पुरखों की हज़ारों साल की इज़्ज़त कायम रखना है या मिटाना है, तय करें गुजरात के पटेल

गुजरात के पटेल

कुछ साल पहले तक मेरे मन मे गुजरात के पटेल समुदाय के लिए बहुत इज़्ज़त थी. कारण था मेरी माँ गुजराती हैं, अहमदाबाद के साबरमती से आतीं हैं.

वे मुझे बचपन से ही सरदार वल्लभ भाई पटेल की कहानियां सुनाया करती थीं, हम मिशनरीज़ में पढ़े थे लिहाज़ा हमारी किताबों में सरदार पटेल ढूंढे से भी नहीं मिलते थे.

माँ जब भी पटेल साहब की बात करतीं उनका गर्व देखते ही बनता था, मानो उनके कोई घर के सदस्य रहे हों. लगभग हर गुजराती का यही हाल देखा मैंने.

समय बीता मुझे सरदार वल्लभ भाई पटेल को पढ़ने का और सोशल मीडिया पर जानने का मौका मिला, जी हाँ इसी फेसबुक पर. अरे बताया ना, हमारे स्कूल की किताबों में उनके नाम का एक भी चैप्टर नहीं था, हाँ अकबर, बाबर, खिलजी वगैरह थे, और गांधी तो कक्षा 2 से ले कर 10 तक हर साल कम से कम एक चैप्टर होता था.

ख़ैर मुद्दे पर वापस आते हैं, हाँ तो मैं कह रहा था कि गुजरातियों के लिए सरदार पटेल एक बड़े गौरव का विषय था और वे इसे दुनिया को बताते भी फिरते थे. सुनने वालों के मन में सिर्फ सरदार नहीं बल्कि सभी पटेलों के लिए सम्मान भाव आता था.

मेरे भी मन मे पटेलों के लिए विशेष सम्मान था, लेकिन पिछले साल जिस तरह पटेलों ने घटियापन दिखाया उस से वे मेरे दिल से उतर गए. इसमें कुछ शामिल थे या सारे इस से मुझे कोई सरोकार नहीं.

मैं तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि गुजरात के पटेल भी गुज्जरों की तरह एक गए-बीते नागरिक की तरह पेश आ रहे थे, सरकारी यानी पब्लिक प्रॉपर्टी जो कि मेरे और आपके टैक्स के पैसे की संपत्ति थी उसे आग लगा रहे थे.

एक दो कौड़ी का मवाली कह रहा था सरदार वल्लभ भाई पटेल हमारा बाप है, ऐसे में और बाकी के पटेल या तो चुप थे, या ताली बजा रहे थे. अब ऐसे में पटेलों की इज़्ज़त कहाँ से बचेगी?

जिस इज़्ज़त को पटेलों ने हजारों सालों में अपने खून से सींचा था वह अब तार-तार हो चुकी थी. पटेल मेरी नज़र में गिर चुके थे. लक्ज़री गाड़ियों में घूमने वाले पटेल मर्सडीज़ और ऑडी कार में से हाथ बाहर निकाल रहे थे और हाथ में आरक्षण की भीख का कटोरा था.

जिन पटेलों को स्वाभिमान के लिए दुनिया में जाना जाता था उन्हें एक ही रात में एक मवाली ने भिखारी बना दिया. पटेलों की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी. मेरी माँ की 35 साल से लगातार बनाई पटेलों की छवि अब टूट चुकी थी, और मेरे मन मे पटेलों के लिए कोई सम्मान बाकी नही बचा था.

अब वही मवाली चुनावों में मुसलमानों का साथ ले कर मोदी को सबक सिखाने की बात कर रहा है. वही मुसलमान जिन्हें सरदार वल्लभ भाई पटेल हिस्सा मिलने के बाद पाकिस्तान जाने देना चाहते थे.

मवाली लौंडे सुन… तेरा बाप सरदार पटेल तो कतई नहीं हो सकता, हाँ गांधी जैसा कोई तेरा बाप ज़रूर हो सकता है.

गुजरात के पटेल समुदाय को अब यह निर्णय करना है कि वे अपने पुरखों की हज़ारों साल की इज़्ज़त को कायम रखना चाहते हैं या मिट्टी में मिलाना चाहते हैं. आने वाले कुछ महीने पटेलों की इज़्ज़त के लिए निर्णायक होंगे.

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