‘शिव’ मिशन 2019 की समाधि से निकलो बाहर : अकेले इन्दौर में ढाई लाख हड्डी तोड़ बुखार से कराह चुके!

इन दिनों पूरे मध्य प्रदेश में प्रत्येक गाँव, कस्बा, शहर में लोग सर्दी खांसी, बुखार, हड़्ड़ी तोड़ बुखार से पीड़ित हैं. हर घर में प्रत्येक तीसरा आदमी हड़्ड़ी तोड़ बुखार से कराह रहा है. एक मरीज का बुखार उतरता है, घर का दूसरा सदस्य बीमार पड़ जाता है. सरकारी अस्पतालों में, प्राईवेट क्लिनिकों में मरीजों की लम्बी लम्बी कतारें, नर्सिंग होम और निजी अस्पतालों में मरीजों की बाढ़.

माननीय मुख्यमंत्री महोदय शिवराज सिंह जी अब बहुत हो गया. अब आप मिशन 2019 की समाधि से बाहर आकर तो देखिये, अकेले इन्दौर शहर में लगभग ढ़ाई लाख लोग हड़्ड़ी तोड़ बुखार से कराह चुके हैं. रोज़ाना हज़ारों नए मरीज़ आ रहे हैं. कहीं ऐसा न हो जनता का यह हड्डी तोड़ बुखार, आपके मिशन 2019 में गले की हड्डी न बन जाये. मामाश्री, ‘नर्मेदे हर’ का नारा अब दिग्गी राजा को थोड़ा बहुत लगाने दो, हो सकता है उनके पुराने पाप धुल जायें. आप तो मेहरबानी करके चुनावी तपस्या स्थली से बाहर आकर गंभीरता पूर्वक सोचो.

आज अकेले इन्दौर में ड़ेंगू, चिकुनगुनिया बीमारी लेकर हजारों की संख्या में लोग हर दिन शिकार हो रहे हैं. आप अच्छी तरह जानते हैं कि “स्वाईन फ्लू” के अकेले इन्दौर में अभी तक 124 मरीज मिल चुके हैं. इनमें से पैंतीस अभागे मरीजों की H1N1 ‘कहे जाने वाले इस स्वाईन फ्लू से अभी तक मृत्यु हो चुकी है. किसी मरीज को स्वाईन फ्लू है या नहीं उसकी जांच के लिये ‘सीरम‘ इन्दौर से बाहर भेजा जाता है, लेकिन उसकी जांच की पुष्टि की रिपोर्ट, लगभग सभी मामलों में, उस समय आ पाती है, जब तक मरीज मर जाता है.

माननीय मुख्य मंत्री जी कितने शर्म की चीज है कि एक तरफ तो आप आगजनी करने वाले पुलिस की गोलियों से मरने वाले गुंड़ो के परिवार को एक एक करोड़ रूपया मुआवजा दे रहे हैं. किसानों को पटाने के लिए 8 रुपये किलो प्याज खरीद कर प्याज माफिया को कौड़ी दाम बेच रहे हैं. इतना ही नहीं खरीदा प्याज सूखने के कारण सैंकड़ों करोड़ का घाटा गिना रहे हैं. और दूसरी तरफ आपके प्रदेश में लाखों लोग “हड्डी तोड़ बुखार “ से कराह रहे हैं. पर श्रीमान आपके पास इतना भी पैसा नहीं है कि स्वाईन फ्लू के मरीजों की जांच के लिए “वायरोलॉजी” की एक छोटी सी प्रयोगशाला इन्दौर में खोल सकें. जिससे मरीजों के H1N1 रोग की पुष्टि उनके मरने के पहले हो सके.

आदरणीय शिवराज सिंह जी, आप चूंकि मेरे परमप्रिय मित्र आदरणीय स्व० सुन्दरलाल जी पटवा के शिष्य हैं इस कारण मेरा आपसे स्नेह होना स्वभाविक है. इसी रिश्ते के कारण मैं आपसे अधिकारपूर्वक पूछना चाहता हूं कि क्या आप जानते है जिन सरकारी पदों पर बैठे ड़ाक्टरों तथा चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह आप मानते हैं उनमें 70 फीसदी ऐसे लोग हैं जिन्होने अपनी “MBBS” की साढ़े चार की डिग्री छ: से लेकर आठ दस साल में हासिल की है.

क्या इन लोगों ने आपको बताया है कि H1N1 या स्वाईन फ्लू की बीमारी के फैलने का असली कारण ‘मुर्गा मुर्गी यानि चिकिन है. क्या आपने यह जांच कराई है कि कितने पोल्ट्री फार्मों में चिकन बीमारी से मर गए हैं. कहीं पोल्ट्री फार्म के मालिकों ने इन बीमार मुर्गा मुर्गी को बाजार में बेच तो नहीं दिया, जिसे खाकर लोग धड़ाधड़ स्वाईन फ्लू से बीमार होकर मरते जा रहे हैं.

