सुप्रीम कोर्ट साहब… तब तो आप चुप थे!

मैं पागल नहीं हूँ. मेरे जैसे बहुत से दोस्त न मूर्ख हैं, न अंधविश्वासी और न ही रूढ़िवादी हैं. हम सब जानते हैं कि अत्यधिक आतिशबाज़ी से वातावरण में प्रदूषण फैलता है और ध्वनि प्रदूषण भी. एक अश्लील और घटिया उदहारण याद आ रहा है. वैसे भी कुछ मित्र आरोप लगाते हुए कहने ही लगे हैं कि मेरा स्तर गिरता जा रहा है.

एक फिल्म आई थी ‘बैंडिट क्वीन’. बहुत सारे डाकू एक लड़की फूलन देवी के साथ बलात्कार करते हैं. वो सड़क किनारे पड़ी हुई है. तभी वहां से एक शरीफ इंसान गुज़रता है जो उसकी सहायता करना चाहता है, और उसे उठाने की कोशिश करता है. घायल, अर्ध विक्षिप्त फूलन कहती है, “आ जा, तू भी आ जा. कर ले जो करना है”.

मुसलमानों ने लूटा, मुगलों ने बलात्कार किये, कत्लेआम किये, आगज़नी की और धर्म परिवर्तन किये. फिर अंग्रेज़ आ गए. ग़ुलामी की ज़ंजीरों में जकड लिया और हिन्दू के साथ भी वही किया जो एक गुलाम के साथ होता है कि ‘न तेरा कोई अस्तित्व है, न कोई संस्कृति है, न धर्म. तू कुछ नहीं है. है ही नहीं’.

फिर आज़ाद हिंदुस्तान के स्वयंभू हुक्मरानों ने बताया कि 1000 साल में हिन्दू से मुसलमान बन गए लोगों को अब तुम्हारे साथ नहीं रहना. उन्हें अलग मुल्क चाहिए. फिर बचे हिन्दुस्तान में तुम्हारा राज होगा, तुम्हारा गौरवमयी इतिहास होगा, तुम्हारी संस्कृति और परम्पराएं स्वतन्त्र होंगी. तुम अपने त्यौहार, रस्मोरिवाज़, मंदिर पूजा और आस्थाएं निर्भीकता से अपना सकोगे.

जल्दी ही हिन्दू को पता चल गया कि उसे ठग लिया गया है. वो मुल्क केवल उनका और ये मुल्क उनका भी. उनके लिए अलग संविधान, अलग कानून और आचार संहिताएं बनाई गई और हमारे लिए ‘हिन्दू कोड बिल’.

हिन्दू ने कहा कि ‘अब गाय की हत्या बंद करो’.
‘अबे पागल है क्या. बौखला गया है. ये देश तेरे बाप का नहीं है’.
हजारों संतों ने और लाखों आस्था धारी हिन्दुओं ने प्रदर्शन किया तो हज़ारों को गोली से उड़ा दिया गया था.
हिन्दू ने कहा, ‘मेरे मंदिरों को आज़ाद कर दो. राम के जन्मस्थल को मुक्त कर दो’, तो उसे गोलियों से भून दिया गया.

तुष्टिकरण और वोट की राजनीति ने एक बार फिर हिन्दू को इस देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया. यहाँ तक कि एक प्रधानमंत्री ने कहा कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमान का है.

सुप्रीम कोर्ट साहब… जब देश में आबादी का संतुलन एक षड्यंत्र के तहत लगातार बिगाड़ा जा रहा था, तब आप चुप थे.

जब इस देश के छात्रों को हिन्दू विरोधी इतिहास पढ़ाया जा रहा था और बाबर व सिकंदर को महान और सिक्खों तथा शिवाजी को लुटेरा बताया जा रहा था, तब आप चुप थे.

जब पंडितों को मार मार कर कश्मीर से भगाया जा रहा था, तब भी आप चुप थे, तब आप ने कोई एक्शन नहीं लिया.

इमरजेंसी की बेड़ियों में देश को जकड दिया गया, तब भी आप चुप थे, तब आप की शक्ति कहाँ चली गई थी महामहिम.

देश के लाखों किसानों की ज़मीन कौड़ियों के भाव लूट कर उद्योगपतियों, बिल्डरों और नेताओं के दामादों को दे दी गई, तब आप मौन थे.

सत्तर साल से चल रहे जबरन, लव जेहाद और प्रलोभन के द्वारा मुस्लिम और ईसाई धर्म परिवर्तन पर, देश भर में पनप गयी अवैध बस्तियों पर, भयानक कुपोषण और गरीबी के प्रति सरकारों की ज़िम्मेदारियों पर, शिक्षा से लेकर चिकित्सा तक में गरीब के साथ भेदभाव पर, स्कूलों में शौचालय तक न होने पर, अव्यवस्थित आरक्षण पर, मस्जिदों के लाउडस्पीकरों के ध्वनि प्रदूषण पर, देश में लाखों अवैध कत्लगाहों पर, तीन करोड़ से ज्यादा बांग्ला देशी और पाकिस्तानी घुसपैठ पर और क़ुरबानी के नाम पर कटते ऊंटों, गायों, भैसों और निर्दोष जीवों के सड़कों और नालियों में बहते खून पर भी आप कुछ फरमाते रहते तो ये प्रतिक्रिया नहीं होती और शायद लोग आप की बात को गंभीरता से लेते.

हिन्दू का ज़ख्म कुरेदने की बजाय उस पर मरहम लगाइये जनाब, और किसी भी परिवर्तन के सम्बन्ध में सहयोग और मशविरा कीजिये… आदेश नहीं. आदेश और प्रतिबन्ध से उसके पुराने दर्द जाग्रत हो जाते हैं और नकारात्मक प्रतिक्रिया होती है.

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