राष्ट्र के नाम पर कट्टर नहीं थे हम, वरना हमारी भूमि पर यूं ही नहीं चले आते ये लुटेरे

सुना है कि चंडीगढ़ में राष्ट्रवाद पर चर्चा के लिए वामपंथी इकठ्ठा हो रहे हैं. कार्यक्रम में बिना गए हुए ही कोई भी बता सकता है कि ये तथाकथित बुद्धिजीवी वहाँ किस बात पर चर्चा करेंगे.

अलंकृत शब्दों में लपेट कर बताया जाएगा कि प्राचीन भारत में राष्ट्र नाम की कोई चीज़ नहीं थी. आज के भारत में राष्ट्रवाद फासिस्ट है. इससे समाज में असहिष्णुता बढ़ी है, इसने कट्टरता नफरत फैलाई है, आदि आदि तरह से राष्ट्रवाद को कोसते हुए असल में भाजपा और आरएसएस पर कटाक्ष करते हुए वर्तमान सरकार पर निशाना साधा जाएगा. हो गई इन की राष्ट्रवाद की चर्चा.

मगर ये यह नहीं बताते कि आज की दुनिया में कोई ऐसा राष्ट्र नहीं जहां उनके अपने राष्ट्रवाद पर ऐसी चीरफाड़ हो और कोई ऐसा राष्ट्र नहीं जहां के बुद्धिजीवी अपने ही राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े करने का अप्रयत्क्ष रूप से भी समर्थन करें. यह ना तो पूंजीवादी राष्ट्र के सरगना अमेरिका में संभव है, ना ही फिर वामपंथ के किले चीन और रूस में, इस्लामिक राष्ट्रों में तो यह वैसे भी असंभव है.

तो फिर सारी कुबुद्धि की प्रयोगशाला हिन्दुस्तान में ही क्यों बनाई जाती है? वो सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि हिन्दुस्तान का राष्ट्रवाद कमज़ोर हो अर्थात हिन्दुस्तान कमज़ोर हो. जबकि सच तो यह है कि सनातन संस्कृति तब से है जब से राष्ट्र की अवधारणा मानव सभ्यता के गर्भ में भी नहीं आयी थी.

वैसे सांस्कृतिक रूप से भारत एक राष्ट्र सदा से रहा है. अगर ऐसा नहीं होता तो हड़प्पा संस्कृति और दूर दूर तक फ़ैली सरस्वती सभ्यता में समानता नहीं होती. इनमें इतनी समानता हैं कि विभाजनकारी वामंथियों को भी इसे सिंधु-सरसवती सभ्यता कहना पड़ा.

जिस सभ्यता को सिर्फ हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो के कारण प्रारम्भ में सिंधु घाटी की सभ्यता कहा जाता रहा, उसे ही बाद में इन्ही वामपंथियों द्वारा सिंधु-सरस्वती सभ्यता क्यों कहना पड़ा? क्योंकि सिंधु नदी के तट से लेकर सरस्वती और अब तो पूर्व में गंगा के तट तक पर मिल रही सभ्यता में सांस्कृतिक रूप से एकरूपता है.

ये सब वैदिक काल से जुड़े हैं और यहां रहने वाले ही आर्य थे. हमारे पूर्वज. उस समय मानव समाज विकसित हो रहा था और राष्ट्र की कोई अवधारणा ने अभी जन्म नहीं लिया था. और अगर वामपंथी इतने ही ज्ञानी हैं तो वैदिक काल में दुनिया के कोई भी अन्य राष्ट्र का नाम बता दें. नहीं बता सकते. क्योंकि बाकी दुनिया हिम युग में सो रही थी.

और जहाँ तक रही बात भारत भूमि की, तो तब व्यवस्था के नाम पर यहां अनेक छोटे छोटे देश बनने लगे थे, जो कुछ कुछ दिशा के द्वारा परिभाषित होते थे. गांव के लोग अब तक कहते आये हैं वो पूरब देश का है वो दक्षिण देश का है आदि आदि.

वैसे भारत के राष्ट्रवाद पर सवाल खड़े करने वालों से एक सवाल, महाभारत काल में चक्रवर्ती सम्राट युद्धिष्ठिर क्या थे? एक चक्रवर्ती और उनके साम्राज्य को क्या कहा जाएगा? कालांतर में राष्ट्र की प्रबल भावना चाणक्य और चन्द्रगुप्त के दौर में आ चुकी थी जब सिकंदर दुनिया लूटने निकला था.

दुनिया में राष्ट्र की भावना तब जाग्रत हुई जब इन लुटेरों का आतंक बढ़ने लगा. वैसे उस काल में मगध, ईरान के माध्यम से पूरे अरब पर नियंत्रण रखता था. और उसके पहले जब राष्ट्र की ऐसी दीवारें नहीं थी तब आर्य व्यापार के लिए, आज के ग्रीस और जर्मनी तक पहुंच गए थे.

यह तो हुई भारत के राष्ट्र के इतिहास पर एक संक्षिप्त टिप्पणी. अब ज़रा दुनिया के किसी भी अन्य राष्ट्र का लेखा-जोखा भी खोल दिया जाये. अमेरिका की कहानी तो दो चार सौ साल से शुरू होती है और इंग्लैंड की कहानी हज़ार साल में हांफने लगी है. और चीन के एक छोटे से क्षेत्र ने तो बाहर की हवा पानी तक को बंद करने के लिए एक लम्बी दीवार खड़ी कर दी थी. बाद में तिब्बत और मंगोल के कुछ क्षेत्र भी हथिया लिए.

वैसे राष्ट्र की अवधारणा योरोप में कब आयी? यह जान कर हमारे वामपंथी दोस्त शायद हैरान होंगे कि अरब के साथ साथ योरोप में भी पूर्व में सब कबीले ही थे. और उनमें आपस में खूनी संघर्ष चलता रहता था.

यह सच है कि हम राष्ट्र के नाम पर कट्टर नहीं थे वरना इतने सारे लुटेरे हमारी भूमि पर यूं ही नहीं चले आते. और आज भी अगर कोई यह चाहता है कि भारत का राष्ट्रवाद मज़बूत ना हो तो वो सिर्फ और सिर्फ इसलिए, ताकि भारत कमजोर बना रहे जिससे उसके टुकड़े टुकड़े करके विदेशी इसे आपस में बाट लें.

आज ईसाईयों के पास सैकड़ों राष्ट्र हैं और इस्लाम के पास पचासों और वामपंथ के पास भी दसियों राष्ट्र हैं, वहीं हिन्दुओं के पास सिर्फ एक… तब भी इन के पेट में इतना दर्द क्यों होता रहता है कि ये जब देखो तब राष्ट्र पर चर्चा के नाम पर देश में भ्रम फैलाते रहते हैं.

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