पत्रकारिता का विलाप काल

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पत्रकारिता में हम भी हैं पर आउटसाइडर यानी बाहरी की तरह. मुकाबला 70 बनाम 30 का नहीं बल्कि सिर्फ 70 प्रतिशत के बीच होता था. 70 प्रतिशत वाले ये मान के चलते थे कि चूंकि पत्रकारिता में हैं तो प्रगतिशील या लेफ्ट होने की अनिवार्यता हैं इसलिए बाकी के 30 प्रतिशत संदिग्ध राष्ट्रवादी पत्रकार बांग्लादेशी घुसपैठिया हैं.

पद-प्रतिष्ठा की लड़ाई बस उनमें ही थी, घुसपैठिए तो दौड़ से हमेशा बाहर थे. इसी उन्माद में अचानक 14 मई, 2014 को प्रगतिशील पत्रकारिता बैंक दिवालिया हो गया.

हवा में तलवार भांजने वाले क्रांतिकारी प्रगतिशील पत्रकारिता बैंक की हालत लेहमन ब्रदर्स जैसी हो गई और और आधिकारिक रूप से खतरे की मुनादी हो गई.

उसी तारीख से प्रगतिशील पत्रकारों को नाना प्रकार के रोगों ने घेर रखा है. 2014 में डॉक्टर आया और बोला कि लोकतंत्र पर खतरा है इसलिए आपका बर्ताव थोड़ा असामान्य है. पर कुछ फर्क नहीं पड़ा.

बड़े डाक्टर बुलाए गए और 2015 में उन्होंने बताया कि चर्च पर हमलों और असहिष्णुता का प्रकोप है, एंटीबायोटिक देने पड़ेंगे. इससे दिल्ली और बिहार में थोड़ा राहत मिल गई. पर असम और हरियाणा के बाद तबियत फिर बिगड़ गई.

डाक्टरों ने कहा कि यह उग्र राष्ट्रवाद के वायरस का नतीजा है जो बहुत तेजी से फैल रहा है. बंगाल से थोड़ी राहत मिली ही थी कि उत्तर प्रदेश में फिर ध्रुवीकरण की महामारी फैल गई.

कांग्रेसी-वामपंथी विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षित मठाधीशों ने मरीज को दिलासा दिया कि कि जाट आरक्षण, नोटबंदी जैसे मुद्दों ने इन राष्ट्रवादी विषाणुओं की ऑक्सीजन बंद कर दी है. कुछ दिन में आप स्वस्थ हो जाएंगे. पर उनका निदान फिर विफल रहा.

ईवीएम से आखिरी नतीजा निकलते ही पता चला कि राष्ट्रवादी विषाणु चौतरफा फैल गए हैं और प्रगतिशील ताकतों की पद्मश्री, विदेशी दौरे और राजमहल तक निर्बाध पहुंच खतरे में हैं. तब से यह खेमा सदमे में हैं और बस हाय मोदी-हाय मोदी कर रहा है. पत्रकारिता का यह विलाप काल है.

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