क्या इन बेवकूफ़ियों से कभी एयर क्वालिटी इंडेक्स में सुधार संभव है?

दिवाली की रात दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) सामान्य से 9 गुना ज्यादा हो गया. मीडिया वाले चीखे पड़े हैं. हाय दिवाली. हाय दिवाली. हाय हाय हाय.

लेकिन जब बाकी दिनों का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) सामान्य से 6-7 गुना ज्यादा चलता है तो इन मीडिया वालों की चीख नहीं निकलती. अच्छा होता कि बाकी भी दिन ये मीडिया वाले ऐसे ही चीखते, ऐसे ही हाय हाय करते तो प्रदूषण को नियंत्रित करने वाली एजेंसियां हरकत में आती.

अरे कुछ नहीं तो अपने चैनल पर ही रियल टाइम डाटा डिस्प्ले कर दो न… रोजाना उसके बारे में दिखाते तो सरकारी एजेंसियां प्रदूषण के वास्तविक कारणों पर कार्य करती. जैसे सड़कों की धूल-मिट्टी की सफाई जो इस प्रदूषण में 80% योगदान देता है, ऐसा अनुभव भी होता है और ऐसा ही आईआईटी दिल्ली की रिपोर्ट भी कहती है.

लेकिन दिवाली पर हाय-हाय करना, दिवाली को वायु प्रदूषण का कारक ठहरा देना, ये प्रदूषण को नियंत्रित करने लिए जिम्मेदार अधिकारियों को सुरक्षित रास्ता देता है. वो फर्जी में पटाखे, प्लांट, DG सेट, निर्माण कार्य बंद करवा कर बहुत ही ज्यादा क्रियाशील होने का नाटक कर लेते हैं.

दिवाली बीत जाती है, AQI फिर भी सामान्य से 6-7 गुना ऊपर चलता रहता है, कोई हाय-हाय नहीं होती, कोई चीख पुकार नहीं होती. अधिकारी साल भर मस्त रहता है. उसपर कोई दबाव नहीं रहता. फिर दिवाली आती है, फिर चीख पुकार होती है. ऊपर से ग्रीन दिवाली-ग्रीन दिवाली की रट लगाकर कुछ बेवकूफ स्कूल वाले, बच्चों को अनायास आतिशबाज़ी के मनोरंजन से दूर करते हैं. AQI में फिर भी कोई सुधार नहीं होता.

कहने का मतलब साल में एक-दो बार तेल-मसाला युक्त भोजन करने से स्वास्थ्य नहीं बिगड़ता बल्कि आप स्वस्थ हो तो वो भोजन भी अच्छे से पचता है और ज्यादा आनंद देता है, जिसको स्वस्थ रहना है वो रोज सही भोजन और व्यायाम करता है.

और यहाँ हम साल भर पिज़्ज़ा-बर्गर खाकर, अनियमित जीवन शैली जीकर साल में एक दिन त्योहारों पर बने तेल-मसाले युक्त पकवान देखकर नाक मुँह सिकोड़ रहे हैं, उसी दिन सबका कोलेस्ट्राल, ट्राइ ग्लिसरीयड बढ़ा जा रहा है. क्या इन बेवकूफ़ियों से कभी AQI में सुधार संभव है?

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