जिनकी मुहब्बत में हिन्दू धर्म पर हमलावर हो, पहले जान तो लो उनकी हक़ीक़त

पिछले लेख पर हो रही चर्चा में शामिल होने एक ज्ञानी (?) ‘बोधिसत्व’ आये. साहब को हिन्दू धर्म से तमाम दिक्कतें हैं. मसलन बेचारे ब्राह्मणवाद से पीड़ित हैं और संभवतया भीम-मीम मुहब्बत से अभिशप्त भी. ऐसा इसलिये कह रहा हूँ कि क्योंकि जमात-ए-इस्लामी वालों की तरह इनकी मान्यता भी यही है कि “हिन्दू धर्म ब्राह्मणवाद पर अवलंबित है जहाँ से अगर ब्राह्मणवाद को हटा दिया जाये तो हिन्दू धर्म में कुछ बचेगा ही नहीं”.

अब इस बात का जवाब बहुत पहले भी कई बार दे चुका हूँ, पर जिनकी मुहब्बत में ये हिन्दू धर्म पर पिले पड़े हैं और खान जुनैदुल्लाह जैसों को असीम सुख की अनुभूति करा रहे हैं, तो आवश्यक है कि इन्हें खान साहेब के खेमे का भी सच बताया जाये ताकि इनको पता चलेगा कि जहाँ से इनको वैचारिक खुराक मिल रही है वहां कैसे हालात हैं.

12 रबी-उल-अव्वल, हिजरी सन 11, मदीने में नबी-करीम का विसाल हुआ. आपकी वफ़ात के बाद खिलाफ़त को लेकर आपके करीबियों के बीच झगड़े शुरू हो गये. ये बात तो इस्लामी तारीख पर नज़र रखने वाले हर शख्स को मालूम है पर इन विवादों के बीच एक और बड़ी घटना हुई थी जिससे लोग परिचित नहीं है.

मसला ये था कि उस समय मदीना में दो तरह के लोग आबाद थे. एक तो वो लोग थे जो मदीना के मूल निवासी थे और दूसरे वो थे जो मक्के से हिजरत करके वहां आये थे. मदीने के लोगों का कहना था कि मक्का के लोगों के अत्याचारों से त्रस्त होकर जब नबी-करीम, उनके परिवारजन और साथी मदीना आये थे तब वो हम थे जो उनके मददगार बने थे. हमने मस्जिदे-नबी की तामीर के लिये जमीन दी थी और अपनी ज़मीन-जायदाद में उन लोगों को शरीक किया था.

हमने कभी मक्का से आये लोगों के इज्ज़त और एहतराम में कोई कमी नहीं की. हमने इनकी तरफ से जंगे भी लड़ीं. इन्हीं सब कारणों से हमें अंसार (मददगार) कहा गया. अरब में आज जो इस्लाम को प्रभुत्व हासिल हुआ है उसमें हमारा बहुत बड़ा योगदान है क्योंकि हमने इस्लाम के लिये कुर्बानियां दी.

इन्हीं बातों की चर्चा करते हुए मदीना के ये अंसार ‘सकीफ़ा बनी सायदा’ नाम की जगह पर जमा हुये. इस सभा की अध्यक्षता अंसारियों के बुजुर्ग नेता ‘हजरत साद बिन उबादा’ कर रहे थे. इस सभा में अंसारियों की ओर से ये मांग उठी कि इस्लाम के प्रति उनकी खिदमत का एहतराम करते हुए उनके बुजुर्ग ‘हजरत साद बिन उबादा’ को खलीफा बनाया जाया.

ये बात जब हजरत अबू बकर, हजरत उमर, हजरत उस्मान वगैरह के पास पहुँची तो उन्होंने फ़ौरन हजरत अबू बकर को बनी सायदा भेज दिया. जब हजरत अबू बकर वहां पहुंचे तो अंसार की तरफ से अपनी मांग रखते हुए कहा गया कि हमारे बुजुर्ग ‘हजरत साद बिन उबादा’ को खलीफा तस्लीम किया जाये.

इस पर हजरत अबू बकर ने हजरत साद बिन उबादा से मुखातिब होते हुए कहा, “क्या तुम्हें याद नहीं कि तुम्हारी मौजूदगी में रसूल (सल्ल०) ने फरमाया था कि अरब में सियासी सरदारी सिर्फ कुरैश ही कर सकते हैं”.

