जिसकी रक्षा रघु और राम से लेकर गुरु गोविन्द सिंह तक ने की, वो है हिन्दू धर्म

सोशल मीडिया पर एक मित्र ने कुछ दिन पहले कुछ प्रश्न उठाये, मसलन –
– हमारा अभिवादन ‘राम राम सा’ होता है , रामजी और उनके परिवार का क्या होता होगा?
– राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर के परिवारजनों की पूजा पद्धति क्या रही होगी?
– पांडव और कौरव होली-दीपावली क्यूं नहीं मनाते थे?
– महाजनपदकाल में राम और कृष्ण के मंदिर क्यूं नहीं थे?
मुझे लगता है कि उनके जैसी शंका और भी कई लोगों की होगी तो इसका उत्तर ढूँढने के प्रयास जरूर करने चाहिये.

ये सारे सवाल इसलिये उठाये गये हैं क्योंकि आप धर्म और मज़हब को एक करके देखते हैं और जो मज़हब की तय और संकीर्ण परिभाषा है उसमें धर्म को ‘फिट’ करने की कोशिश करते हैं. धर्म और मज़हब एक नहीं है क्योंकि मज़हब संकीर्ण होता है, एक वर्तुल के अंदर बंधा होता है जिससे बाहर निकलने की गुंजाइश नहीं है.

कुछ सौ साल पहले एक मजहब आया उसने कहा कि मेरी किताब अब ज्ञान और इल्म का ‘फुल स्टॉप’ है, इसके पहले जो था वो मंसूख हो चुका है और इसके बाद जो आयेगा वो सब कुफ्र होगा. इसी परिवार के सबसे पुराने सदस्य ने भी ईसा को सलीब देने की कोशिश इसीलिये की थी क्योंकि उन्हें भय था कि ये हमारी ज्ञान के ‘फुल स्टॉप’ को हटाना चाहता है. जिस चीज़ को बदलने के लिये ईसा संघर्षरत रहे बाद में उनके अनुयायियों ने अपने मत को उसी खांचे में बाँध लिया जिसके नतीजे में गैलिलियो जैसे विज्ञानियों को कैथोलिक चर्च का कोप-भाजन बनना पड़ा.

हिन्दू धर्म में ये नहीं है. सेमेटिक मज़हबों से इतर इसमें लगातार विकास और सुधार की प्रक्रिया चलती रहती है. मान्यताओं के अनुसार वेद आज से करोड़ों पर पूर्व आये. तब का समाज, कानून-व्यवस्था, मानसिकता, विचार, संकल्पनाएँ, रीति-नीति, नियम, मर्यादायें सब आज से भिन्न रही होंगीं पर वेद आज भी प्रासंगिक हैं और हमेशा प्रासंगिक रहेंगे. ये प्रासंगिक इसलिये रहे हैं क्योंकि हम ठहरे पानी की तरह रुके नहीं रहे और हर काल में हमने वेदों की काल-सापेक्ष व्याख्या की और यही हमारे बाकी ग्रंथों के साथ भी है. हम किसी एक शरीयत या व्यवस्था से बंधे नहीं रहे. हमारे यहाँ अनगिनत ‘स्मृति-ग्रन्थ’ हैं, इसकी वजह यही है.

हिंदुत्व एक गतिशील आध्यात्मिक परंपरा का नाम है जहाँ नीरसता नहीं है. राम ने जब रावण का वध किया तो ‘असत्य और अन्याय’ पर ‘सत्य और न्याय’ की विजय के रूप में ‘विजयादशमी’ मनाई गई. राम जब अयोध्या लौटे तो अयोध्यावासियों ने उनके लौटने को एक उत्सव रूप में मनाया तो दीपावली आरम्भ हुई और ये परंपरा इसी रूप में चलती रही. हिंदुत्व की विकास यात्रा में कई त्योहार-उत्सव आरंभ हुए और किसी कालखंड में लुप्त भी हो गये, उन्हीं से कई पुनर्जीवित भी किये गये.

इस्लाम से आप पैगंबर साहब को अलग नहीं कर सकते, ईसाईयत से ईसा और यहूदी मज़हब से मूसा को अलग नहीं कर सकते, पर हिन्दू धर्म में ऐसा नहीं है. यहाँ आप राम को निकाल देंगे तब भी हिन्दू धर्म रहेगा, कृष्ण को अलग करिये तब भी रहेगा, शिव और विष्णु को हटा दीजिये तब भी रहेगा, यहाँ तक कि इसे आप वेदों या किसी और ग्रन्थ या किसी तीर्थ पर भी अवलंबित नहीं मान सकते.

