा उसका जीएसटी के साथ 300 रूपये आपको देने होंगे. अगर रिपेयर किया तो 650 रूपये प्लस जीएसटी और कल-पुर्जे की कीमत अलग से.

तीसरे दिन आये मैकेनिक साहब. आते ही बिना कुछ खोले सीधे बता दिया कि पीसीबी खराब है. उसे बदलवा लीजिये. अनुमानित कीमत उसका 6 हज़ार के आसपास बताया. साथ ही यह भी बता दिया कि इसके अलावा और कोई उपाय नहीं है. यह भी कि पीसीबी रिपेयर नहीं होता, न ही आप इसे सेकेण्ड हेंड खरीद सकते. यह इसलिए क्यूंकि कंपनियां हर साल दो साल पर मॉडल बदल देती है, ताकि आप नयी टीवी लेने पर मजबूर हों.

अब हर दो वर्ष पर नयी टीवी लेना बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर हमारी सरकारों तक के लिए कितना लाभदायक होता है, उसकी चर्चा फिर कभी. जितना ज्यादा उपभोग उतना ज्यादा भिकास का दावा. कैसे पेट्रौल की मांग बढ़ जाने को ‘विकास’ कह कर आप सरकारों को अपनी ही पीठ थपथपाते देखेंगे, वह कहानी भी आपकी पीसीबी जैसी चीज़ों से ही जुड़ी है. फिलहाल इन दानवाकार कम्पनियों से जूझने के जुगाड़ पर ही इस पोस्ट को सीमित रखना चाहूंगा.

तो कम्पनी के मैकेनिक को आकर केवल यह बताने के 300 रूपया चाहिए थे कि पीसीबी बदल दीजिये. लाख बहस के बावजूद वह अंततः गया भी लेकर. यह बता कर भी कि ऑर्डर दे दूं नए बोर्ड का जिसकी वारंटी कुल तीन महीने की होगी. उसी समय तय कर लिया था कि भले तीन सौ ठग कर ले गयी यह कोरियाई कम्पनी लेकिन अब इसे एक पैसा नहीं देना है. कोई जुगाड़ तलाशना ही है किसी भी कीमत पर.

अंततः एक परिचित शो रूम वाले मिले. उन्होंने अपना मैकेनिक मुफ्त में भेज दिया. टीवी सेट को खोल लेने के बाद वे भी इसी नतीजे पर पहुंचे कि पीसीबी खराब है लेकिन, एक अद्भुत जुगाड़ बता गए वे. यही जुगाड़ आप सबको बताना इस लम्बे पोस्ट का ध्येय है. मिस्त्री जी के अनुसार हम एक वूफर (यानि होम थियेटर वाला स्पीकर) खरीद कर उसे डिस्क वाले सेट टॉप बॉक्स में लगा दें, टीवी टनाटन बजने लगेगा. उनका आकलन था कि बाज़ार में न्यूनतम 1,500 तक का मिल जाएगा वह स्पीकर. और इसकी वारंटी कम से कम पीसीबी से तो ज्यादा ही होगी. जान में जान आई जान कर. उन्हें सधन्यवाद विदा किया.

आज दीवाली आदि मनाने के बाद बाज़ार में पड़ताल करने गया. वैसा एक स्पीकर मात्र 450 में मिल गया. आकर टीवी से कनेक्ट किया तो टन-टन गूंजने लगी आवाज़. न सियोल चंदा भेजना पड़ा और न ही दिल्ली को जीएसटी. लगा जैसे दक्षिण कोरिया पर विजय हासिल कर ली हो अपन ने, साथ ही ‘भिकास’ को भी मानो ठेंगा दिखा दिया हो. मन खुश हो गया.

कहने का आशय यह है कि भारत के पास न ही ब्रेन की कमी है और न ही जुगाड़ की. जब भी आप ऐसे किसी आक्रमण का शिकार होने लगें तो इसी तरह किसी ‘जुगाड़’ का जुगाड़ कर लें. प्लीज़ सर, प्लीज…!

कम से कम एक नागरिक के बतौर अनियंत्रित खर्च को भिकास मत मानें आप. अय्याशी भरा उपभोग मत करें पैसों का, हो सके तो उससे जिनके पास नहीं है, उनकी मदद कीजिये. सरकारें आपको बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के चंगुल से नहीं बचा सकती, वह विभिन्न समझौतों के कारण विवश है लेकिन, हम और आप तो मजबूर नहीं हैं न? खूब दिमाग लगाइए, खर्च के प्रति ज़रा संवेदनशील होइए और जीत जाइए दानवों के कुचक्र से.

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