हजरत अबू बकर ने आगे कहा, “अरब के लोग कुरैश के सिवा किसी और की मातहती कबूल करने पर कभी भी राजी नहीं हो सकते. अंसारों, तुम्हारी दीनी खिदमत और इस्लाम के अंदर तुम्हारा मुक़ाम मुसल्लम है मगर अरब के लोग कुरैश की कयादत के सिवा किसी और के नेतृत्व पर कभी राजी नहीं होंगे”

और इसके बाद खिलाफत, कुरैश और फिर कुरैश के अंदर हाशमियों के पास चली गई. हाशमी के बाद उसी कुरैश कबीले के उमैय्य्द खानदान वाले खिलाफत के हकदार बने फिर अब्बासियों का दौर आया. कुरैश की श्रेष्ठता ने अंसारों का नम्बर कभी आने ही नहीं दिया.

कुरैश खानदान की श्रेष्ठता एक और मौके पर बयान हुई है. हदीसों में आता है कि जब अल्लाह ने अपने आखिरी और बरगुजीदा नबी की विलादत के लिये ज़मीन के सारे मुल्कों पर नज़र डाली तो अरब को चुन लिया. फिर अरब पर नज़र डाली तो उनमें से आले-इस्माईल को चुन लिया. फिर आले-इस्माईल में से कनाना को चुन लिया, फिर कनाना में से कुरैश को चुन लिया. यानि कुरैश को सबसे आला-कबीला तय पाया गया.

ऐसे में मीम के ज़रखरीद और उनके विचार को ढोने वाले परजीवी बने इन कथित ‘बोधिसत्वों’ से बड़ा सहज सा सवाल है कि ये जो आप यहाँ लोगों के मन में ये ज़हर डाल रहे हो कि हिन्दू धर्म के अंदर ब्राह्मणवाद है, ब्राह्मणों की श्रेष्ठता वाली गंदगी है, केवल उन्हें ही मंदिरों में पुजारी होने का हक हासिल है. ब्राह्मणों को निकाल दो तो हिंदुत्व धराशायी हो जायेगा वगैरह-वगैरह, इसलिये यहाँ इंसानी मसावात (समानता) मुमकिन ही नहीं है और हिन्दू धर्म ब्राह्मणवाद की रस्सी से बंधा है. जबकि दूसरे मज़हबों के यहाँ इंसानी मसावात इतने आला दर्जे पर है कि इसके अंदर आने वाला हर कोई बराबर है, जहाँ कोई इंसान किसी से कमतर नहीं है, किसी गोरे को किसी काले पर फजीलत नहीं है, कोई अरब किसी गैर-अरब से श्रेष्ठ नहीं, न ही किसी खानदान को किसी दूसरे खानदान पर कोई श्रेष्ठता हासिल है.

– अगर ऐसा वास्तव में है तो कुरैश को इतना आला मुक़ाम किसलिए दिया गया है?

– क्यों हरमैन-शरीफैन की इमामत पर केवल कुरैश ही काबिज हो सकते हैं?

– खाना-ए-काबा की चाबी भी कुरैश के पास ही क्यों रहे? 1400 सालों में दूसरे मुल्कों के मुसलमानों को छोड़िये खुद गैर-कुरैश अरब को इन कामों के लायक क्यों नहीं समझा गया?

आलमी-मसावात के आपके बड़े-बड़े ज्ञान सिर्फ हिन्दुओं के ऊपर बखारना आता है आपको? दूसरे खेमों के आलमी-मसावात के ऐसे नमूनों पर आपकी जुबान क्यों नहीं खुलती? सिर्फ इसलिये न, क्योंकि आप बुजदिल है. न तो आपके अंदर सच कहने का साहस है, न सच सुनने का हौसला.

कभी दूसरे खेमों में भी टहल आइये, वहां के जिस आलमी-मसावात की मृग-मरीचिका आपको रिझाती है, उधर की तस्वीर और भी भद्दी है. ऊपर जो मैंने दिखाया है वो इसका बड़ा छोटा सैम्पल है.

हमने तो अपने वंचित भाइयों को अपने मंदिरों में पुरोहिताई का हक़ देना शुरू कर दिया है, अगर आप में हौसला है तो खान जुनैदुल्लाह से पूछिये कि काबे की चाबी और हरमैन-शरीफैन की इमामत किसी और मुल्क के मोमिन को न सही, किसी गैर-कुरैश अरब को ही सौंप पर दिखा दे… फिर बात करेंगे न ब्राह्मणवाद की श्रेष्ठता पर.

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