यह तो इन्दौर भोपाल जैसी जगह में लोग पहचान लेते हैं कि मरने वाले को ‘स्वाईन’ फ्लू था. छोटी जगहों पर तो मरीज चटपट हो जाता है, लोग यह मानकर ठंड़ी सांस लेकर चुप रहते हैं “ क्या करें भगवान की मर्जी थी, आ गई थी चले गए ईश्वर मृत आत्मा को शान्ति प्रदान करे “. अरे भाई दूसरे देशों में तो किसी एक पोल्ट्री फार्म में अगर एक भी मुर्गी अचानक बीमार होकर मर जाती है तो लाखों मुर्गे मुर्गियों को मारकर जमीन के भीतर दफना दिया जाता है जिससे कि स्वाईन फ्लू ना फैले. पर मुझे पता नहीं आपके अतिविद्वान सरकारी विशेषज्ञों ने अभी तक बीमार मुर्गियों को ढूँढने और खतम करने की सलाह क्यों नहीं दी.

शिवराज जी आपने सरकारी मेडीकल कालेजों के विद्वान प्रोफेसरों और विशेषज्ञों को तो ‘भड़भूंजे ‘ के चने की रेत भरी कढ़ाई जैसा बनाकर रख दिया है. जब चाहे तब आपके कमिश्नर कलेक्टर या कोई भी आई ए एस अफसर ‘चने या मक्के की फुली‘ जैसा चटका देता है. आज तो हालत यह हो गई है कि सरकारी अफसर आगे आगे चलता है और तबादले, प्रमोशन के डर के मारे बड़े से बड़े डॉक्टर दुम दबाकर उसके पीछे “ यस सर, यस सर” कहते चलता रहता है. क्या कभी आपके जिम्मेदार सरकारी अफसरों ने आपको बताया कि विश्व स्वास्थ संगठन से ‘स्वाईन फ्लू’ की दबाई “टेमी फ्लू “ की गोलियां आपको फ्री में भेजी गई हैं, उनकी कितनी भारी भरकम कीमत निजी अस्पताल मरीजों से वसूल कर रहे हैं.

क्या आपके इन अफसरों ने आपको कभी बताया कि जिन निजी अस्पतालों को आपने स्वाईन फ्लू के लिए चिन्हित किया उनके पास अपने खुद के “वेन्टीलेटर “ स्वाईन फ्लू के मरीजों के लिए हैं या नहीं. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कि बड़े बड़े चिन्हित अस्पताल भी बाजार से स्वाईन फ्लू के मरीजों के लिए किराये से वेन्टीलेटर उठाते हैं. और मरीजों से पांच दस हजार रूपये रोज वसूल करते हैं जबकि किराया महज हजार रुपये रोज देते हैं. हाँ, शायद आपके विद्वान सलाहकार यह भी नहीं जानते कि जिस वेन्टीलेटर पर स्वाईन फ्लू का मरीज रखा जाता, उस वेन्टीलेटर को दूसरे मरीज द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, नहीं तो बेचारा अच्छा भला मरीज भी स्वाईन फ्लू का मरीज बन जायेगा.

कहीं इन्दौर में जो हड्डी तोड़ बुखार फैला है जिसे “डेंगू “ या “चिकुनगुनिया” मान कर इलाज किया जा रहा है , वह कहीं “झीका बुखार“ (ZIKA) तो नहीं है.

माननीय मुख्यमंत्रीजी आपकी जानकारी के लिये मैं बता दूं कि इन्दौर में दर्जनों बड़े बड़े डॉक्टर मेरे विद्यार्थी रह चुके हैं. मैंने कई डाक्टरों से चर्चा की. पता चला जिस हड्डी तोड़ बुखार से मरीजों की भरमार इन्दौर में हो रही है उनमें निम्न लक्षण पाये जा रहे हैं :-
1. तेज बुखार
2. त्वचा पर हल्के दाने
3. हड्डी के जोड़ों में दर्द
4. कुछ मामलों में आँखों का लाल होना यानि कंन्जक्टिवाइटिस
5. मांसपेशियां का दर्द होना
6. कुछ मामलों में आँखों के पीछे दर्द
7. सिर दर्द
8. उल्टी होना
9. शरीर का लस्त पड़ना, कमोबेश यह लक्षण लगभग सभी मरीजों में पाये जा रहे हैं.

डेंगू, चिकुनगुनिया और स्वाईन फ्लू की अभी तक कोई रामबाण दबा उपलब्ध नहीं है. इन तीनों बीमारियों में सभी लक्षण लगभग एक जैसे होते हैं. बुखार उतारने की दवा पेराऐसीटामॉल दी जाती है, और कोई इन्फेक्शन न हो इसके लिये एन्टीबायोटिक भी कभी कभी डाक्टर दे देता है. पर बीमारी वास्तव में डेंगू है, या चिकुनगुनिया या फिर स्वाईन फ्लू है, इसकी पुख्ता जांच की सुविधा किसी भी सरकारी चिकित्सालय में वर्तमान में पर्याप्त मानकों के आधार पर मप्र में मौजूद नहीं है.

