जब पड़े लात-घूंसे तो पत्रकारों ने लौटाई ब्लैकमेलिंग की रकम

फैजाबाद से प्रकाशित होने वाले एक दैनिक समाचार पत्र के वरिष्ठ पत्रकार महोदय अपने तीन सहयोगियों के साथ पंहुच गये सुल्तानपुर के कादीपुर बाजार में. इस बाजार में एक मेडिकल स्टोर को उन्होंने निशाना बनाया और वहां जाकर एक ग्राहक के रुप में अलग-अलग प्रकार की दवाईयां मंगाकर देखने लगे.

इतनी जांच पड़ताल करने के बाद उन्हें उस मेडिकल स्टोर में एक्सपायरी डेट की कुछ दवाएं मिल गयीं. इसके बाद तो पत्रकार महोदय एकदम से उखड़ते हुये फटाफट मामले को एसपी, आईजी, डीजीपी से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक ले जाने की धमकी देने लगे. पूरे वाकये को अखबार में छापने और टीवी न्यूज़ में दिखाने की बात करने लगे.

इधर मेडिकल स्टोर का मालिक हाथ-पैर जोड़कर माफी मांगने लगा कि मामले को किसी तरह से निपटा दीजिये और आगे वह इस तरह की गलती दोबारा नहीं करेगा. लेकिन पत्रकार महोदय अपनी जिद पर अड़े रहे. तभी उनके एक सहयोगी ने मेडिकल स्टोर मालिक को कोने में ले जाकर समझाया और किसी तरह से पचास हजार में मामला रफा दफा करने की बात तय हुई.

स्टोर मालिक ने तत्काल उपलब्ध पच्चीस हजार रुपये का भुगतान भी कर दिया और बाकी के पैसे देने का भी समय मांग लिया. लेकिन इसी बीच बात किसी तरह से अगल-बगल की दुकानों तक भी पंहुच गयी और लोग मेडिकल स्टोर पर इकट्ठा हो गये.

लोगों की भीड़ देखकर पत्रकार महोदय अपने सहयोगियों के साथ वहां से खिसकने की सोच ही रहे थे कि भीड़ ने उन पर हमला कर दिया और लात-घूसों से पूरी खातिरदारी करने के बाद उनके पास मौजूद पच्चीस हजार रुपये स्टोर मालिक को लौटवाये और फिर पुलिस बुलाकर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया.

वैसे तो यह मात्र एक छोटी सी घटना है लेकिन पत्रकारिता जगत के काले सच को सामने लाने के लिये काफी है. इस घटना से आसानी से समझा जा सकता है कि आखिर कैसे कुछ पत्रकार अपने पेशे में हजारों की कमाई करते हुये करोड़ों की कोठियां बनवा लेते हैं. पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे को भी कुछ लोग तार-तार करते हुये कैसे खबरें बेच कर करोडों की संपत्ति के मालिक बन जाते हैं.

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