नमो से नफरत : ये मनोरोग का मामला है हुज़ूर

वो संघ प्रचारक था तो भी नफरत…
वो CM बना तो भी नफरत…
बिजली चोरी को रोका तो भी नफरत..
रिवरफ्रंट बनाया फिर भी नफरत..
नेनो के लिए टाटा को बुलाया तो भी नफरत…

15 साल पहले हुए दंगो की वजह से नफरत…
15 साल से दंगे नहीं हुए इस लिए नफरत…

उसके PM बनने की बात से नफरत..
उसके PM बन जाने से नफरत,
उसके कपड़ों से नफरत…
उसके सुधार कार्यक्रमों से नफरत..
उसके विदेश दौरों से नफरत…
उसके भाषण से नफरत…
उसके चेहरे से नफरत…

उसकी माँ से नफरत..
उसने चाय बेची तो नफरत..
उसने घरबार को त्याग दिया तो नफरत..
माँ से मिलने जाए तो नफरत….
पत्नी को सिक्युरिटी दे तो नफरत..
न दे तो भी नफरत…

संसद में बैठे तो नफरत..
जनता से बोले तो नफरत..
रेडियो टीवी पर बोले तो नफरत..
न बोले तो नफरत..
भाषण की भावुकता से नफरत..
भाषण की दृढ़ताओं से नफरत..
वो रोये तो नफरत..
वो हँसे तो नफरत..

पाकिस्तान से वार्ता पर नफरत…
पाकिस्तान से सख्ती पर नफरत,
सर्जिकल स्ट्राइक पर नफरत..
आतंकवादी को मारे तो नफरत..

काले धन पर अभियान न चलने पर नफरत…
अभियान चले तो नफरत…
भ्रष्टाचारी की पुंगी बजाई तो नफरत…

इस बात से भी नफरत कि कोई आदमी
उसके पक्ष में पोस्ट कैसे लिख सकता है?

लिखे तो ‘मोदी भक्त’ का संबोधन…

सबसे बड़ा रहस्य ये है कि
मोदी का विरोध करने वाले यह नहीं बताते,
या बताने से डरते हैं कि वह समर्थन किसका करते हैं?

जिसको जनता चुन के लाई उसका या अल्प मत का?
कामचोरों का या जो 16-17 घंटे काम करता है उसका?

या फिर सिर्फ करने के लिए विरोध और नफरत करते हैं?

माफ़ कीजियेगा …..!!!!
ये पक्का मनोरोग का मामला है हुजूर

– साभार: Thakur Rajeev Ranjan Singh

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