राम तो त्रेता में आये तो आप क्या ये कह सकते हैं कि उनसे हिन्दू धर्म है? नहीं, क्योंकि राम जी के आगमन से पूर्व भी यहाँ धर्म पूरा एक युग बिता चुका था. यानि राम और कृष्ण, बुद्ध या महावीर इनसे हिन्दू धर्म नहीं है बल्कि ये सबके सब हिन्दू धर्म के अनुपालक थे और जब भी इनका अवतरण हुआ हमने उनके मार्गदर्शन में हिंदुत्व के वट-वृक्ष को पुष्पित और पल्लवित किया.

प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘जिहाद’ में यही बात मुख्य पात्र श्यामा से कहलवाई है. श्यामा कहती है, हिन्दू धर्म वो है जिसकी रक्षा रघु और राम से लेकर गुरु गोविन्द सिंह तक ने की है. गौर करिये श्यामा ने राम को हिन्दू धर्म का रक्षक बताया है.

हमारा तो दर्शन ही इस बात पर अवलंबित है कि ‘सत्य एक है पर विद्वान् लोग अलग-अलग रूप से उसका साक्षात्कार कर सकतें हैं’. अथर्ववेद ने जब ये कहा कि ‘गंतव्य तो एक है पर रथ बहुत से हैं’ तो उसके साथ उसने ये नहीं कहा कि ये रथ कलियुग के लिये नहीं है. उस गंतव्य पर पहुँचने के मार्ग और रथ आपको आज भी तलाशने की स्वतंत्रता है. पुराण तो पहले नहीं थे तो क्या आप ये कह सकतें हैं कि तब हिंदुत्व अपूर्ण था? तुलसी की रामायण तो अभी पांच सौ साल पीछे आई तो क्या हम खुद को उससे अलग कर लें कि ये वेदकालीन नहीं है?

हमारा अभिवादन ‘राम-राम’ होता है, रामजी और उनके परिवार का क्या होता होगा? कुछ और होता होगा, इस पर प्रश्न खड़ा करने की कोई बात ही नहीं है. जब रघु नहीं हुये होंगें तो उनके वंश को ‘रघुकुल’ की जगह कुछ और कहा जाता होगा. इसमें प्रश्न खड़ा करने जैसी कौन सी बात है?

राम ने मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में कुछ मानदंड स्थापित किये जिसने उनको उस कुल में जन्में सारे लोगों में सबसे श्रेष्ठ बना दिया तो समाज ने किसी प्राचीन अभिवादन को छोड़कर ‘राम-राम’ के अभिवादन को ग्रहण कर लिया.

इनका दूसरा प्रश्न था, राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर के परिवारजनों की पूजा पद्धति क्या रही होगी? उनकी पूजा-पद्धतियाँ शास्त्रों में वर्णित है पर इसका अर्थ ये तो नहीं है कि समाज अपनी पूजा विधि को उसी रूप में रखे जो चली आ रही थी.

पूजा-पद्धति के वर्तमान रूप में कुछ को आदि गुरु शंकराचार्य ने भी विकसित किया है तो हम उसे मान ही रहे हैं न? इस्कॉन वालों की अपनी कुछ अलग पूजा-विधि है, उधर असम में श्रीमंत शंकरदेव जी ने नामघर की स्थापना कर पूजा की एक अलग विधि असमिया समाज को दी, स्वामीनारायण वालों का कुछ है और तो इसमें विभेद का प्रश्न कहाँ है?

वे मित्र पूछ्ते हैं, पांडव और कौरव होली-दीपावली क्यूं नहीं मनाते थे? कल को आप कहेंगे कि वो गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव क्यों नहीं मनाते थे. पर्व-त्योहार हर युग और काल में विकसित होते हैं. तिलक ने हिन्दू समाज को कुछ उत्सव की संकल्पना दी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी दी और इसी तरह और दूसरे लोगों ने दी, तो इसी जाग्रत समाज का लक्षण मानते हुये इस बात का तो स्वागत करना चाहिये कि हमारी आध्यात्मिक यात्रा किसी सरिता की तरह गतिमान है पर मित्रवर को इसमें आपत्ति है.

राम और कृष्ण के मंदिर क्यों नहीं मिलते. वेदों में मूर्ति-पूजा नहीं है ऐसा कहते हैं, वही कहने वाले ये भी कहते हैं कि हड़प्पा सभ्यता वैदिक सभ्यता थी तो फिर क्या वजह है कि वहां से नंदी और शिव की प्रतिमायें मिली? इतिहास के केवल चंद ज्ञात स्रोतों के आधार पर अगर आंकलन करेंगे तो दुविधा ही होगी.

हिन्दू धर्म को सेमेटिक खांचों में फिट करके नहीं देखिएगा तो सारे शंकाओं का निर्मूलन होगा, अन्यथा गलत नंबर के चश्मे से चीजों को देखने के परिणाम भी गलत ही आयेंगे.

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