चिकिनगुनिया जिस वायरस से फैलता है उसे TOGAVIRIDAE ALPHA VIRUS कहते हैं. डैंगू नाम का वायरस का नाम FLAVIRIDAE FLAVIVIRUS कहते हैं. स्वाईन फ्लू H1N1 नामक वायरस से होता है जो मुर्गी मुर्गों के अचानक मरने से होता है. इसे बर्ड़ फ्लू भी कहते हैं. इन्दौर में कहीं भी इन वायरसों को पहचानने की कोई प्रयोगशाला नहीं है. जो पैथालाजीकल टेस्ट फिलहाल इन बीमारियों के लिये किये जाते हैं वह अनुमानित ही होते हैं. एक टेस्ट को Ig(M) और Ig(G) ELISA टेस्ट कहते हैं दूसरे को क्रोमोटोग्राफिक परीक्षण कहा जाता है. यह दोनों ही परीक्षण बहुत मंहगे होते है किसी भी सरकारी अस्पताल में इसके लिये जरूरी “किट” खरीदने की व्यवस्था नहीं है। यहाँ तक कि मेडीकल कालेजों मे भी इनकी नियमित जांच नहीं हो पाती है.

इस अव्यवस्था का कारण है कि आपने मेडीकल कालेजों के डीन के ऊपर आई ए एस अफसर कमिश्नर को बैठा दिया है जिनको चिकित्सा विज्ञान का ‘ क ख ग ‘ तक का कोई ज्ञान नहीं होता. वह तो सिर्फ यह जानते हैं कि अमुक ड़ाक्टर ने नई दवाई के ड्रग ट्रायल में क्यों भाग लिया और उसके परिणामों का शोधपत्र पढ़ने विदेश कैसे चले गए. अरे भाई जब तक नई दवाओं का क्लीनिकल ट्रायल नहीं होगा बीमारियों की नई दवाएं कैसे ईजाद होगी. आई ए एस अफसरों की नजर में लगभग सभी डाक्टर काम चोर, भ्रष्ट और बेईमान होते हैं. यही एक कारण है चिकित्सा की रिसर्च के क्षेत्र में हमारे ड़ाक्टर पूरी तरह फिस्सडी होते जा रहे हैं.

किसी समय डेंगू और चिकिनगुनिया को एक बीमारी ही मानी जाती थी. डॉ आर डब्लू रोस ने भारत में पचासवे दशक में चिकुनगुनिया का वायरस अलग से पहचाना. इन्दौर में डेंगू और चिकिनगुनिया के मरीजों की जांच के सभी टेस्ट व मुश्किल 10 फीसदी सही निकल रहे हैं. ज्यादातर मामलों में टेस्ट निगेटिव हो रहे हैं फिर भी बीमारी के लक्षण होते हैं, और मरीज हड्डी तोड़ बुखार से तड़प रहे हैं.

मेरे विचार में 30 मई 2017 के विश्व स्वास्थ संगठन की रिपोर्ट को हमें गंभीरता से लेना चाहिये. इस रिपोर्ट में गुजरात के अहमदाबाद जिले में “झीका” वायरस के तीन मरीजों के पाये जाने की पुष्टि RT-PCR टेस्ट से की है तथा चिन्ता व्यक्त की है कि इस पर नजर नहीं रखी गई तो झीका बुखार संक्रामक रूप से भारत में फैल सकता है. वर्तमान में इन्दौर में जो हजारों की तादाद में मरीज हड्डी तोड़ बुखार में जूझ रहे हैं, उनके सभी लक्षण “झीका बुखार” के लक्षणों से मिल रहे हैं. मेरा अपना निजी विचार है कि व्यापक रूप से फैला वर्तमान हड्डी तोड़ बुखार, डेंगू या चिकुनगुनिया नहीं है यह “झीका वायरस का बुखार” भी हो सकता है.

अर्थात सरकार को तत्काल निम्न कदम तत्काल उठाना चाहिये :-
1. बीमारी की व्यापकता देखते हुए तत्काल “मेडीकल इमरजेन्सी “ की घोषणा कर देना चाहिये.
2. इन्दौर को स्वच्छता में नम्बर वन मिलने के बाद इसे बीमारी में नम्बर वन होने से रोकने के लिए बड़े पैमाने पर मच्छर मार फ्युमिगेशन करना चाहिये.
3. मरीजों के सीरम सेम्पल और जगह जगह से मच्छरों के सेम्पल पकड़ कर विश्व स्वास्थ संगठन की गाइडलाईन के हिसाब से वायरोलाजी लेब में भेजकर परीक्षण कराना चाहिये. अगर झीका वायरस की पुष्टि हो जाती है तो अन्तर्राष्ट्रीय युद्धस्तर पर बचाव की कार्यवाही करना चाहिये.
4. वर्तमान में जो हड़्ड़ी तोड़ बुखार है इसके लक्षण पूरी तरह “झीका बुखार “ से मिल रहे हैं. झीका बुखार गर्भवती महिलाओं को बहुत घातक होता है. क्योंकि झीका वायरस गर्भ में पहुँच कर शिशु के मस्तिष्क के विकास को रोक देता है. अत: मरीजों को एस्प्रीन नहीं लेने तथा महिलाओं को गर्भघारण नहीं करने की जानकारी अवश्य देना चाहिये.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY