देवदास : शोक का उत्सव है और विलाप का दरबार भी

शरदचन्द्र ने बहुत छोटी सी उम्र में ही देवदास उपन्यास को लिख दिया था. उस किशोर वय में जबकि प्रेम और प्रेम के संधि विच्छेद को जानना समझना भी मुश्किल होता था. शरदचन्द्र ने इस पर प्रेम और विछोह का महान आख्यान हम सब के लिये लिख डाला था.

अलग अलग भाषाओं में देवदास पर बहुत सी फिल्में बन चुकी है जिसमें से विमल रॉय की दिलीप कुमार अभिनित फिल्म को सबसे ज्यादा पसंद किया गया और सराहा गया. एक लोक लुभावन सी अवधारणा ये है कि कोई प्रेम करें और इस कदर टूटकर करें कि प्रेम में सुध-बुध खो दे पर प्रेम परवान न चढ सके. अब या तो उसे भूलकर आगे बढा जायें या फिर प्रेम से खिन्न नैराश्य में डूबने को मन तैयार हो जाये. प्रेम भीतर जले और आप प्रेम के साथ साथ अंदर-बाहर.

अंदर प्रेम तड़पाये, बाहर दुनिया. देवदास यही है. दुनिया से विरक्त हो जाने का आतुर मन. भीतर की टीस में राख होती आत्मा का स्वरूप. देवदास एक रूपक बनकर हम सब के सामने उभरा है. एक सफल प्रेम का और उसकी असफल परिणति से उत्पन्न निराशा और क्षोभ का.

देवदास शोक का उत्सव है और विलाप का दरबार भी. एक तथ्य ये भी है कि देवदास प्रेमी पहले था, शोकाकुल वो बाद में हुआ और वैसे भी अमूमन गहरे प्रेम को एक ना एक दिन शोक में बदलना ही होता है. ये होना लाजिमी नहीं है, पर गहरा प्रेम अपने मानकों और आदर्शों की तलाश करता रहता है जो पूरा होना जरा मुश्किल होता है.

देवदास ने खुद को निराशा में डूबोने से पहले टूटकर पारो से प्रेम भी किया था. इतना कि वो उसे खुद से अलग रखकर देखता ही नहीं था. भावुकता संसार में किसी पर भी जो अधिकार दे देती है वो अधिकार पारो-देवदास का आपस में था. पारो देवदास से वादा लेती है कि वो उसे सेवा का अवसर दें. उससे उसकी ये बीमार हालत देखी नहीं जाती और देवदास कह उठता है कि अगर मेरी सेवा करने से तुम्हें इतनी ही खुशी मिलती है तो ठीक है, मरने से पहले तुम्हारी चौखट पर जरूर आउंगा.

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और देवदास अपनी अंतिम यात्रा से जाने से पहले पारो से मिलने उसके गांव आता है और ठीक उसके घर की देहरी के आगे जान देता है. जिससे दैहिक रूप से मिलना पूरे जीवन में न हुआ तो मौत के सिरहाने पर कहाँ होता? देवदास और पारो में आत्मगौरव की जो लड़ाई चल रही होती है वो यहां भी है. देवदास वादा निभाने देहरी पर आता है पर सेवा नहीं कराता. अपने लिए पारो को एक टीस छोड़ कर जाता है.

शरदचन्द के देवदास की मौत भी बेहद कारूण है. मेहतर उसकी मृत देह को बांधकर सूखे तालाब के किनारे आधा जलाकर फेंक देते है. फिर उसकी अधजली लाश के लिये गिद्व, कौवे, कुत्तो और सियारों में झगडा होता है. आदमी जिन्दगी भर चाहे कैसे भी जिएं, कम से कम अपनी मौत इस तरह नहीं चाहता.

शरदचन्द्र भी देवदास के चरित्र की ऐसी दशा लिखने के बाद कहते हैं – देवदास के लिये बड़ी तकलीफ हुई. जो कोई भी ये कहानी पढ़ेगा, वह मेरी तरह ही दुख पायेगा. फिर भी अगर कभी देवदास की तरह किसी अभागे, असंयमी और पापी के साथ परिचय हो, तो उसके लिये प्रार्थना करना कि और जो कुछ भी हो, किन्तु इस तरह उस जैसी मौत किसी की नहीं हो.

मरने में कोई हर्ज नहीं, किन्तु उस समय के स्नेहपूर्ण हाथ का स्पर्श माथे तक पहुंचे. एक भी दया और स्नेह से परिपूर्ण मुंह देखते देखते इस जीवन का अंत हो. मरते समय जैसी किसी की भी आंखो में एक बूंद आंसू देखकर तो मर सके.

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